Tuesday, April 19, 2016

12>অজানাকে জানতে -=( 1 to 9 )

12>Myc=post=12>অজানাকে জানতে =*** ***( 1 to 9 )

1-------------------हैरान करने वाली नई प्रजातियां
2-------------------English and Hindi always Contradict...
3-------------------गुलाब, चमेली, कमल सहित इन 5 फूलों के हैं ये चौकानें वाले गुण
4-------------------Exploring The Amazing Uses Of Salt In The House
5-------------------Teabags Are Useful.
6>-----------------उत्तर प्रदेश के इस मंदिर में सूर्यास्त के बाद जाने वाले की हो जाती है मौत
7>-----------------बारिश के 7 दिन पहले ही यह मंदिर दे देता है संकेत,
8>-----------------আরব সাগরের মাঝে ভগবান শিবের আশ্চর্য মন্দির..
9>-----------------इस तरह प्रकट हुआ था वृंदावन के बांके बिहारी जी का विग्रह
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1>हैरान करने वाली नई प्रजातियां

पृथ्वी पर जीव जन्तुओं की अब भी ऐसी अनगिनत प्रजातियां हैं जिनके बारे में इंसान को जानकारी नहीं है. वक्त के साथ नई खोजें सामने आ रही हैं. एक नजर 2016 में
सामने आई नई प्रजातियों पर.
1=भारत का रंगीन केकड़ा
पहली नजर में ऐसा लगता है जैसे लाल और पीली मिर्चें रखी हों. ताजे पानी का यह रंगीन केकड़ा भारत के पश्चिमी घाट में मिला. पश्चिमी घाट की पहाड़ियों को जैवविविधता के लिहाज से सबसे समृद्ध इलाकों में गिना जाता है. इस रंगीन केकड़ों को गुबनट्रियाना ठाकरे नाम दिया गया है. इसे खोजने वाले तेजस ठाकरे
शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे के बेटे हैं. उन्होंने केकड़े की पांच नई प्रजातियां खोजी हैं.

2=भूतिया सा ऑक्टोपस
ऑक्टोपस की कुछ प्रजातियां शिकार करने या शिकारियों से बचने के लिए रंग बदल लेती हैं. लेकिन हवाना के पानी में मिला यह ऑक्टोपस खास है. इसमें वर्णक नहीं हैं. यह हमेशा सफेद दिखता है और कॉमिक्स के भूतिया किरदार कैस्पर सा दिखता है.3=मुर्दा फूल
माना जाता था कि रैफ्लेशिया फूल या कॉर्प्स फ्लावर हमेशा एक मीटर व्यास जितना बड़ा होता है. लेकिन फरवरी 2016 में फिलिपींस के लुजोन द्वीप में इसकी बहुत ही छोटी प्रजाति मिली. इसका व्यास सिर्फ 13 सेंटीमीटर है. इस फूल से शव जैसी बदबू आती है, जिसके चलते मांसाहारी कीट इसकी तरफ आकर्षित होते हैं. इन कीटों के जरिये फूल परागण करता है.
4=भारत का चमकदार सांप
21वीं शताब्दी में पौधों और जीवों की नई प्रजातियां खोजने के मामले में भारत सबसे अहम केंद्र रहा. ब्रिटिश और भारतीय वैज्ञानिकों की एक संयुक्त टीम ने भारत में चमकदार सांप खोजा. यह विषैला नहीं है बल्कि अपने शिकार को आकर्षित करने के लिए प्रकाश छोड़ता है. इसका नाम मेलानोफिडियम खरे रखा गया है.
5=शाकाहारी पिरान्हा मछली
पिरान्हा मछलियों को अब तक धारदार दांतों वाली बर्बर शिकारी माना जाता था. यह मछली कुछ ही मिनटों के भीतर इंसान या दूसरे जीवों का कंकाल में बदलने के लिए मशहूर थी. लेकिन ब्राजील में अमेजन के वर्षावनों में पिरान्हा की एक नई प्रजाति सामने आई है जो पूरी तरह शाकाहारी है. पौधे खाने वाली इस मछली को मिलोप्लस जोरोय नाम दिया गया है.
6=टैरेनटुला कंट्री सिंगर
टैरेनटुला या काले बालों वाली मकड़ी को भी 2016 में खोजा गया. इसे अमेरिकी वैज्ञानिकों ने खोजा. इसका नाम मशहूर गायक जॉन कैश से प्रेरित होकर टैरेनटुला कंट्री सिंगर रखा गया. यह मकड़ी कैलीफोर्निया जेल के उस कमरे में मिली जहां जॉन कैश ने एक गाना रिकॉर्ड किया था.
7=भारत का ट्री फ्रॉग
2016 में मेंढकों की कई प्रजातियां खोजी गईं. इनमें से प्रमुख है पेड़ों पर रहने वाला भारत का फ्रांकिक्सालस जेरडोनी मेंढक. माना जाता था कि यह 137 साल पहले विलुप्त हो चुका है. लेकिन पेड़ों में बने छेदों में रहने वाला यह मेंढक उत्तर भारत में मिला. तस्वीर में मादा ट्री मेंढक अंडों के साथ है.
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2>English and Hindi always Contradict...

English:The sooner the better.
Hindi: Jaldi ka kaam shaitaan ka.
English: Think of the devil, and the devil is here.
Hindi: Badi lambi umar hai tumhari, abhi tumhe hi yaad kar rahe the.
English: Don't wait, fight for your rights.
Hindi: Sabr ka fal meetha hota hai.
English: you silly cow!
Hindi: gaaye humari mata hai.
And the most striking of all,
English: As wise as an owl.
Hindi: Ullu ka Pattha..
Now what should we teach our children.
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3>गुलाब, चमेली, कमल सहित इन 5 फूलों के हैं ये चौकानें वाले गुण

फूलों का जीवन में बहुत बड़ा महत्व होता है। पूजा करने सहित फूलों का विभिन्न प्रोडक्ट्स में इस्तेमाल किया जाता है। गज़ब की सुगंध और कमाल के रंगों की वजह से फूलों से एक पॉजिटिव एनर्जी मिलती है। आपको जानकार हैरानी होगी कि फूलों के कई स्वास्थ्य लाभ भी हैं। चलिए जानते हैं किस फूल के क्या गुण होते हैं।

1=गुलाब- गुलाब की पंखुडियां एक प्राकृतिक कामोद्दीपक के रूप में कार्य करती हैं, इसलिए इन्हें नवविवाहित जोड़े के बिस्तर पर छिड़का जाता है। अध्ययनों के अनुसार, गुलाब के फूल तनाव और थकान दूर कर मन को शांत करते हैं।
2=गुड़हल- इस सुंदर लाल फूल को भगवान गणेश और काली देवी को अर्पित किया जाता है। इसका औषधीय उपयोग भी किया जाता है। इसे जीवन में समृद्धि लाने के लिए माना जाता है।

3=चमेली- देवताओं को अर्पित करने सहित चमेली के फूल का इस्तेमाल महिला की सौंदर्यता बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसकी गज़ब की सुगंध तंत्रिकाओं को शांत करने में सहायक है। इसके अलावा इसका उपयोग इत्र बनाने के लिए भी किया जाता है।

4=कमल- इसे भगवान विष्णु, ब्रह्मा, देवी लक्ष्मी और सरस्वती जैसे कई हिंदू देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है। यह दिव्य सौंदर्य और पवित्रता का प्रतीक है। बौद्ध धर्म में, यह मौलिक पवित्रता के सृजन का प्रतीक है।

5=मैरीगोल्ड या गेंदा - इस फूल की ख़राब स्मेल के कारण कीट-पतंगे दूर रहते हैं। इसलिए इस फूल का और इसकी माला को देवी-देवताओं को चढ़ाया और तोरण के रूप में घर को सजाया जाता है।
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4>Exploring The Amazing Uses Of Salt In The House

Since the medieval times, people have been using salt for cleaning purposes in their homes. With its not-toxic properties, salt (sodium chloride) has been used to help clean and disinfect items in homes for ages. Although salt was regarded as a precious commodity many decades ago, today you can buy a packet cheaply at any shop near you.

This means you should not miss exploring the benefits that come with using this product within our homes to make cleaning an easier job. Below are some of the ways in which salt has proved effective in cleaning and you can borrow one or two to make your home a better place without necessarily buying expensive detergents.
Keep ants away
If you are having a major problem keeping ants away from your food storage cabinets or windows, you should remember that salt is a perfect tool to keep the small creatures away.

If the ants have become too annoying and you want to use a simple method to eliminate them, just place some salt on the window sills or whatever surface they have attacked. As is commonly known, salt also reduces humidity levels within the home when applied in that manner.
Cleaning sink drains

Mostly when the sink clogs, there will be a thick layer that prevents water from passing freely. This layer is made up grease and its build-up could bring about expensive replacements.

To clean the sink, mix hot water with salt and pour the mixture into the sink. Salt melts the grease and deodorizes the sink.
Brighten colors

If your curtains or fiber rugs seem to have lost their original glare, you should not look too far for a remedy. Salt can perfectly allow you to restore the color of the garments with just one wash. Dip a cloth in concentrated salt waterand rub the faded rugs and carpets with it. This helps to clean any spots and stains that could not be eliminated easily using conventional detergents

Polish brass, silver and copper

Many people who own ornaments made from brass, copper and silver would like to keep them clean as new. However, with time the metals will fade and this makes it necessary to find a method to clean them. Salt is the easiest and non-corrosive solution you can choose for this purpose.

Rubbing a paste of salt mixture and vinegar on the objects gives a shiny look after rinsing. Salt and vinegar dissolve any stains and dirt that could be making the object to appear dull.
Cleaning car and house windows

To clean your windows and remove any stubborn stains, just mix few tablespoons of salt with one gallon of warm water. Use the mixture to clean the windows, rubbing keenly any parts that are stained. This should leave the windows clean as new and offers a lasting effect even when used in cleaning the windows of your car.
Skin rejuvenation

Mixing salt with olive or lavender oil forms a perfect bath scrub. Rub the entire body with the mixture then shower to rinse the dirt off. Salt helps to rejuvenate the skin by removing dead skin cells.

Tooth remedies

When you are having toothaches and mouth sores, you do not need to wait until you see the dentist. You can offer remedy by dissolving salt in warm water then swishing it in the mouth. This mixture offers an amazing mouthwashand has laxative effects.
Teeth whitening and dental care
Salt, when mixed with baking soda, acts as a tooth whitening solution that you can apply any time. It allows you to keep your teeth white and clean at the same time.
Dry clothes during winter

Use salt to rinse your clothes in the final wash to prevent them from shrinking. This is especially useful if you keep your clothes outside in the sun to dry.
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5>Teabags Are Useful.

Tea Is Delicious... And Teabags Are Useful. Here's Why People In The Know Recycle Them!

Everyone loves tea. Maybe every person, but it speaks to tea's worth that in most countries, its consumption can be measured in grams per head per year. As amazing as that is, it goes further. Many people talk about British stereotypes of drinking tea, but tea is at its absolute most popular in Turkey... where people drink 200 grams per head per year! That's an amazing figure, and with good reason.

The anatomy of tea

Tea itself is amazing,whether it's with or without milk, with mint leaves, or with lemon. It can be black, red, white, and a variety of other colours, each one corresponding to its own rainbow of flavours. Most importantly for our purposes, in many countries, tea comes in "classical" paper pouches with pores, which are slowly provide their wealth of natural sugars, herbs and various other ingredients to the boiled water that will eventually become a cup (or ten!) of tea.

But a teabag's life doesn't need to end there!

After all is said and done, and the tea's been enjoyed to the last drop, the teabag usually goes in the garbage, if it didn't before then. But there are ways to give your "used" teabags a new lease on life.
For example...

You can use teabags as an effective deodorant for shoes. Especially if you or someone you know is an athlete, but in all cases really, shoes can start to smell.


A teabag, either dried out a day or two after preparing tea or one that hasn't been used, can be placed inside a shoe to alleviate the smell.
Presenting the teabag user's "cookbook"!

There's a lot more you can do, of course. Here's another example: tea contains nutrients that soothe soil and make perfect aids for flower growth. That's right: put teabags in your garden carefully and the odds are good they'll help more than they hurt. CONTINUE ON THE NEXT PAGE...

Double-duty as deodorant Teabags can also be used to wash your hands. If you've been cooking with onions or have grease from meat on your hands, it can really dampen your day. But washing your hands with a teabag in hand can help remove these kinds of scents!
And speaking of the kitchen...

Teabags make excellent cleansers for dishwashing. Unfortunately, you can't quite wash your dishes with the power of tea alone, but by leaving all of your dishes to soak in boiling water alongside a teabag overnight, you can remove even the most stubborn of food stains.
Tea: a window to the soul

There's other methods you can use to apply tea to your problems. For example, by making a hot cup of unsweetened tea and a dipping cloth in it, you can clean reflective surfaces effectively.

tea's purity means that a cloth dipped in tea can be used to clean mirrors and windows, far more effectively than plain water!
Breaking open the medicine cabinet

And finally, we'll discuss a few pseudo-medicinal uses for tea. These are all trickier, of course. For treating swollen eyes, at least, and possibly for other healing purposes, you'll want to use black tea.

Two black teabags, just after use, can be rubbed around swollen eyes to heal them. But if your problem isn't swollen eyes, you might instead want to soak a teabag in cold water and run it over a sunburn, or press a just-used teabag against a wart regularly for a few days to remove it! Truly, the possibilities are limitless!
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6>उत्तर प्रदेश के इस मंदिर में सूर्यास्त के बाद जाने वाले की हो जाती है मौत

उत्तर प्रदेश के कानपूर में एक ऐसा मंदिर है जो सदियों से बंद पड़ा हुआ है


आपने कई मंदिरों के बारे में सुना होगा। लेकीन आज हम आपको जिस मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं उसकी हकीकत अपने आप में एक अनसुलझे रहस्य की तरह है। इस मंदिर न तो कोई इंसान जाता है और नही कोई जानवर। कहतें है की इस मंदिर में सूर्यास्त बाद जो भी गया वो कभी ज़िन्दा लौट के नही आ सका। आलम कुछ ऐसा है की इस मंदिर आज से नही सैकड़ो सालों से कोई भी नही गया और आखिर क्या है मंदिर में ऐसा।

उत्तर प्रदेश के कानपूर में एक ऐसा मंदिर है जो सदियों से बंद पड़ा हुआ है लोगों में इस मंदिर को लेकर ऐसा डर है की कोई कभी हिम्मत तक नही करता है की वो इस मंदिर झांके की क्या है। कहतें हैं की इस मंदिर में जो इंसान रात के समय रुका उसकी मौत निश्चित हो जाती है। गांव के लोगो का कहना है की उनकी तीन पीढियों ने इस मंदिर की तरफ कभी देखा नही है। वैसे मंदिर के निर्माण की अगर बात करें तो इसका निर्माण 5वी सदी में किया गया था और चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में हुआ था।

कहतें हैं की इस मंदिर के भीतर भगवान विष्णु के वामन अवतार की मूर्ति है और यहां पर प्रचलित कहानियों के अनुसार किसी जामने में इस मंदिर के चारो तरफ विशाल और घना जंगल हुआ करता था। उस वक्त कुछ बंजारों की नजर इस मंदिर पर पड़ी और उन्होंने यहां पर रात रुकने का फैसला किया और दुसरे दिन उनका पूरा परिवार मौत की आगोश में समा चूका था। उस वक्त से लेकर आज तक इस मंदिर में फिर कोई नही गया। फिलहाल मंदिर की देख-रेख अब पुरातत्त्व विभाग के अधीन है।







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7>बारिश के 7 दिन पहले ही यह मंदिर दे देता है संकेत, विज्ञान के लिए आज भी है यह के पहेली

उत्तर प्रदेश के कानपूर में भगवान जगन्नाथ का मंदिर है।

भारत एक एशिया का एक ऐसा देश हैं जहां पर मंदिरों की संख्या का आकलन कर पाना मुश्किल है। कई मंदिर ऐसे हैं जो अपने बनावट तो कुछ अपने रहस्य के लिए दुनिया भर में प्रचलित हैं। चलिए आज हम आपको उत्तर प्रदेश के एक ऐसे मंदिर के बारें में बतातें हैं। जिसके रहस्य के आगे मौसम विभाग भी हैरान हो जाता है। आज हजारों साल हो गए इस मंदिर को लेकिन इसके सटीक अनुमान के आगे सभी आज के आधुनिक विज्ञान भी फेल है।

उत्तर प्रदेश के कानपूर में भगवान जगन्नाथ का मंदिर है। इस मंदिर की खासियत है की बारिश से पहले इस मंदिर के छत से अपने आप पानी की बुँदे टपकने लगती है। भले ही तपा देने वाली गर्मी क्यों न हो लेकिन इस मंदिर की छत से पानी टपकने लगती है। लेकिन आपको जानकर बड़ी हैरानी होगी की इस मंदिर के छत से पानी टपकना उस वक्त अपने आप बंद हो जाता है जब बारिश होने लगती है। इस मंदिर का रहस्य आज तक कोई नही सुलझा पाया है।


इस मंदिर की यह भी एक खासियत है की यह बारिश के आगमन से 7 दिन पहले ही चेतावनी देने लगती है। इस मंदिर में कई बार वैज्ञानिको की टीम आ चुकी है और उन्होंने इस मंदिर का कई बार अध्यन भी किया लेकिन उन्हें अब तक इस बात की जानकरी नही मिल पाई की आख़िरकार मंदिर की छत से पानी कैसे टपकता है। स्थानीय लोगों की माने तो भगवान जगन्नाथ की इस मंदिर से पानी की बूंद मोटी टपके तो अच्छी बारिश का सकेंत मानतें हैं और अगर बूंद छोटी हो तो सूखे की आशंका माना जाता है।
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8>আরব সাগরের মাঝে ভগবান শিবের আশ্চর্য মন্দির...

গুজরাত থেকে মাত্র ১ কিলোমিটার দূরে আরব সাগরের মধ্যেই রয়েছে ভগবান শিবের মন্দির। নাম নিশকলঙ্গেশ্বর মন্দির। মন্দিরটি দেখতে ভিড় জমান বহু ভক্ত। মাঝ সমুদ্রে দাঁড়িয়ে থাকা এই মন্দিরটি, তা আজও বহু মানুষকে অবাক করে। যার কারণে এটি হয়ে উঠেছে উল্লেখযোগ্য পর্যটন কেন্দ্র।


চারিদিকে শুধু জল আর জল। তার মধ্যে এক টুকরো জমির উপর নির্মিত এই মন্দিরটি। তবে কিছুক্ষণের জন্যই এই মন্দিরে পা রাখার সুযোগ মেলে। এখানে ভগবান শিবের দর্শন করতে হলে দুপুর ১টা থেকে রাত ১০টার মধ্যে আসতে হয়। কারণ, অন্য সময় জলের তলায় থাকে এই মন্দিরের প্রবেশ পথ। কোনও এক আশ্চর্য কারণে বেলা ১টা থেকে রাত ১০টা পর্যন্ত প্রবেশ পথে সমুদ্রের জল আসে না। তখনই দর্শনার্থীরা সেই মন্দিরে পায়ে হেঁটে প্রবেশ করতে পারেন। ভগবান শিবের পুজো দিতে পারেন।

জোয়ারের সময় মন্দিরটি জলের তলায় চলে যায়। শুধুমাত্র মন্দিরের ২০ ফুট লম্বা পাথরের তৈরি থামটির উপরের অংশ ও মন্দিরের ধ্বজাটি দেখা যায়। আবার দুপুর ১টার পর মন্দিরের উপর থেকে জল নামতে শুরু করে। দর্শনার্থীরা একে একে আসতে শুরু করেন।

বর্ষার সময় অবশ্য অন্য রূপ ফুটে ওঠে মন্দিরটির। চারিদিকের জল ফুলে ফেঁপে ওঠে। মন্দিরের থামটি ছাড়া মন্দিরের কোনও চিহ্নই চোখে পড়ে না। তবুও বছরের প্রায় প্রত্যেকদিনই ভগবান শিবের দর্শন করতে বহু মানুষ এখানে ভিড় করেন।

ইতিহাসের বহু কাহিনিও জুড়ে রয়েছে এই মন্দিরের সঙ্গে। এই মন্দিরের ভিতরে ৫টি শিবলিঙ্গ রয়েছে। পাণ্ডবরা নাকি সেই শিব লিঙ্গের আরাধনা করতেন। এমন অনেক ইতিহাসের কাহিনি আজও শোনা যায়।
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9>इस तरह प्रकट हुआ था वृंदावन के बांके बिहारी जी का विग्रह


वृंदावन में बांके बिहारी जी का एक भव्य मंदिर है। इस मंदिर में बिहारी जी की काले रंग की एक प्रतिमा है। इस प्रतिमा के विषय में मान्यता है कि इस प्रतिमा में साक्षात् श्री कृष्ण और राधा समाए हुए हैं। इसलिए इनके दर्शन मात्र से राधा कृष्ण के दर्शन का फल मिल जाता है।
इस प्रतिमा के प्रकट होने की कथा और लीला बड़ी ही रोचक और अद्भुत है इसलिए हर साल मार्गशीर्ष मास की पंचमी तिथि को बांके बिहारी मंदिर में बांके बिहारी प्रकटोत्सव मनाया जाता है।

बांके बिहारी के प्रकट होने की कथा
संगीत सम्राट तानसेन के गुरू स्वामी हरिदास जी भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे। इन्होंने अपने संगीत को भगवान को समर्पित कर दिया था। वृंदावन में स्थित श्री कृष्ण की रासस्थली निधिवन में बैठकर भगवान को अपने संगीत से रिझाया करते थे।
भगवान की भक्त में डूबकर हरिदास जी जब भी गाने बैठते तो प्रभु में ही लीन हो जाते। इनकी भक्ति और गायन से रिझकर भगवान श्री कृष्ण इनके सामने आ जाते। हरिदास जी मंत्रमुग्ध होकर श्री कृष्ण को दुलार करने लगते। एक दिन इनके एक शिष्य ने कहा कि आप अकेले ही श्री कृष्ण का दर्शन लाभ पाते हैं, हमें भी सांवरे सलोने का दर्शन करवाएं।
इसके बाद हरिदास जी श्री कृष्ण की भक्ति में डूबकर भजन गाने लगे। राधा कृष्ण की युगल जोड़ी प्रकट हुई और अचानक हरिदास के स्वर में बदलाव आ गया और गाने लगे-
'भाई री सहज जोरी प्रकट भई, जुरंग की गौर स्याम घन दामिनी जैसे। प्रथम है हुती अब हूं आगे हूं रहि है न टरि है तैसे।। अंग अंग की उजकाई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे। श्री हरिदास के स्वामी श्यामा पुंज बिहारी सम वैसे वैसे।।'
श्री कृष्ण और राधा ने हरिदास के पास रहने की इच्छा प्रकट की। हरिदास जी ने कृष्ण से कहा कि प्रभु मैं तो संत हूं। आपको लंगोट पहना दूंगा लेकिन माता को नित्य आभूषण कहां से लाकर दूंगा। भक्त की बात सुनकर श्री कृष्ण मुस्कुराए और राधा कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह रूप में प्रकट हुई। हरिदास जी ने इस विग्रह को बांके बिहारी नाम दिया।
कृष्णभक्तों में खासतौर पर बिहारीजी के भक्तों में एक कथा प्रचलित है। एक गरीब ब्राह्मण बांके बिहारी का भक्त था। एक बार उसने किसी महाजन से कुछ रुपये उधार लिए। हर महीने वह थोड़ा-थोड़ा करके कर्ज चुकाया। आखिरी किस्त के पहले महाजन ने उसे अदालती नोटिस भिजवा दिया कि उधार बकाया है और पूरी रकम व्याज सहित वापस करे।
ब्राह्मण परेशान हो गया। महाजन के पास जा कर उसने बहुत सफाई दी पर कोई असर नहीं हुआ। मामला कोर्ट में पहुंचा। कोर्ट में भी ब्राह्मण ने जज से वही बात कही, मैंने सारा पैसा चुका दिया है। जज ने पूछा, कोई गवाह है जिसके सामने तुम महाजन को पैसा देते थे। कुछ सोचकर उसने बिहारीजी मंदिर का पता बता दिया।
अदालत ने मंदिर का पता नोट करा दिया। अदालत की ओर से मंदिर के पते पर सम्मन जारी कर दिया गया। वह नोटिस बिहारीजी के सामने रख दिया गया। बात आई गई हो गई। गवाही के दिन एक बूढ़ा आदमी जज के सामने गवाह के तौर पर पेश हुआ। उसने कहा कि पैसे देते समय मैं साथ होता था और इस-इस तारीख को रकम वापस की गई थी।
जन्माष्टमी विशेषः राधा कृष्ण के मिलन की अद्भुत कहानियां
जज ने सेठ का बही- खाता देखा तो गवाही सही निकली। रकम दर्ज थी, नाम फर्जी डाला गया था। जज ने ब्राह्मण को निर्दोष करार दिया। लेकिन उसके मन में यह उथल पुथल मची रही कि आखिर वह गवाह था कौन। उसने ब्राह्मण से पूछा। ब्राह्मण ने बताया कि बिहारीजी के सिवा कौन हो सकता है।
इस घटना ने जज को इतना विभोर कर दिया किया कि वह इस्तीफा देकर, घर-परिवार छोड़कर फकीर बन गया। कहते है कि वही न्यायाधीश बहुत साल बाद पागल बाबा के नाम से वृंदावन लौट कर आया।
वृंदावन। क्या कभी ऐसा भी हो सकता है, जहां भगवान भक्तों की भक्ति से अभिभूत होकर या उनकी व्यथा से द्रवित हो भक्तों के साथ ही चल दें? वृदांवन का मशहूर बांके बिहारी मंदिर एक ऐसा ही मंदिर माना जाता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि बांके बिहारी जी भक्तों की भक्ति से इतना प्रभावित हो जाते हैं कि मंदिर में अपने आसन से उठकर भक्तों के साथ हो लेते हैं, इसीलिए मंदिर में उन्हें परदे में रखकर उनकी क्षणिक झलक ही भक्तों को दिखाई जाती है।

पुजारियों का एक समूह दर्शन के वक्त लगातार मूर्ति के सामने पड़े पर्दे को खींचता-गिराता रहता है और उनकी एक झलक पाने को बेताब श्रद्धालु दर्शन करते रहते हैं और बांके बिहारी हैं, जो अपनी एक झलक दिखाकर पर्दे में जा छिपतें हैं। लोक कथाओं के अनुसार कई बार बांके बिहारी कृष्ण ऐसा कर भी चुके हैं, मंदिर से गायब हो चुके हैं, इसीलिए ये पर्देदारी की जाती है।
एक शृद्धालु के अनुसार' मंदिर मे दर्शनार्थ आए श्रद्धालु बार-बार उनकी झलक पाना चाहते हैं लेकिन पलक झपकते ही वो अंतर्ध्यान हो जाते हैं। उनके पास खड़े एक श्रद्धालु बताते हैं कि ऐसे ही हैं हमारे बांके बिहारी... सबसे अलग, सबसे अनूठे।
ये पर्दा डाला ही है इसलिए कि भक्त बिहारी जी से ज़्यादा देर तक आँखे चार न कर सकें क्योंकि कोमल हृदय बिहारी जी भक्तों की भक्ति व उनकी व्यथा से इतना द्रवित हो जाते हैं कि मंदिर मे अपने आसन से उठकर भक्तों के साथ हो लेते हैं। वो कई बार ऐसा कर चुके हैं, इसलिए अब ये पर्दा डाल दिया गया है ताकि वे टिककर बैठे उनका भोला सा स्पष्टीकरण है 'अगर ये एक भक्त के साथ चल दिए तो बाकियों का क्या होगा?'
विस्मित से भक्त बता रहे हैं, एक बार राजस्थान की एक राजकुमारी बांके बिहारी जी के दर्शनार्थ आईं लेकिन वो इनकी भक्ति में इतनी डूब गई कि वापस जाना ही नहीं चाहती थीं। परेशान घरवाले जब उन्हें जबरन घर साथ ले जाने लगे तो उसकी भक्ति या कहें व्यथा से द्रवित होकर बांके बिहारी जी भी उसके साथ चल दिए।
इधर मंदिर में बांके बिहारी जी के गायब होने से भक्त बहुत दु:खी थे। आखिरकार समझा बुझाकर उन्हें वापस लाया गया। भक्त बताते हैं कि उन पर यह पर्दा तभी से डाल दिया गया, ताकि बिहारी जी फिर कभी किसी भक्त के साथ उठकर नहीं चल दें और भक्त उनके क्षणिक दर्शन ही कर पाएं, सिर्फ झलक ही देख पाएं।
यह भी कहा जाता है कि उन्हें बुरी नजर से बचाने के लिए पर्दा रखा जाता है क्योंकि बाल कृष्ण को कहीं नजर न लग जाए। बंगाल से आए एक भक्त बताया कि सिर्फ जन्माष्टमी को ही बांके बिहारी जी के रात को महाभिषेक के बाद रात भर भक्तों को दर्शन देते हैं और तड़के ही आरती के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं।
वैसे मथुरा वृंदावन में जन्माष्टमी का उत्सव पर्व से सात आठ दिन पहले ही शुरू हो जाता है। कहा जाता है कि स्वामी हरिदास को बांके बिहारी जी के दर्शन हुए थे। तब यह प्रतिमा निधिवन में थी, पर गोस्वामियों के एक वर्ष बाद इस मंदिर को बनवाने के बाद इस प्रतिमा को इस मंदिर मे प्रतिष्ठापित किया गया।
पूरे वृंदावन में कृष्ण लीला का तिलिस्म चप्पे-चप्पे पर बिखरा हुआ है। कृष्ण का अपने भक्तों के साथ जो अनन्य प्रेम है उसको लेकर भी कई कहानियां और कई किस्से हैं...
राजस्थान के एक भक्त बताते है कि यह मंदिर शायद अपनी तरह का पहला मंदिर है, जहाँ सिर्फ इस भावना से कि कहीं बांके बिहारी की नींद मे खलल न पड़ जाए इसलिए सुबह घंटे नही बजाए जाते बल्कि उन्हें हौले-हौले एक बालक की तरह उन्हें दुलार कर उठाया जाता है, इसी तरह संझा आरती के वक्त भी घंटे नहीं बजाए जाते ताकि उनकी शांति में कोई खलल न पड़े।
गुजरात के एक भक्त बताते है 'यह जानकर शायद आप हैरान हो जाएंगे कि बांके बिहारी जी आधी रात को गोपियों के संग रासलीला करने निधिवन में जाते हैं और तड़के चार बजे वापस लौट आते हैं।'
विस्फरित नेत्रों से अपनी व्याख्या को वे और आगे बढ़ाते हुए बताते हैं 'ठाकुर जी का पंखा झलते-झलते एक सेवक की अचानक आँख लग गई, चौंककर देखा तो ठाकुर जी गायब थे पर भोर चार बजे अचानक वापस आ गए। अगले दिन वही सब कुछ दोबारा हुआ तो सेवक ने ठाकुर जी का पीछा किया और ये राज़ खुला कि ठाकुर जी निधिवन में जाते हैं।' तभी से सुबह की मंगल आरती की समय थोड़ा देर से कर दिया, जिससे ठाकुर जी की अधूरी नींद पूरी हो सके।
अकसर भक्तगण कान्हा की बांसुरी की धुन, निधिवन में नृत्य की आवाज़ें आदि के बारे मे किस्से यह कहकर सुनाते हैं कि 'हमे किसी ने बताया है।' ऐसे कितने ही किस्से कहानियां वृंदावन के चप्पे-चप्पे पर बिखरी हुई हैं।'
कितनी ही 'मीराएं' वृंदावन में आपको कृष्ण के सहारे ज़िंदगी की गाड़ी को आगे बढ़ाती हुई नज़र आएंगी। इस जीवन में कृष्ण ही इनके जीवन का सहारा है।
अचानक मंदिर में भक्तों का हुजम दिखाई देता है...राधे राधे, जय हो बांके बिहारी के जयघोष के बीच, मंदिर के प्रांगण के एक कोने से, मद्धम से स्वर में भजन सुनाई देता है... हमसे परदा करो न हे मुरारी, वृदांवन के हो बांके बिहारी...।
चांदी से बाल, सफेद धोती दमकते, माथे पर चंदन का टीका, आंखों से बरसते आंसुओं के बीच मूर्तिस्थल की तरफ लगातार देखती हुई बहुत धीमी आवाज़ में भजन गाती एक ऐसी ही एक मीरा...हमसे परदा करो न हे मुरारी, वृदांवन के हो बांके बिहारी...
साध्वी पर्दे के पीछे की बांके बिहारी जी की इसी लुका-छिपी से व्यथित होकर ही सम्भवत: बरसती आंखों से गुहार कर रही थीं। बांके बिहारी की एक झलक दर्शन के बाद मंदिर से वापसी... मंदिर के बाहर निकलते ही संकरी सी गली में बनी किसी दुकान पर शुभा मुदगल की आवाज़ में गाया गया गीत माहौल मे एक अजीब सी शांति और अजीब सी बेचैनी बिखेर रहा है... 'वापस गोकुल चल मथुराराज...., राजकाज मन न लगाओ, मथुरा नगरपति काहे तुम गोकुल जाओ?'.. शृद्धालुयों के हुजूम तेज़ी से मंदिर की ओर बढ़ रहे हैं..
बांके बिहारी मंदिर में इसी विग्रह के दर्शन होते हैं। बांके बिहारी के विग्रह में राधा कृष्ण दोनों ही समाए हुए हैं। जो भी श्री कृष्ण के इस विग्रह का दर्शन करता है उसकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त के कष्टों को दूर कर देते हैं

बांके बिहारी की जय
जय जय श्री सीताराम
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Sunday, February 21, 2016

11>शंख 12 रहस्य+दक्षिणावर्ती शंख ==+-रुद्राक्ष =+-गुंजा=श्वेत कुच, लाल कुच==>( 1 to 5--a to n )

11>Myc=Post=11> ****शंख 12 रहस्य+दक्षिणावर्ती शंख=+रुद्राक्ष=+गुंजा****( 1 to 5--a to n )


1------शंख 12 रहस्य
            :a= ।।शंख।।----शंख के विषयमें बिसेस तथ्य -----शंख 12 रहस्य
2------दक्षिणावर्ती शंख
             a=|| दक्षिणावर्ती शंख के महत्वपूर्ण उपाय ||

3------रुद्राक्ष १ से २१ मुखी रुद्राक्ष,
4-----आपकी ग्रह-राशि-नक्षत्र के अनुसार रुद्राक्ष धारण करें
            A=माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्त्पत्ति रूद्र देव के आंसुओं से 
5-----गुंजा=श्वेत कुच, लाल कुच
             
a=गुंजा की लता पर लगी फली में बीज
                  b=चमत्कारी तंत्र वनस्पति गुंजा=( 1 to 13 )
                  c=**दुर्लभ काली गुंजा के कुछ प्रयोग:
                  d=क्या आप जानते है बड़े काम की और चमत्कारी होती है गूंजा
                  e=शुद्ध जल 
                  f=भूत-प्रेतादि शक्तियों के दर्शन 
                  g=कुछ प्रयोग ---
                  h=रक्त गुंजा
                  i=वे विशेष उपाय हैं जिन्हें आप केवल दीवाली के दिन ही कर सकते हैं
                  j=गुंजा 'रत्ती' सात सौ रुपए किलो, ढूंढ़ रहे व्यापारी 
                      जिले में अपने आप उगने वाली उपेक्षित सबसे महंगा बीज
                  k=गुंजा का प्रयोग अनेक तांत्रिक कार्यों में होता है. 
                  l=गुंजा की लता पर लगी फली में बीज
                  m=चमत्कारी तंत्र वनस्पति गुंजा
                  n=क्या आप जानते है बड़े काम की और चमत्कारी होती है गूंजा

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1>शंख 12 रहस्य


:a= ।।शंख।।----शंख के विषयमें बिसेस तथ्य -----शंख 12 रहस्य

शिव को छोड़कर सभी देवताओं पर शंख से जल अर्पित किया जा सकता है। शिव ने शंखचूड़ नामक दैत्य का वध किया था अत: शंख का जल शिव को निषेध बताया गया है।

शंख के नाम से कई बातें विख्यात है जैसे योग में शंख प्रक्षालन और शंख मुद्रा होती है, तो आयुर्वेद में शंख पुष्पी और शंख भस्म का प्रयोग किया जाता है। प्राचीनकाल में शंक लिपि भी हुआ करती थी। विज्ञान के अनुसार शंख समुद्र में पाए जाने वाले एक प्रकार के घोंघे का खोल है जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है।

शंख से वास्तुदोष ही दूर नहीं होता इससे आरोग्य वृद्धि, आयुष्य प्राप्ति, लक्ष्मी प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति, पितृ-दोष शांति, विवाह आदि की रुकावट भी दूर होती है। इसके अलावा शंख कई चमत्कारिक लाभ के लिए भी जाना जाता है। उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ शंख कैलाश मानसरोवर, मालद्वीप, लक्षद्वीप, कोरामंडल द्वीप समूह, श्रीलंका एवं भारत में पाये जाते हैं।

त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृत: करे।
नमित: सर्वदेवैश्य पाञ्चजन्य नमो स्तुते।।

वर्तमान समय में शंख का प्रयोग प्राय: पूजा-पाठ में किया जाता है। अत: पूजारंभ में शंखमुद्रा से शंख की प्रार्थना की जाती है। शंख को हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण और पवित्र माना गया माना गया है। शंख कई प्रकार के होते हैं। शंख के चमत्का‍रों और रहस्य के बारे में पुराणों में विस्तार से लिखा गया है। आओ जानते हैं शंख और शंख ध्वनि के 12 रहस्य..

1-पहला रहस्य-
शंख के प्रकार : शंख के प्रमुख 3 प्रकार होते हैं:- दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख। इन शंखों के कई उप प्रकार होते हैं। शंखों की शक्ति का वर्णन महाभारत और पुराणों में मिलता है। यह प्रकार इस तरह भी है- वामावर्ती, दक्षिणावर्ती तथा गणेश शंख।

शंख के अन्य प्रकार : लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देव शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, गरूड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख, गोमुखी शंख, पांचजन्य शंख, अन्नपूर्णा शंख, मोती शंख, हीरा शंख, शेर शंख आदि प्रकार के होते हैं।


द्विधासदक्षिणावर्तिर्वामावत्तिर्स्तुभेदत:
दक्षिणावर्तशंकरवस्तु पुण्ययोगादवाप्यते
यद्गृहे तिष्ठति सोवै लक्ष्म्याभाजनं भवेत्

2-द्वितीय रहस्य-
    शंख दो प्रकार के होते हैं:- दक्षिणावर्ती एवं वामावर्ती। लेकिन एक तीसरे प्रकार का भी शंख पाया जाता
    है जिसे मध्यावर्ती या गणेश शंख कहा गया है।

    * दक्षिणावर्ती शंख पुण्य के ही योग से प्राप्त होता है। यह शंख जिस घर में रहता है, वहां लक्ष्मी की वृद्धि
        होती  है। इसका प्रयोग अर्घ्य आदि देने के लिए विशेषत: होता है।
    * वामवर्ती शंख का पेट बाईं ओर खुला होता है। इसके बजाने के लिए एक छिद्र होता है। इसकी ध्वनि से                रोगोत्पादक कीटाणु कमजोर पड़ जाते हैं।
    * दक्षिणावर्ती शंख के प्रकार : दक्षिणावर्ती शंख दो प्रकार के होते हैं नर और मादा। जिसकी परत
       मोटी हो और भारी हो वह नर और जिसकी परत पतली हो और हल्का हो, वह मादा शंख होता है।

    * दक्षिणावर्ती शंख पूजा : दक्षिणावर्ती शंख की स्थापना यज्ञोपवीत पर करनी चाहिए। शंख का पूजन
       केसर युक्त चंदन से करें। प्रतिदिन नित्य क्रिया से निवृत्त होकर शंख की धूप-दीप-नैवेद्य-पुष्प से पूजा
       करें और तुलसी दल चढ़ाएं।

       प्रथम प्रहर में पूजन करने से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। द्वितीय प्रहर में पूजन करने से धन-
       सम्पत्ति में वृद्धि होती है। तृतीय प्रहर में पूजन करने से यश व कीर्ति में वृद्धि होती है। चतुर्थ प्रहर में
       पूजन करने से संतान प्राप्ति होती है। प्रतिदिन पूजन के बाद 108 बार या श्रद्धा के अनुसार मंत्र का
        जप करें।

3- तीसरा रहस्य...

     विविध नाम : शंख, समुद्रज, कंबु, सुनाद, पावनध्वनि, कंबु, कंबोज, अब्ज, त्रिरेख, जलज, अर्णोभव,
      महानाद, मुखर, दीर्घनाद, बहुनाद, हरिप्रिय, सुरचर, जलोद्भव, विष्णुप्रिय, धवल, स्त्रीविभूषण, पांचजन्य,               अर्णवभव आदि।

4-चौथा रहस्य...
     महाभारत यौद्धाओं के पास शंख : महाभारत में लगभग सभी यौद्धाओं के पास शंख होते थे। उनमें से
    कुछ यौद्धाओं के पास तो चमत्कारिक शंख होते थे। जैसे भगवान कृष्ण के पास पाञ्चजन्य शंख था
    जिसकी ध्वनि कई किलोमीटर तक पहुंच जाती थी।

     पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय:।
     पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर:।।-महाभारत

      अर्जुन के पास देवदत्त, युधिष्ठिर के पास अनंतविजय, भीष्म के पास पोंड्रिक, नकुल के पास सुघोष,
      सहदेव के पास मणिपुष्पक था। सभी के शंखों का महत्व और शक्ति अलग-अलग थी। कई देवी
       देवतागण शंख को अस्त्र रूप में धारण किए हुए हैं। महाभारत में युद्धारंभ की घोषणा और उत्साहवर्धन
       हेतु शंख नाद किया गया था।

      अथर्ववेद के अनुसार, शंख से राक्षसों का नाश होता है- शंखेन हत्वा रक्षांसि। भागवत पुराण में भी शंख
       का उल्लेख हुआ है। यजुर्वेद के अनुसार युद्ध में शत्रुओं का हृदय दहलाने के लिए शंख फूंकने वाला
       व्यक्ति अपिक्षित है।

      अद्भुत शौर्य और शक्ति का संबल शंखनाद से होने के कारण ही योद्धाओं द्वारा इसका प्रयोग किया
       जाता था। श्रीकृष्ण का ‘पांचजन्य’ नामक शंख तो अद्भुत और अनूठा था, जो महाभारत में विजय का
       प्रतीक बना।

5-पांचवां रहस्य...

नादब्रह्म : शंख को नादब्रह्म और दिव्य मंत्र की संज्ञा दी गई है। शंख की ध्वनि को ॐ की ध्वनि के समकक्ष माना गया है। शंखनाद से आपके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा का नाश तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शंख से निकलने वाली ध्वनि जहां तक जाती है वहां तक बीमारियों के कीटाणुओं का नाश हो जाता है।

6= छठा रहस्य...

धन प्राप्ति में सहायक शंख : शंख समुद्र मंथन के समय प्राप्त चौदह अनमोल रत्नों में से एक है। लक्ष्मी के साथ उत्पन्न होने के कारण इसे लक्ष्मी भ्राता भी कहा जाता है। यही कारण है कि जिस घर में शंख होता है वहां लक्ष्मी का वास होता है।

*यदि मोती शंख को कारखाने में स्था‍पित किया जाए तो कारखाने में तेजी से आर्थिक उन्नति होती है। यदि व्यापार में घाटा हो रहा है, दुकान से आय नहीं हो रही हो तो एक मोती शंख दुकान के गल्ले में रखा जाए तो इससे व्यापार में वृद्धि होती है।

*यदि मोती शंख को मंत्र सिद्ध व प्राण-प्रतिष्ठा पूजा कर स्थापित किया जाए तो उसमें जल भरकर लक्ष्मी के चित्र के साथ रखा जाए तो लक्ष्मी प्रसन्न होती है और आर्थिक उन्नति होती है।

*मोती शंख को घर में स्थापित कर रोज 'ॐ श्री महालक्ष्मै नम:' 11 बार बोलकर 1-1 चावल का दाना शंख में भरते रहें। इस प्रकार 11 दिन तक प्रयोग करें। यह प्रयोग करने से आर्थिक तंगी समाप्त हो जाती है।
इसी तरह प्रत्येक शंख से अलग अलग लाभ प्रा‍प्त किए जा सकते हैं।

7- सातवां रहस्य...

शंख पूजन का लाभ : शंख सूर्य व चंद्र के समान देवस्वरूप है जिसके मध्य में वरुण, पृष्ठ में ब्रह्मा तथा अग्र में गंगा और सरस्वती नदियों का वास है। तीर्थाटन से जो लाभ मिलता है, वही लाभ शंख के दर्शन और पूजन से मिलता है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है। शंख से शिवलिंग, कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता प्रसन्न होते हैं।

8-आठवां रहस्य...

सेहत में फायदेमंद शंख : शंखनाद से सकारात्मक ऊर्जा का सर्जन होता है जिससे आत्मबल में वृद्धि होती है। शंख में प्राकृतिक कैल्शियम, गंधक और फास्फोरस की भरपूर मात्रा होती है। प्रतिदिन शंख फूंकने वाले को गले और फेफड़ों के रोग नहीं होते।

शंख बजाने से चेहरे, श्वसन तंत्र, श्रवण तंत्र तथा फेफड़ों का व्यायाम होता है। शंख वादन से स्मरण शक्ति बढ़ती है। शंख से मुख के तमाम रोगों का नाश होता है। गोरक्षा संहिता, विश्वामित्र संहिता, पुलस्त्य संहिता आदि ग्रंथों में दक्षिणावर्ती शंख को आयुर्वद्धक और समृद्धि दायक कहा गया है।

पेट में दर्द रहता हो, आंतों में सूजन हो अल्सर या घाव हो तो दक्षिणावर्ती शंख में रात में जल भरकर रख दिया जाए और सुबह उठकर खाली पेट उस जल को पिया जाए तो पेट के रोग जल्दी समाप्त हो जाते हैं। नेत्र रोगों में भी यह लाभदायक है। यही नहीं, कालसर्प योग में भी यह रामबाण का काम करता है।

9-नौवां रहस्य...

सबसे बड़ा शंख : विश्व का सबसे बड़ा शंख केरल राज्य के गुरुवयूर के श्रीकृष्ण मंदिर में सुशोभित है, जिसकी लंबाई लगभग आधा मीटर है तथा वजन दो किलोग्राम है।

10-दसवां रहस्य...


श्रेष्ठ शंख के लक्षण:-
शंखस्तुविमल: श्रेष्ठश्चन्द्रकांतिसमप्रभ:
अशुद्धोगुणदोषैवशुद्धस्तु सुगुणप्रद:

अर्थात् निर्मल व चन्द्रमा की कांति के समानवाला शंख श्रेष्ठ होता है जबकि अशुद्ध अर्थात् मग्न शंख गुणदायक नहीं होता। गुणोंवाला शंख ही प्रयोग में लाना चाहिए। क्षीरसागर में शयन करने वाले सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु के एक हाथ में शंख अत्यधिक पावन माना जाता है। इसका प्रयोग धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष रूप से किया जाता है।

11-ग्यारहवां रहस्य-

शंख से वास्तु दोष का निदान : शंख से वास्तु दोष भी मिटाया जा सकता है। शंख को किसी भी दिन लाकर पूजा स्थान पर पवित्र करके रख लें और प्रतिदिन शुभ मुहूर्त में इसकी धूप-दीप से पूजा की जाए तो घर में वास्तु दोष का प्रभाव कम हो जाता है। शंख में गाय का दूध रखकर इसका छिड़काव घर में किया जाए तो इससे भी सकारात्मक उर्जा का संचार होता है।


12-बारहवां रहस्य-

*गणेश शंख: इस शंख की आकृति भगवान श्रीगणेश की तरह ही होती है। यह शंख दरिद्रता नाशक और धन प्राप्ति का कारक है।

*अन्नपूर्णा शंख : अन्नपूर्णा शंख का उपयोग घर में सुख-शान्ति और श्री समृद्धि के लिए अत्यन्त उपयोगी है। गृहस्थ जीवन यापन करने वालों को प्रतिदिन इसके दर्शन करने चाहिए।

*कामधेनु शंख : कामधेनु शंख का उपयोग तर्क शक्ति को और प्रबल करने के लिए किया जाता है। इस शंख की पूजा-अर्चना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

*मोती शंख : इस शंख का उपयोग घर में सुख और शांति के लिए किया जाता है। मोती शंख हृदय रोग नाशक भी है। मोती शंख की स्थापना पूजा घर में सफेद कपड़े पर करें और प्रतिदिन पूजन करें, लाभ मिलेगा।

ऐरावत शंख : ऐरावत शंख का उपयोग मनचाही साधना सिद्ध को पूर्ण करने के लिए, शरीर की सही बनावट देने तथा रूप रंग को और निखारने के लिए किया जाता है। प्रतिदिन इस शंख में जल डाल कर उसे ग्रहण करना चाहिए। शंख में जल प्रतिदिन 24 - 28 घण्टे तक रहे और फिर उस जल को ग्रहण करें, तो चेहरा कांतिमय होने लगता है।

*विष्णु शंख : इस शंख का उपयोग लगातार प्रगति के लिए और असाध्य रोगों में शिथिलता के लिए किया जाता है। इसे घर में रखने भर से घर रोगमुक्त हो जाता है।

*पौण्ड्र शंख : पौण्ड्र शंख का उपयोग मनोबल बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग विद्यार्थियों के लिए उत्तम है। इसे विद्यार्थियों को अध्ययन कक्ष में पूर्व की ओर रखना चाहिए।

*मणि पुष्पक शंख : मणि पुष्पक शंख की पूजा-अर्चना से यश कीर्ति, मान-सम्मान प्राप्त होता है। उच्च पद की प्राप्ति के लिए भी इसका पूजन उत्तम है।

*देवदत्त शंख : इसका उपयोग दुर्भाग्य नाशक माना गया है। इस शंख का उपयोग न्याय क्षेत्र में विजय दिलवाता है। इस शंख को शक्ति का प्रतीक माना गया है। न्यायिक क्षेत्र से जुड़े लोग इसकी पूजा कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

*दक्षिणावर्ती शंख : इस शंख को दक्षिणावर्ती इसलिए कहा जाता है क्योंकि जहां सभी शंखों का पेट बाईं ओर खुलता है वहीं इसका पेट विपरीत दाईं और खुलता है। इस शंख को देव स्वरूप माना गया है। दक्षिणावर्ती शंख के पूजन से खुशहाली आती है और लक्ष्मी प्राप्ति के साथ-साथ सम्पत्ति भी बढ़ती है। इस शंख की उपस्थिति ही कई रोगों का नाश कर देती है। दक्षिणावर्ती शंख पेट के रोग में भी बहुत लाभदायक है। विशेष कार्य में जाने से पहले दक्षिणावर्ती शंख के दर्शन करने भर से उस काम के सफल होने की संभावना बढ़ जाती है।

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2>   दक्षिणावर्ती शंख 

दक्षिणावर्ती शंख हिंदू संस्कृति में शंखों का विशेष महत्व है। पूजा अनुष्ठानों तथा अन्य मांगलिक उत्सवों में शंखों का उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त इनका उपयोग विभिन्न कामनाओं की पूर्ति हेतु और विभिन्न रोगों की चिकित्सा में भी किया जाता है। वैसे तो शंख अनेक प्रकार के होते हैं, लेकिन उनमें दो मुख्य हैं- दक्षिणावर्ती और वामावर्ती। अनेक चमत्कारी गुणों के कारण दक्षिणावर्ती शंख का अपना विशेष महत्व है। यह दुर्लभ तथा सर्वाधिक मूल्यवान होता है। असली दक्षिणावर्ती शंख को प्राण प्रतिष्ठित कर के उद्योग-व्यवसाय स्थल, कार्यालय, दुकान अथवा घर में स्थापित कर उसकी पूजा करने से दुख-दारिद्र्य से मुक्ति मिलती है और घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होता है। इस शंख की स्थापना करते समय निम्नलिखित श्लोक करना चाहिए। दक्षिणावर्तेशंखाय यस्य सद्मनितिष्ठति। मंगलानि प्रकुर्वंते तस्य लक्ष्मीः स्वयं स्थिरा। चंदनागुरुकर्पूरैः पूजयेद यो गृहेडन्वहम्। स सौभाग्य कृष्णसमो धनदोपमः।। यह विशिष्ट शंख शत्रुओं को निर्बल और रोग, अज्ञान तथा दारिद्र्य को दूर करने वाला और आयुवर्धक होता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है- शंख चंद्रार्कदैवत्यं मध्य वरुणदैवतन्। पृष्ठे प्रजापर्ति विद्यादग्रे गंगा सरस्वतीम्।। त्रैलोक्ये यानि तीर्थापि वासुदेवस्य चाज्ञया। शंखे तिष्ठन्ति विप्रेन्द्र तस्मा शंख प्रपुजयेत्।। दर्शनेन हि शंखस्य की पुनः स्पर्शनेन तु। विलयं यातिं पापनि हिमवद् भास्करोदयेः।। यह शंख चंद्र्र और सूर्य के समान देव स्वरूप है। इसके मध्य भाग में वरुण और पृष्ठ भाग में गंगा के साथ-साथ सारे तीर्थों का वास है। इसे कुबेर का स्वरूप भी माना जाता है। अतः इसकी पूजा अवश्य ही करनी चाहिए। इसके दर्शन मात्र से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। महर्षि मार्कण्डेय के अनुसार दक्षिावर्ती शंख की पूजा उपासना लक्ष्मी प्राप्ति का सर्वोत्तम उपाय है। भगवत्पाद आद्यगुरु शंकराचार्य के अनुसार दक्षिणावर्ती शंख की स्थापना एक श्रेष्ठ तांत्रिक प्रयोग है, जिसका प्रभाव तुरंत और अचूक होता है। इस तरह हमारे ऋषि मुनियों ने अपनी अपनी संहिताओं में दक्षिणावर्ती शंख का विशद उल्लेख किया है। वांछित फल की प्राप्ति के लिए इस शंख की अष्ट लक्ष्मी और सिद्ध कुबेर मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठा कर स्थापना करनी चाहिए। जिस घर मंे यह शंख रहता है वह सदा धन-धान्य से भरा रहता है। इसके अतिरिक्त जिस परिवार में शास्त्रोक्त उपायों द्वारा इसकी स्थापना की जाती है उस पर भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्म, राक्षस आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। शत्रुपक्ष कितना भी बलशाली क्यों न हो उस घर का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। इसके प्रभाव से दुर्घटना, मृत्यु भय, चोरी आदि से रक्षा होती है। शंख को सुख-समृद्धि, यश, कीर्ति तथा लक्ष्मी का साक्षात् प्रतीक माना गया है। धार्मिक कृत्यों, अनुष्ठान-साधना, तांत्रिक-क्रियाओं आदि में सफलता हेतु शंख का प्रयोग किया जाता है। दोषमुक्त शंख को किसी शुभ मुहूर्त में गंगाजल, गोघृत, कच्चे दूध, मधु, गुड़ आदि से अभिषेक करके अपने पूजा स्थल में लाल कपड़े के आसन पर स्थापित करें, घर में लक्ष्मी का वास बना रहेगा। लक्ष्मी जी की विशेष कृपा हेतु दक्षिणावर्ती शंख का जोड़ा, अर्थात् नर और मादा, देव प्रतिमा के सम्मुख स्थापित करें। शास्त्रों में अलग अलग प्रयोजनों हेतु अलग अलग शंखों का उल्लेख मिलता है। इस संदर्भ में एक संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है। अन्नपूर्णा शंख स्थापित करने से घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है। मणि पुष्पक तथा पांच जन्य शंख की स्थापना से घर का वास्तु दोष दूर होता है। इस शंख में जल भरकर घर में छिड़कने से सौभाग्य का आगमन होता है। गणेश शंख जल भर कर उसका सेवन करने से अनेक रोगों का शमन होता है। विष्णु शंख से कार्य स्थल में जल छिड़काव करने से उन्नति के अवसर बनने लगते हैं। दक्षिणावर्ती शंख कल्प करने के इच्छुक साधकों को निम्नलिखित सरल प्रयोग करना चाहिए। पूजन सामग्री - दोषमुक्त तथा पवित्र शंख, शुद्ध घी का दीपक, अगरबत्ती, कुंकुम, केसर, चावल, जलपात्र और दूध। विधि: शंख को दूध तथा जल से स्नान कराकर साफ कपड़े से उसे पोंछ कर उस पर चांदी का बर्क लगाएं। फिर घी का दीपक और जला लें। इसके बाद दूध तथा केसर के मिश्रण से शंख पर श्री एकाक्षरी मंत्र लिखकर उसे तांबे अथवा चांदी के पात्र में स्थापित कर दें।

जप मंत्र

अब निम्नलिखित मंत्र का जप करते हुए उस पर कुंकुम, चावल तथा इत्र अर्पित करें। फिर श्वेत पुष्प चढ़ाकर भोग के रूप में प्रसाद अर्पित करें।

मंत्र: ¬ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीधर करस्थायपयोनिधि जाताय श्री। दक्षिणावर्ती शंखाय ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीकराय पूज्याय नमः।।

अब मन से शंख का ध्यान करें।

ध्यान मंत्र

ध्यान मंत्र - ¬ ह्रीं श्रीं क्लीं ब्लूं श्रीदक्षिणावर्तशंखाय भगवते विश्वरूपाय सर्वयोगोश्वराय त्रैलोक्यनाथाय सर्वकामप्रदाय सर्वऋद्धि समृद्धि वांछितार्थसिद्धिदाय नमः। ¬ सर्वाभरण भूषिताय प्रशस्यांगोपांगसंयुताय कल्पवृक्षाध- स्थितायकामधेनु चिंतामणि-नवनिधिरूपाय चतुर्दश रत्न परिवृताय महासिद्धि-सहिताय लक्ष्मीदेवता युताय कृष्ण देवताकर ललिताय श्री शंखमहानिधिये नमः।

ध्यान मंत्र आवाहन अर्थात् स्तुति मंत्र है। इसके अतिरिक्त बीज मंत्र अथवा पांच जन्य गायत्री शंख मंत्र का ग्यारह माला जप करना भी आवश्यक है।

बीज मंत्र

बीज मंत्र: ¬ ह्रीं श्रीं क्लीं ब्लू दक्षिणमुखाय शंखनिधये समुद्रप्रभावय नमः। शंख का शाबर मंत्र: ¬ दक्षिणावर्ते शंखाय मम् गृह धनवर्षा कुरु-कुरु नमः।।

शंख गायत्री मंत्र

शंख गायत्री मंत्र: ¬ पांचजन्याय विद्महे। पावमानाय धीमहि। तंन शंखः प्रचोदयात्। ऋद्धि-सिद्धि तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए प्रयोग करें। दोषमुक्त दक्षिणावर्ती शंख का ऊपर वर्णित ध्यान मंत्र से पूजन करें। फिर गायत्री और बीज मंत्र दोनों का शंख के सामने बैठकर जप करते रहें।

एक मंत्र पूरा होने पर शंख में अग्नि में सामग्री होम करने की तरह चावल तथा नागकेसर दाएं हाथ के अंगूठे, मध्यमा तथा अनामिका से छोड़ते रहें। जब शंख भर जाए तो उसे घर में स्थापित कर लें।

ध्यान रखें कि शंख की पूंछ उत्तर -पूर्व दिशा की ओर रहे। किसी शुभ मुहूर्त अथवा दीवाली से पूर्व धन त्रयोदशी के दिन पुराने चावल तथा नागकेसर ऊपर वर्णित विधि से पुनः बदल लिया करें। इस प्रकार सिद्ध किया हुआ शंख लाला कपड़े में लपेटकर धन, आभूषण आदि रखने के स्थान पर स्थापित करने से जीवन के हर क्षेत्र में निरंतर श्री की प्राप्ति होने लगती है।

a=|| दक्षिणावर्ती शंख के महत्वपूर्ण उपाय ||

तंत्र शास्त्र में दक्षिणावर्ती शंख का विशेष महत
व है। इस शंख को विधि-विधान पूर्वक घर में रखने से कई प्रकार की बाधाएं शांत हो जाती है और धन की भी कमी नहीं होती। दक्षिणावर्ती शंख के अनेक लाभ हैं, लेकिन इसे घर में रखने से पहले इसका शुद्धिकरण अवश्य करना चाहिए।

इस विधि से करें शुद्धिकरण

लाल कपड़े के ऊपर दक्षिणावर्ती शंख को रखकर इसमें गंगाजल भरें और कुश के आसन पर बैठकर इस मंत्र का जप करें-

ऊं श्री लक्ष्मी सहोदराय नम:

इस मंत्र की कम से कम 5 माला जप करें।

ये हैं दक्षिणावर्ती शंख के उपाय

1- दक्षिणावर्ती शंख को अन्न भण्डार में रखने से अन्न, धन भण्डार में रखने से धन, वस्त्र भण्डार में रखने से
     वस्त्र की कभी कमी नहीं होती। शयन कक्ष में इसे रखने से शांति का अनुभव होता है।

2- इसमें शुद्ध जल भरकर, व्यक्ति, वस्तु, स्थान पर छिड़कने से दुर्भाग्य, अभिशाप, तंत्र-मंत्र आदि का प्रभाव             समाप्त हो जाता है।

3- किसी भी प्रकार के टोने-टोटके इस शंख के आगे निष्फल हो जाते हैं। दक्षिणावर्ती शंख जहां भी रहता है,
    वहां धन की कोई कमी नहीं रहती।

4- इसे घर में रखने से सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा स्वतः ही समाप्त हो जाती है
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3>रुद्राक्ष १ से २१ मुखी रुद्राक्ष,
1 Mukhi to 21 Mukhi Rudraksh

 रुद्राक्ष १ से २१ मुखी रुद्राक्ष,,,,1 Mukhi to 21 Mukhi Rudraksh
रुद्राक्ष देवता मंत्र

१ मुखी शिव 1-ॐ नमः शिवाय । 2 –ॐ ह्रीं नमः
२ मुखी अर्धनारीश्वर ॐ नमः
३ मुखी अग्निदेव ॐ क्लीं नमः
४ मुखी ब्रह्मा,सरस्वती ॐ ह्रीं नमः
५ मुखी कालाग्नि रुद्र ॐ ह्रीं नमः
६ मुखी कार्तिकेय, इन्द्र,इंद्राणी ॐ ह्रीं हुं नमः
७ मुखी नागराज अनंत,सप्तर्षि,सप्तमातृकाएँ ॐ हुं नमः
८ मुखी भैरव,अष्ट विनायक ॐ हुं नमः
९ मुखी माँ दुर्गा १-ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः २-ॐ ह्रीं हुं नमः
१० मुखी विष्णु १-ॐ नमो भवाते वासुदेवाय २-ॐ ह्रीं नमः
११ मुखी एकादश रुद्र १-ॐ तत्पुरुषाय विदमहे महादेवय धीमही तन्नो रुद्रः प्रचोदयात २-ॐ ह्रीं हुं नमः
१२ मुखी सूर्य १-ॐ ह्रीम् घृणिः सूर्यआदित्यः श्रीं २-ॐ क्रौं क्ष्रौं रौं नमः
१३ मुखी कार्तिकेय, इंद्र १-ऐं हुं क्षुं क्लीं कुमाराय नमः २-ॐ ह्रीं नमः
१४ मुखी शिव,हनुमान,आज्ञा चक्र ॐ नमः
१५ मुखी पशुपति ॐ पशुपत्यै नमः
१६ मुखी महामृत्युंजय ,महाकाल ॐ ह्रौं जूं सः त्र्यंबकम् यजमहे सुगंधिम् पुष्टिवर्धनम उर्वारुकमिव बंधनान्

मृत्योर्मुक्षीय सः जूं ह्रौं ॐ ,,
१७ मुखी विश्वकर्मा ,माँ कात्यायनी ॐ विश्वकर्मणे नमः
१८ मुखी माँ पार्वती ॐ नमो भगवाते नारायणाय
१९ मुखी नारायण ॐ नमो भवाते वासुदेवाय
२० मुखी ब्रह्मा ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म
२१ मुखी कुबेर ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्य समृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा


4>आपकी ग्रह-राशि-नक्षत्र के अनुसार रुद्राक्ष धारण करें
ग्रह राषि नक्षत्र लाभकारी रुद्राक्ष मंगल मेष मृगषिरा-चित्रा-धनिष्ठा ३ मुखी
शुक्र वृषभ भरणी-पूर्वाफाल्गुनी-पूर्वाषाढ़ा ६ मुखी,१३ मुखी,१५ मुखी
बुध मिथुन आष्लेषा-ज्येष्ठा-रेवती ४ मुखी
चन्द्र कर्क रोहिणी-हस्त-श्रवण २ मुखी, गौरी-शंकर रुद्राक्ष
सूर्य सिंह कृत्तिका-उत्तराफाल्गुनी-उत्तराषाढ़ा1 मुखी, १२ मुखी
बुध कन्या आष्लेषा-ज्येष्ठा-रेवती ४ मुखी
शुक्र तुला भरणी-पूर्वाफाल्गुनी-पूर्वाषाढ़ा ६ मुखी,१३ मुखी,१५ मुखी
मंगल वृष्चिक मृगषिरा-चित्रा-धनिष्ठा ३ मुखी
गुरु धनु-मीन पुनर्वसु-विषाखा-पूर्वाभाद्रपद ५ मुखी
शनि मकर-कुंभ पुष्य-अनुराधा-उत्तराभाद्रपद ७ मुखी, १४ मुखी
शनि मकर-कुंभ पुष्य-अनुराधा-उत्तराभाद्रपद ७ मुखी, १४ मुखी
गुरु धनु-मीन पुनर्वसु-विषाखा-पूर्वाभाद्रपद ५ मुखी
राहु - आर्द्रा-स्वाति-षतभिषा८ मुखी, १८ मुखी
केतु - अष्विनी-मघा-मूल ९ मुखी,१७ मुखी
नवग्रह दोष निवारणार्थ १० मुखी, २१ मुखी
विषेष : १० मुखी और ११ मुखी किसी एक ग्रह का प्रतिनिधित्व नहीं करते।बल्कि नवग्रहों के दोष

निवारणार्थ प्रयोग मे लाय जाते हैं ।
ॐ तत्पुरुषाय विदमहे, महादेवाय धीमहितन्नो रुद्र: प्रचोदयात्। ॐ ,, ૐ Ψ ॐ नमः शिवाय Ψ ૐ
ॐ तत्पुरुषाय विदमहे, महादेवाय धीमहितन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।
रुद्रस्य अक्षि रुद्राक्ष:, अक्ष्युपलक्षितम्अश्रु, तज्जन्य: वृक्ष:। रुद्राक्षाणांतुभद्राक्ष:स्यान्महाफलम्।
ग्रहणे विषुवे चैवमयने संक्रमेऽपि वा।
दर्द्गोषु पूर्णमसे च पूर्णेषु दिवसेषु च।
रुद्राक्षधारणात् सद्यः सर्वपापैर्विमुच्यते॥
यथा च दृश्यते लोके रुद्राक्ष: फलद: शुभ:।
न तथा दृश्यते अन्या च मालिका परमेश्वरि:।। अर्थात संसार में रुद्राक्ष की माला की तरह अन्य कोई

दूसरी माला फलदायक और शुभ नहीं है।
श्रीमद्- देवीभागवत में लिखा है :रुद्राक्षधारणाद्य श्रेष्ठं न किञ्चिदपि विद्यते।
अर्थात संसार में रुद्राक्ष धारण से बढ़कर श्रेष्ठ ===

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A=माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्त्पत्ति रूद्र देव के आंसुओं से हुई है। रुद्राक्ष का प्रयोग दो रूपों में किया जाता है। एक आध्यात्मिक और दूसरा वैज्ञानिक और स्वास्थवर्धक।

अध्यात्मिक प्रभावअध्यात्मिक प्रभाव

एक मुखी रुद्राक्ष का प्रतीक भगवान शिव को माना जाता है तथा इस एकमुखी रुद्राक्ष का सतारुढ़ ग्रह सूर्य है अत: सूर्य द्वारा शुभ फलों की प्राप्ति तथा सूर्य की अनुकूलता हेतु इसे धारण किया जाता है। एक मुखी रुद्राक्ष आध्यात्मिकता का प्रकाशक बनकर मुक्ति का मार्ग प्राश्स्त करता है. इसे पूजने तथा धारण करने से व्यक्ति के समस्त दुखों एवं पापों का शमन होता है तथा शांति एवं सुख प्राप्त होता है. उनके इर्द गिर्द अष्ट सिद्धियाँ भ्रमण करती रहती हैं। और मोक्ष कों प्राप्त करते है और जन्म जन्म के चक्कर से मुक्त होत जाते है। शास्त्रों में वर्णित है की एक मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति कों कभी भी धन धान की कमी नहीं होती है और आकस्मित मौत भी नहीं हो सकती.

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5>गुंजा=श्वेत कुच, लाल कुच

गुंजा का प्रयोग अनेक तांत्रिक कार्यों में होता है. यह एक लता का बीज होता है. जो लाल रंग का होता है. सफ़ेद और काले रंग की गुंजा भी मिल सकती है. काली गुंजा बहुत दुर्लभ होती है और वशीकरण के कार्यों में रामबाण की तरह काम करती है. गुंजा के बीजों के अलावा उसकी जड़ को बहुत उपयोगी मन गया है. गुंजा की महिमा कुछ इस प्रकार है

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१. आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रुभी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.
२. गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.
३. जिस व्यक्ति को नजर बहुत लगती हो उसको गुंजा का ब्रासलेट कलाई पर बांधना चाहिए. किसी सभा में या भीड़ भाद वाली जगह पर जाते समय गुंजा का ब्रासलेट पहनने से दूसरे लोग प्रभावित होते हैं.
४. गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.
काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।
रक्तगुंजा: गुंजा का बीज होता है, जो लाल रंग का होता है। इस पर काले रंग का छोटा सा बिंदू बना होता है। लक्ष्मी की प्राप्ति व उसे चिरकाल तक स्थिर रखने हेतु गुंजा का प्रयोग किया जाता है। तंत्रशास्त्र में इसका कई रूपों में प्रयोग होता है।

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गुंजा

a=गुंजा की लता पर लगी फली में बीज

गुंजा या रत्ती (Coral Bead) लता जाति की एक वनस्पति है। शिम्बी के पक जाने पर लता शुष्क हो जाती है। गुंजा के फूल सेम की तरह होते हैं। शिम्बी का आकार बहुत छोटा होता है, परन्तु प्रत्येक में 4-5 गुंजा बीज निकलते हैं अर्थात सफेद में सफेद तथा रक्त में लाल बीज निकलते हैं। अशुद्ध फल का सेवन करने से विसूचिका की भांति ही उल्टी और दस्त हो जाते हैं। इसकी जड़े भ्रमवश मुलहठी के स्थान में भी प्रयुक्त होती है।

गुंजा गुंजा दो प्रकार की होती है।विभिन्न भाषाओं में नामअंग्रेजी Coral Bead हिन्दी गुंजा, चौंटली, घुंघुची, रत्ती संस्कृत सफेद केउच्चटा, कृष्णला, रक्तकाकचिंची बंगाली श्वेत कुच, लाल कुच मराठी गुंजा गुजराती धोलीचणोरी, राती, चणोरी तेलगू गुलुविदे फारसी चश्मेखरुस अरबी हबसुफेद

हानिकारक प्रभाव

पाश्चात्य मतानुसार गुंजा के फलों के सेवन से कोई हानि नहीं होती है। परन्तु क्षत पर लगाने से विधिवत कार्य करती है। सुश्रुत के मत से इसकी मूल गणना है।

गुंजा को आंख में डालने से आंखों में जलन और पलकों में सूजन हो जाती है।

गुण

दोनों गुंजा, वीर्यवर्द्धक (धातु को बढ़ाने वाला), बलवर्द्धक (ताकत बढ़ाने वाला), ज्वर, वात, पित्त, मुख शोष, श्वास, तृषा, आंखों के रोग, खुजली, पेट के कीड़े, कुष्ट (कोढ़) रोग को नष्ट करने वाली तथा बालों के लिए लाभकारी होती है। ये अन्यंत मधूर, पुष्टिकारक, भारी, कड़वी, वातनाशक बलदायक तथा रुधिर विकारनाशक होता है। इसके बीज वातनाशक और अति बाजीकरण होते हैं। गुन्जा से वासिकर्न भि कर सक्ते ही ग्न्जा

अंग्रेजी Coral Bead हिन्दी गुंजा, चौंटली, घुंघुची, रत्ती संस्कृत सफेद केउच्चटा, कृष्णला, रक्तकाकचिंची बंगाली श्वेत कुच, लाल कुच मराठी गुंजा गुजराती धोलीचणोरी, राती, चणोरी तेलगू गुलुविदे फारसी चश्मेखरुस अरबी हबसुफेद
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b=चमत्कारी तंत्र वनस्पति गुंजा

चमत्कारी है गुंजा
तांत्रिक जड़ीबूटियां भाग -9

गुंजा एक फली का बीज है। इसको धुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसकी बेल काफी कुछ मटर की तरह ही लगती है किन्तु अपेक्षाकृत मजबूत काष्ठीय तने वाली। इसे अब भी कहीं कहीं आप सुनारों की दुकानों पर देख सकते हैं। कुछ वर्ष पहले तक सुनार इसे सोना तोलने के काम में लेते थे क्योंकि इनके प्रत्येक दाने का वजन लगभग बराबर होता है करीब 120 मिलीग्राम। ये हमारे जीवन में कितनी बसी है इसका अंदाज़ा मुहावरों और लोकोक्तियों में इसके प्रयोग से लग जाता है।

यह तंत्र शास्त्र में जितनी मशहूर है उतनी ही आयुर्वेद में भी। आयुर्वेद में श्वेत गूंजा का ही अधिक प्रयोग होता है औषध रूप में साथ ही इसके मूल का भी जो मुलैठी के समान ही स्वाद और गुण वाली होती है। इसीकारण कई लोग मुलैठी के साथ इसके मूल की भी मिलावट कर देते हैं।

वहीं रक्त गूंजा बेहद विषैली होती है और उसे खाने से उलटी दस्त पेट में मरोड़ और मृत्यु तक सम्भव है। आदिवासी क्षेत्रों में पशु पक्षी मारने और जंगम विष निर्माण में अब भी इसका प्रयोग होता है।

गुंजा की तीन प्रजातियां मिलती हैं:-

1• रक्त गुंजा: लाल काले रंग की ये प्रजाति भी तीन तरह की मिलती है जिसमे लाल और काले रंगों का अनुपात 10%, 25% और 50% तक भी मिलता है।

ये मुख्यतः तंत्र में ही प्रयोग होती है।

श्वेत गुंजा • श्वेत गुंजा में भी एक सिरे पर कुछ कालिमा रहती है। यह आयुर्वेद और तंत्र दोनों में ही सामान रूप से प्रयुक्त होती है। ये लाल की अपेक्षा दुर्लभ होती है।

काली गुंजा: काली गुंजा दुर्लभ होती है, आयुर्वेद में भी इसके प्रयोग लगभग नहीं हैं हाँ किन्तु तंत्र प्रयोगों में ये बेहद महत्वपूर्ण है।

इन तीन के अलावा एक अन्य प्रकार की गुंजा पायी जाती है पीली गुंजा ये दुर्लभतम है क्योंकि ये कोई विशिष्ट प्रजाति नहीं है किन्तु लाल और सफ़ेद प्रजातियों में कुछ आनुवंशिक विकृति होने पर उनके बीज पीले हो जाते हैं। इस कारण पीली गूंजा कभी पूर्ण पीली तो कभी कभी लालिमा या कालिमा मिश्रित पीली भी मिलती है।

इस चमत्कारी वनस्पति गुंजा के कुछ प्रयोग:-

1• सम्मान प्रदायक :

शुद्ध जल (गंगा का, अन्य तीर्थों का जल या कुएं का) में गुंजा की जड़ को चंदन की भांति घिसें। अच्छा यही है कि किसी ब्राह्मण या कुंवारी कन्या के हाथों से घिसवा लें। यह लेप माथे पर चंदन की तरह लगायें। ऐसा व्यक्ति सभा-समारोह आदि जहां भी जायेगा, उसे वहां विशिष्ट सम्मान प्राप्त होगा।

2• कारोबार में बरकत

किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार के दिन 1 तांबे का सिक्का, 6 लाल गुंजा लाल कपड़े में बांधकर प्रात: 11 बजे से लेकर 1 बजे के बीच में किसी सुनसान जगह में अपने ऊपर से 11 बार उसार कर 11 इंच गहरा गङ्ढा खोदकर उसमें दबा दें। ऐसा 11 बुधवार करें। दबाने वाली जगह हमेशा नई होनी चाहिए। इस प्रयोग से कारोबार में बरकत होगी, घर में धन रूकेगा।

3"• ज्ञान-बुद्धि वर्धक :

(क) गुंजा-मूल को बकरी के दूध में घिसकर हथेलियों पर लेप करे, रगड़े कुछ दिन तक यह प्रयोग करते रहने से व्यक्ति की बुद्धि, स्मरण-शक्ति तीव्र होती है, चिंतन, धारणा आदि शक्तियों में प्रखरता व तीव्रता आती है।

(ख) यदि सफेद गुंजा के 11 या 21 दाने अभिमंत्रित करके विद्यार्थियों के कक्ष में उत्तर पूर्व में रख दिया जाये तो एकाग्रता एवं स्मरण शक्ति में लाभ होता है।

4• वर-वधू के लिए :

विवाह के समय लाल गुंजा वर के कंगन में पिरोकर पहनायी जाती है। यह तंत्र का एक प्रयोग है, जो वर की सुरक्षा, समृद्धि, नजर-दोष निवारण एवं सुखद दांपत्य जीवन के लिए है। गुंजा की माला आभूषण के रूप में पहनी जाती है।

5• पुत्रदाता :

शुभ मुहुर्त में श्वेत गुंजा की जड़ लाकर दूध से धोकर, सफेद चन्दन पुष्प से पूजा करके सफेद धागे में पिरोकर। “ऐं क्षं यं दं” मंत्र के ग्यारह हजार जाप करके स्त्री या पुरूष धारण करे तो संतान सुख की प्राप्ती होती है।

6• वशीकरण -

(क) आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रु भी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.

(ख) गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.

( गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.

7• विद्वेषण में प्रयोग :

किसी दुष्ट, पर-पीड़क, गुण्डे तथा किसी का घर तोड़ने वाले के घर में लाल गुंजा - रवि या मंगलवार के दिन इस कामना के साथ फेंक दिये जाये - 'हे गुंजा ! आप मेरे कार्य की सिद्धि के लिए इस घर-परिवार में कलह (विद्वेषण) उत्पन्न कर दो' तो आप देखेंगे कि ऐसा ही होने लगता है।

8• विष-निवारण :
गुंजा की जड़ धो-सुखाकर रख ली जाये। यदि कोई व्यक्ति विष-प्रभाव से अचेत हो रहा हो तो उसे पानी में जड़ को घिसकर पिलायें।

इसको पानी में घिस कर पिलाने से हर प्रकार का विष उतर जाता है।

9• दिव्य दृष्टि :-

(क) अलौकिक तामसिक शक्तियों के दर्शन :

भूत-प्रेतादि शक्तियों के दर्शन करने के लिए मजबूत हृदय वाले व्यक्ति, गुंजा मूल को रवि-पुष्य योग में या मंगलवार के दिन- शुद्ध शहद में घिस कर आंखों में अंजन (सुरमा/काजल) की भांति लगायें तो भूत, चुडैल, प्रेतादि के दर्शन होते हैं।

(ख) गुप्त धन दर्शन :

अंकोल या अंकोहर के बीजों के तेल में गुंजा-मूल को घिस कर आंखों पर अंजन की तरह लगायें। यह प्रयोग रवि-पुष्य योग में, रवि या मंगलवार को ही करें। इसको आंजने से पृथ्वी में गड़ा खजाना तथा आस पास रखा धन दिखाई देता है।

10• शत्रु में भय उत्पन्न :

गुंजा-मूल (जड़) को किसी स्त्री के मासिक स्राव में घिस कर आंखों में सुरमे की भांति लगाने से शत्रु उसकी आंखों को देखते ही भाग खड़े होते हैं।

11• शत्रु दमन प्रयोग :

यदि लड़ाई झगड़े की नौबत हो तो काले तिल के तेल में गुंजामूल को घिस कर, उस लेप को सारे शरीर में मल लें। ऐसा व्यक्ति शत्रुओं को बहुत भयानक तथा सबल दिखाई देगा। फलस्वरूप शत्रुदल चुपचाप भाग जायेगा।

12• रोग - बाधा

(क) कुष्ठ निवारण प्रयोग :

गुंजा मूल को अलसी के तेल में घिसकर लगाने से कुष्ठ (कोढ़) के घाव ठीक हो जाते हैं।

(ख)अंधापन समाप्त :

गुंजा-मूल को गंगाजल में घिसकर आंखों मे लगाने से आंसू बहुत आते हैं।नेत्रों की सफाई होती है आँखों का जाल कटता है।

देशी घी (गाय का) में घिस कर लगाते रहने से इन दोनों प्रयोगों से अंधत्व दूर हो जाता है।

(ग) वाजीकरण:

श्वेत गुंजा की जड को गाय के शुद्ध घृत में पीसकर लेप तैयार करें। यह लेप शिश्न पर मलने से कामशक्ति की वृद्धि के साथ स्तंभन शक्ति में भी वृद्धि होती है।

13: नौकरी में बाधा
राहु के प्रभाव के कारण व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो तो लाल गुंजा व सौंफ को लाल वस्त्र में बांधकर अपने कमरे में रखें।
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c=**दुर्लभ काली गुंजा के कुछ प्रयोग:

1• काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।

2• दिवाली के दिन अपने गल्‍ले के नीचे काली गुंजा जंगली बेल के दाने डालने से व्‍यवसाय में हो रही हानि रूक जाती है।

3• दिवाली की रात घर के मुख्‍य दरवाज़े पर सरसों के तेल का दीपक जला कर उसमें काली गुंजा के 2-4 दाने डाल दें। ऐसा करने पर घर सुरक्षित और समृद्ध रहता है।

4• होलिका दहन से पूर्व पांच काली गुंजा लेकर होली की पांच परिक्रमा लगाकर अंत में होलिका की ओर पीठ करके पाँचों गुन्जाओं को सिर के ऊपर से पांच बार उतारकर सिर के ऊपर से होली में फेंक दें।

5• घर से अलक्ष्मी दूर करने का लघु प्रयोग-

ध्यानमंत्र :

ॐ तप्त-स्वर्णनिभांशशांक-मुकुटा रत्नप्रभा-भासुरीं ।
नानावस्त्र-विभूषितां त्रिनयनां गौरी-रमाभ्यं युताम् ।
दर्वी-हाटक-भाजनं च दधतीं रम्योच्चपीनस्तनीम् ।
नित्यं तां शिवमाकलय्य मुदितां ध्याये अन्नपूर्णश्वरीम् ॥

मन्त्र :

ॐ ह्रीम् श्रीम् क्लीं नमो भगवति माहेश्वरि मामाभिमतमन्नं देहि-देहि अन्नपूर्णों स्वाहा ।


विधि :

जब रविवार या गुरुवार को पुष्प नक्षत्र हो या नवरात्र में अष्टमी के दिन या दीपावली की रात्रि या अन्य किसी शुभ दिन से इस मंत्र की एक माला रुद्राक्ष माला से नित्य जाप करें । जाप से पूर्व भगवान श्रीगणेश जी का ध्यान करें तथा भगवान शिव का ध्यान कर नीचे दिये ध्यान मंत्र से माता अन्नपूर्णा का ध्यान करें ।

इस मंत्र का जाप दुकान में गल्ले में सात काली गुंजा के दाने रखकर शुद्ध आसन, (कम्बल आसन, या साफ जाजीम आदि ) पर बैठकर किया जाए तो व्यापार में आश्चर्यजनक लाभ महसूस होने गेगा ।

6• कष्टों से छुटकारे हेतु

यदि संपूर्ण दवाओं एवं डाक्टर के इलाज के बावजूद भी यदि घुटनों और पैरों का दर्द दूर नहीं हो रहा हो तो रवि पुष्य नक्षत्र, शनिवार या शनि आमवस्या के दिन यह उपाय करें। प्रात:काल नित्यक्रम से निवृत हो स्नानोपरांत लोहे की कटोरी में श्रद्धानुसार सरसों का तेल भरें। 7 चुटकी काले तिल, 7 लोहे की कील और 7 लाल और 7 काली गुंजा उसमें डाल दें। तेल में अपना मुंह देखने के बाद अपने ऊपर से 7 बार उल्टा उसारकर पीपल के पेड़ के नीचे इस तेल का दीपक जला दें 21 परिक्रमा करें और वहीं बैठकर 108 बार

ऊँ शं विधिरुपाय नम:।।

इस मंत्र का जाप करें। ऐसा 11 शनिवार करें। कष्टों से छुटकारा मिलेगा।


पीली गुंजा:

1• पीले रंग की गुंजा के बीज ,हल्दी की गांठे, सात कौडियों की पूजा अर्चना करके श्री लक्ष्मीनारायण भगवान के मंत्रों से अभिमंत्रित करके पूजा स्थान में रखने से दाम्पत्य सुख एवं परिवार,मे एकता तथा आर्थिक व्यावसायिक सिद्धि मिलती है

2• इसकी माला या ब्रेसलेट धारण करने से व्यक्ति का चित्त शांत रहता है, तनाव से मुक्ति मिलती है।
3• पीत गुंजा की माला गुरु गृह को अनुकूल करती है।
4• अनिद्रा से पीड़ित लोगों को इसकी माला धारण करने से लाभ मिलता है।
5• बड़ी उम्र के जो लोग स्वप्न में डरते हैं या जिन्हें अक्सर ये लगता है की कोई उनका गला दबा रहा है उन्हें इसकी माला या ब्रेसलेट पहनना चाहिए।

अन्य किसी जानकारी, समस्या समाधान और कुंडली विश्लेषण हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।
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d=क्या आप जानते है बड़े काम की और चमत्कारी होती है गूंजा


गुंजा या रत्ती (Coral Bead) लता जाति की एक वनस्पति है। शिम्बी के पक जाने पर लता शुष्क हो जाती है। गुंजा के फूल सेम की तरह होते हैं। शिम्बी का आकार बहुत छोटा होता है, परन्तु प्रत्येक में 4-5 गुंजा बीज निकलते हैं अर्थात सफेद में सफेद तथा रक्त में लाल बीज निकलते हैं। अशुद्ध फल का सेवन करने से विसूचिका की भांति ही उल्टी और दस्त हो जाते हैं। इसकी जड़े भ्रमवश मुलहठी के स्थान में भी प्रयुक्त होती है

इसको चिरमिटी, धुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसे आप सुनारों की दुकानों पर देख सकते हैं। इसका वजन एक रत्ती होता है, जो सोना तोलने के काम आती है। यह तीन रंगों में मिलती है। सफेद गुंजा का प्रयोग तंत्र तथा उपचार में होता है, न मिलने पर लाल गुंजा भी प्रयोग में ली जा सकती है। परंतु काली गुंजा दुर्लभ होती है।

गुंजा का प्रयोग अनेक तांत्रिक कार्यों में होता है. यह एक लता का बीज होता है. जो लाल रंग का होता है. सफ़ेद और काले रंग की गुंजा भी मिल सकती है. काली गुंजा बहुत दुर्लभ होती है और वशीकरण के कार्यों में रामबाण की तरह काम करती है. गुंजा के बीजों के अलावा उसकी जड़ को बहुत उपयोगी मन गया है. गुंजा की महिमा कुछ इस प्रकार है -

वर-वधू के लिए : विवाह के समय लाल गुंजा वर के कंगन में पिरोकर पहनायी जाती है। यह तंत्र का एक प्रयोग है, जो वर की सुरक्षा, समृद्धि, नजर-दोष निवारण एवं सुखद दांपत्य जीवन के लिए है। गुंजा की माला आभूषण के रूप में पहनी जाती है। भगवान श्री कृष्ण भी गुंजामाला धारण करते थे। पुत्र की चाह वाली स्वस्थ स्त्री, शुभ नक्षत्र में गुंजा की जड़ को ताबीज में भरकर कमर में धारण करें। ऐसा करने से स्त्री पुत्र लाभ करती है।


विद्वेषण में प्रयोग :

किसी दुष्ट, पर-पीड़क, गुण्डे तथा किसी का घर तोड़ने वाले के घर में लाल गुंजा - रवि या मंगलवार के दिन इस कामना के साथ फेंक दिये जाये - 'हे गुंजा ! आप मेरे कार्य की सिद्धि के लिए इस घर-परिवार में कलह (विद्वेषण) उत्पन्न कर दो' तो आप देखेंगे कि ऐसा ही होने लगता है। विष-निवारण : गुंजा की जड़ धो-सुखाकर रख ली जाये।

यदि कोई व्यक्ति विष-प्रभाव से अचेत हो रहा हो तो उसे पानी में जड़ को घिसकर पिलायें। इसको पानी में घिस कर पिलाने से हर प्रकार का विष उतर जाता है।

सम्मान प्रदायक :

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e=शुद्ध जल (गंगा का, अन्य तीर्थों का जल या कुएं का) में गुंजा की जड़ को चंदन की भांति घिसें। अच्छा यही है कि किसी ब्राह्मण या कुंवारी कन्या के हाथों से घिसवा लें। यह लेप माथे पर चंदन की तरह लगायें। ऐसा व्यक्ति सभा-समारोह आदि जहां भी जायेगा, उसे वहां विशिष्ट सम्मान प्राप्त होगा। पुत्रदाता : पुत्र की चाह वाली स्वस्थ स्त्री, शुभ नक्षत्र में गुंजा की जड़ को ताबीज में भरकर कमर में धारण करें। ऐसा करने से स्त्री पुत्र लाभ प्राप्त करती है। शत्रु में भय उत्पन्न : गुंजा-मूल (जड़) को किसी स्त्री के मासिक स्राव में घिस कर आंखों में सुरमे की भांति लगाने से शत्रु उसकी आंखों को देखते ही भाग खड़े होते हैं।

अलौकिक तामसिक शक्तियों के दर्शन :

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f=भूत-प्रेतादि शक्तियों के दर्शन करने के लिए मजबूत हृदय वाले व्यक्ति, गुंजा मूल को रवि-पुष्य योग में या मंगलवार के दिन- शुद्ध शहद में घिस कर आंखों में अंजन (सुरमा/काजल) की भांति लगायें तो भूत, चुडैल, प्रेतादि के दर्शन होते हैं। ज्ञान-


बुद्धि वर्धक :

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g=कुछ प्रयोग ---

 गुंजा-मूल को बकरी के दूध में घिसकर हथेलियों पर लेप करे, रगड़े कुछ दिन तक यह प्रयोग करते रहने से व्यक्ति की बुद्धि, स्मरण-शक्ति तीव्र होती है, चिंतन, धारणा आदि शक्तियों में प्रखरता व तीव्रता आती है। गुप्त धन दर्शन : अंकोल या अंकोहर के बीजों के तेल में गुंजा-मूल को घिस कर आंखों पर अंजन की तरह लगायें। यह प्रयोग रवि-पुष्य योग में, रवि या मंगलवार को ही करें। इसको आंजने से पृथ्वी में गड़ा खजाना तथा आस पास रखा धन दिखाई देता है।

शत्रु दमन प्रयोग : काले तिल के तेल में गुंजामूल को घिस कर, उस लेप को सारे शरीर में मल लें। ऐसा व्यक्ति शत्रुओं को बहुत भयानक तथा सबल दिखाई देगा। फलस्वरूप शत्रुदल चुपचाप भाग जायेगा। कुष्ठ निवारण प्रयोग : गुंजा मूल को अलसी के तेल में घिसकर लगाने से कुष्ठ (कोढ़) के घाव ठीक हो जाते हैं।

अंधापन समाप्त : गुंजा-मूल को गंगाजल में घिसकर आंखों मे लगाने से आंसू बहुत आते हैं। देशी घी (गाय का) में घिस कर लगाते रहने से इन दोनों प्रयोगों से अंधत्व दूर हो जाता है।

१. आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रु भी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.

२. गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.

३. जिस व्यक्ति को नजर बहुत लगती हो उसको गुंजा का ब्रासलेट कलाई पर बांधना चाहिए. किसी सभा में या भीड़ भाद वाली जगह पर जाते समय गुंजा का ब्रासलेट पहनने से दूसरे लोग प्रभावित होते हैं.

४. गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.

काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।
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h=रक्त गुंजा

रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र हो,शुक्र तथा मंगल गोचर में अनुकूल हों अथवा कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हस्त नक्षत्र हो, कृष्ण चतुर्दशी को स्वाति नक्षत्र हो या पूर्णिमा को शतभिषा नक्षत्र हो, तो आधी रात को निमंत्रण पूर्वक रक्त गुंजा की जड़ उखाड़ कर ले आएं। घर में लाकर उसकी मिट्टी हटा कर साफ कर दें फिर दूध से स्नान करवा कर धूप-दीप से पूजा करें। इस जड़ के घर में रहने से सर्प भय नहीं रहता…

गुंजा एक प्रकार का लाल रंग का बीज है जो देखने में बहुत सुंदर लगता है। इसके ऊपरी हिस्से पर छोटा सा काला बिंदु होता है। इसकी बेल जंगलों में वृक्षों पर लिपटी पाई जाती है। इसे रत्ती भी कहते हैं और किसी जमाने में इससे सोने की तौल की जाती थी। गुंजा का एक और प्रचलित नाम घुंघची है। यह दो प्रकार की होती है रक्तगुंजा और श्वेत गुंजा। इसके तांत्रिक प्रयोग निम्न हैं-

1-बकरी के दूध में गुंजा मूल को घिस कर हथेलियों पर रगड़ने से बुद्धि का विकास होता है। मेधा,चिंतन, धारणा, विवेक तथा स्मृति की प्रखरता के लिए यह प्रयोग उत्तम होता है।

2-रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र हो,शुक्र तथा मंगल गोचर में अनुकूल हों अथवा कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हस्त नक्षत्र हो , कृष्ण चतुर्दशी को स्वाति नक्षत्र हो या पूर्णिमा को शतभिषा नक्षत्र हो, तो आधी रात को निमंत्रण पूर्वक रक्त गुंजा की जड़ उखाड़ कर ले आएं। घर में लाकर उसकी मिट्टी हटा कर साफ कर दें फिर दूध से स्नान करवा कर धूप-दीप से पूजा करें। इस जड़ के घर में रहने से सर्प भय नहीं रहता।

3- इसकी जड़ को घिस कर माथे पर तिलक की तरह लगाने से मनुष्य में सम्मोहक शक्ति आ जाती है और हर व्यक्ति उसकी बात मानने को तैयार हो जाता है।

4-कहते हैं कि गुंजा की जड़ को बेल पत्र के साथ घिस कर काजल की तरह लगाने से पिछले जीवन की घटनाएं याद आ जाती हैं।

इसकी जड़ को गाय के दूध में पीस कर शरीर पर लेपन करने से कोई भी तांत्रिक साधना सफल होती है यहां तक कि कभी-कभी अशरीरी आत्माएं भी वश में हो जाती हैं जो हमेशा साधक की सहायता करती हैं और उसे छोड़ कर कहीं नहीं जातीं।

श्वेत गुंजा के तांत्रिक प्रयोग

जिस दिन कृष्ण पक्ष की अष्टमी या चतुर्दशी हो उस दिन निम्न मंत्र पढ़ते हुए जंगल से श्वेत गुंजा की फली और वहीं से मिट्टी खोद कर लावे और अपने बगीचे में बो दे ।

मंत्र-ऊँ श्वेतवर्णे सितपर्वतवसिनि अप्रतिहते मम कार्य कुरु ठःठःस्वाहा।

फली लाने और उसे बोते समय यही मंत्र पढें़। फिर प्रति दिन सायंकाल उसमें पानी डालते रहें और इस मंत्र का जप करते रहें।

ऊँ सितवर्णे श्वेतपर्वतवासिनि सर्व कार्याणि कुरु कुरु अप्रतिहते नमो नमः।

गुंजा के बीजों को किसी वृक्ष के समीप बोना चाहिए तकि वह लता उसका सहारा लेकर चढ़ सके। जब लता बड़ी हो जाए तो उसी वृक्ष के नीचे बैठ कर अंगन्यास करें और उसकी पंचोपचार पूजा कर निम्न मंत्र की 21 माला जाप करें।

ऊँ श्वेत वर्णे पद्म मुखे सर्व ज्ञानमये सर्व शक्तिमिति सितपर्वतवासिनि भगवति हृं मम कार्य कुरु कुरु ठःठःनमः स्वाहा।

किसी भी कामना की पूर्ति के लिए संकल्प ले कर मंत्र जप करने पर कामना पूर्ण होती है।

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i=वे विशेष उपाय हैं जिन्हें आप केवल दीवाली के दिन ही कर सकते हैं और पूरे वर्ष उनका असर बना रहता है। ये बहुत ही सस्ते और आसान हैं और असरदार इतने मानो चमत्कारी हों।
बुरी बलाओं से बचने के लिए
लगभग 100 ग्राम रत्ती या गुंजा या घुंघुची के दाने लें जो लाल रंग के हों। इन दानों को तांबे की कटोरी में रखें। फिर शनि के मंत्र की 11 मालाएं जपें। जप का समय है 23.29 से 1.51 तक। रात का जप ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है। यह जप पूर्ण समर्पण के साथ हो। यह आप के पास एक ऐसी औषधि तैयार हो गई जो आपको इन बातों में मदद करेगी-
ल्ल गुप्त शत्रु की चालों को समाप्त कर देगी।
ल्ल बच्चों को नजर दोष होने पर इसे काले कपड़े में बांधकर उनके गले में पहनाएं।
ल्ल यदि घर में गरीबी अचानक आई हो या संतान गर्भ में ही प्राण त्याग देती हो, तो इसके कुछ दाने अपने घर के कोनों में बिखरा दें।
ल्ल यदि आपने कोई नया घर लिया है जहां आपका मन उखड़ने लगा है या आपका मन अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान से उखड़ रहा है, तो वहां इन दानों को पूजा स्थान में रखें।
अच्छी पढ़ाई व नौकरी में सफलता
दीवाली के दिन शाम 6.14 बजे से लेकर रात 8 बजे के बीच दूब घास, गुंजा तथा शमी अथवा पीपल की छोटी सी लकड़ी लेकर एक तांबे के बर्तन में रखें, फिर गणेश जी की पूजा करें। इसे सदैव पूजा में ही रहने दें। जो लोग पढ़ाई या नौकरी में बहुत संघर्ष कर रहे हैं उन्हें सफलता मिलेगी। इसे अपने बैग या पढ़ने की मेज या कार्य करने वाली मेज पर भी रख सकते हैं।
घबराहट व सिरदर्द की समस्या है तो
इस यंत्र को सादे कागज पर हल्दी का रंग बनाकर लिखें। लिखते समय 'ॐ' का जाप करते रहें। ऐसे कई सारे यंत्र बनाकर रख लें।
जब भी सिरदर्द, घबराहट या तनाव हो, तो इसे सिर पर बांधकर सो जाएं।
संपत्ति प्राप्ति के लिए
अनंतमूल की जड़ लें। उसे 'ॐ अं अंगारकाये नम:' की 11 मालाओं से सिद्ध करें। फिर उसे गले में पहनें। संपत्ति की समस्याएं समाप्त होंगी।
दुर्घटनाओं से बचने के लिए
अनंतमूल की जड़ तथा साबूत सुपारी लें। उसे महामृत्युंजय मंत्र की 11 मालाओं से सिद्ध करें। फिर उसे गले मे पहनें। यदि मारकेश भी लगा हो तो भी अकाल मृत्यु से बचा जा सकता है, इसे घर में कोई भी व्यक्ति परेशानी या मारकेश के संकट के समय पहन सकता है। इसे उस व्यक्ति को भी जरूर पहनना चाहिए जिसके चोटें बहुत लगती हों।
धन प्राप्ति के लिए
ल्ल काली व सफेद गुंजा के दाने पूजा में रखकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें । इसे तीन बार लगातार करना होता है, इन दानों को हमेशा संभाल कर रखें।
ल्ल काली व सफेद गुंजा के दाने पूजा में रखकर 11 मालाएं ' ऊं श्रीं नम:' की जपें।
ल्ल एक और मंत्र देखें
ॐ श्रीं ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीं क्लीं ॐ वित्तेश्वराय नम:।
शिवजी के सम्मुख बैठकर इस मंत्र का जप सवा लाख बार करें और इस मंत्र को रात 11.39 से 12.30 के बीच में प्रारम्भ करके सवा लाख जाप पूरे होने तक करें, जिसमें कई दिन लगेंगे, पर गरीबी मिटाने में इस मंत्र का जवाब नहीं।
ल्ल बेलपत्र या अशोक या आक या बरगद के 11 पत्तों पर सिंदूर और हल्दी मिलाकर उस पर 'पं दं लं' लिखकर बहते जल में प्रवाहित करें। इसे शाम 6.56 से लेकर 8.13 बजे के बीच करें। ल्ल 

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j=गुंजा 'रत्ती' सात सौ रुपए किलो, ढूंढ़ रहे व्यापारी
    जिले में अपने आप उगने वाली उपेक्षित सबसे महंगा बीज

विश्वबंधु शर्मा/ सजन बंजारा-जशपुर/कोतबा (निप्र)। जिले में गुंजा जिसे रत्ती भी कहा जाता है, सबसे दुर्लभ वनस्पतियों के नाम के साथ ही सबसे महंगे बीज के रूप में सामने आया है। इस बीज को लेकर पहली बार चौकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इस बीज को व्यापारी सात सौ रुपए किलो तक खरीदने को तैयार हैं और व्यापारी इस बीज को एडवांस में पैसे देकर भी खरीद रहे हैं।

गुंजा जिसे जिले में गूंज के नाम से लोग जानते हैं। नगरीय क्षेत्र के अधिकांश लोग गुंजा के बारे में जानकारी नहीं रखते, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में गुंजा ग्रामीणों के आय का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहा है। जिले में गुंजा की बिक्री ऊंची कीमतों पर खरीदी जा रही है। गुंजा को मुख्य रूप से तीन प्रजातियों के लिए जाना जाता है, जिसका रंग सफेद, लाल-काला और भूरा रंग से है। सबसे ऊंची कीमत सफेद गुंजा की है, जिसके संकलनकर्ताओं को सात सौ रुपए किलो मिल रहे हैं। गुंजा की तीन प्रजातियां जिले में उपलब्ध हैं, जिसकी अलग-अलग कीमत है। सबसे अधिक कीमत सफेद गुंजा के बीज की है, जिसकी कीमत सात सौ रुपए है। प्रतिस्पर्धा में इसकी कीमत अधिक भी होती है। लाल रंग के गुंज की कीमत 70 रुपए किलो है। तीसरी प्रजाति कुछ काली और भूरे रंग लिए होती है उसकी कीमत तीन सौ रुपए किलो है। स्थानीय व्यापारी विजय ने बताया कि वे 10 साल से खरीदी कर बाहर के व्यापारियों को गुंजा बेच रहे हैं, लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि इसका उपयोग क्या है। उन्होंने बताया कि एक बात विचारणीय है कि इसके संकलन और बिक्री करने वाले परंपरागत रूप से ही लगे हैं।

दिसंबर माह में सबसे अधिक व्यवसाय

नवंबर और दिसंबर माह में बीज निकलते हैं और यही समय होता है, जब संकलनकर्ता इस बीज से आय अर्जित करते हैं। बड़े व्यापारियों को जब बीज के कीमत की जानकारी मिल रही है तो कई व्यापारी इस व्यवसाय में खुद को जोड़ने में लगे हैं और स्थिति यह है कि कोतबा, फरसाबहार ब्लाक, पत्थलगांव ब्लाक में व्यापारी ग्रामीणों को एडवांस के रूप में भी पैसे दे रहे हैं, जिससे संग्रहण उनकों मिले। पंड्रीपानी क्षेत्र की स्थिति यह है कि कई किसान अब इसके बीज को लगाने भी लगे हैं। किसान अपने खेतों व आसपास की झाड़ियों के नीचे इसके बीज को लगा रहे हैं। सवाल यह है कि इस बीज का व्यवसाय गुपचुप तरीके से ही क्यों हो रहा है। इस बात को लेकर कई सवाल भी सामने आते हैं, लेकिन कुछ जानकारों का कहना है कि दवाओं के रूप में ही इसका उपयोग होता है, जिसके कारण यह कीमती है। अधिकांश व्यापारियों को इस बात की जानकारी भी नहीं है कि यह कहां जाता है और एक के बाद एक व्यापारियों को यह बीज बेचे जा रहे हैं।

क्या है गुंजा

गुंजा को जिले के पत्थलगांव, फरसाबहार विकासखंड सहित अन्य क्षेत्र में गूंज के नाम से जाना जाता है। मुख्य रूप से इसके क्षेत्रीय व्यापारियों के साथ पत्थलगांव, धरमजयगढ़ व रायगड़ जिले में अधिक व्यापारी हैं। लता जाति की यह वनस्पति है, जिसमें फलियां होती हैं और पकने के बाद फलियां स्वयं फट जाती हैं, जिससे गुंजा का बीज निकलता है और यह बीज काफी कीमती हो रहा है, जिसका कारण इसकी दुर्लभता है। अंग्रेजी नाम कोरल बीड है। हिंदी में इसे गुंजा, चौटली, घुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसके संस्कृत नाम भी कई हैं, जिससे इसकी पौराणिकता भी स्पष्ट होती है। कुछ राज्यों में राज्य की भाषाओं में अलग-अलग नामों से भी यह प्रचलित है। वहीं फारसी में गुंजा को चश्मेखरूस और अरबी में हबसुफेद कहा जाता है। जिले में यह सड़कों के किनारे, निर्गुंडी के पौधों सहित अन्य पौधों और झाड़ियों में लताओं में स्वयं बढ़ता है।

औषधि निर्माण में होता है उपयोग

वनस्पतियों एंव आयर्ुेवेद के जानकार भूपेंद्र थवाईत ने बताया कि आयुर्वेद में गुंजा का विशेष महत्व है और पेट से संबंधित रोगों के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। यह क्षेत्र में अत्यंत दुर्लभ वनस्पतियों में है और विशेष क्षेत्र में होने के कारण ही इसकी ऊंची कीमत है। उन्होंने बताया कि इसके जड़ और पत्तों का भी विशेष महत्व होता है और पत्ते और जड़ भी ऊंचे दामों मे बिकते हैं। पत्थलगांव के व्यापारी मो. हनीफ मेमन ने बताया कि छग में इसके उपयोग संबंधी जानकारी नहीं के बराबर है, लेकिन इसकी दिल्ली व महानगरों में अधिक मांग होती है। सबसे अधिक उपयोग गुंजा का हाजमे की दवा बनाने में किया जाता है और आयुर्वेद की दवा बनाने वाली कंपनियां इसे ऊंची कीमतों में खरीदते हैं।
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k=गुंजा का प्रयोग अनेक तांत्रिक कार्यों में होता है. यह एक लता का बीज होता है. जो लाल रंग का होता है. सफ़ेद और काले रंग की गुंजा भी मिल सकती है. काली गुंजा बहुत दुर्लभ होती है और वशीकरण के कार्यों में रामबाण की तरह काम करती है. गुंजा के बीजों के अलावा उसकी जड़ को बहुत उपयोगी मन गया है. गुंजा की महिमा कुछ इस प्रकार है

-१. आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रुभी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.
२. गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.
३. जिस व्यक्ति को नजर बहुत लगती हो उसको गुंजा का ब्रासलेट कलाई पर बांधना चाहिए. किसी सभा में या भीड़ भाद वाली जगह पर जाते समय गुंजा का ब्रासलेट पहनने से दूसरे लोग प्रभावित होते हैं.
४. गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.
काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।
रक्तगुंजा: गुंजा का बीज होता है, जो लाल रंग का होता है। इस पर काले रंग का छोटा सा बिंदू बना होता है। लक्ष्मी की प्राप्ति व उसे चिरकाल तक स्थिर रखने हेतु गुंजा का प्रयोग किया जाता है। तंत्रशास्त्र में इसका कई रूपों में प्रयोग होता है।

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l=गुंजा की लता पर लगी फली में बीज

गुंजा या रत्ती (Coral Bead) लता जाति की एक वनस्पति है। शिम्बी के पक जाने पर लता शुष्क हो जाती है। गुंजा के फूल सेम की तरह होते हैं। शिम्बी का आकार बहुत छोटा होता है, परन्तु प्रत्येक में 4-5 गुंजा बीज निकलते हैं अर्थात सफेद में सफेद तथा रक्त में लाल बीज निकलते हैं। अशुद्ध फल का सेवन करने से विसूचिका की भांति ही उल्टी और दस्त हो जाते हैं। इसकी जड़े भ्रमवश मुलहठी के स्थान में भी प्रयुक्त होती है।

गुंजा गुंजा दो प्रकार की होती है।विभिन्न भाषाओं में नामअंग्रेजी Coral Bead हिन्दी गुंजा, चौंटली, घुंघुची, रत्ती संस्कृत सफेद केउच्चटा, कृष्णला, रक्तकाकचिंची बंगाली श्वेत कुच, लाल कुच मराठी गुंजा गुजराती धोलीचणोरी, राती, चणोरी तेलगू गुलुविदे फारसी चश्मेखरुस अरबी हबसुफेद

हानिकारक प्रभाव

पाश्चात्य मतानुसार गुंजा के फलों के सेवन से कोई हानि नहीं होती है। परन्तु क्षत पर लगाने से विधिवत कार्य करती है। सुश्रुत के मत से इसकी मूल गणना है।

गुंजा को आंख में डालने से आंखों में जलन और पलकों में सूजन हो जाती है।

गुण

दोनों गुंजा, वीर्यवर्द्धक (धातु को बढ़ाने वाला), बलवर्द्धक (ताकत बढ़ाने वाला), ज्वर, वात, पित्त, मुख शोष, श्वास, तृषा, आंखों के रोग, खुजली, पेट के कीड़े, कुष्ट (कोढ़) रोग को नष्ट करने वाली तथा बालों के लिए लाभकारी होती है। ये अन्यंत मधूर, पुष्टिकारक, भारी, कड़वी, वातनाशक बलदायक तथा रुधिर विकारनाशक होता है। इसके बीज वातनाशक और अति बाजीकरण होते हैं। गुन्जा से वासिकर्न भि कर सक्ते ही ग्न्जा

अंग्रेजी Coral Bead हिन्दी गुंजा, चौंटली, घुंघुची, रत्ती संस्कृत सफेद केउच्चटा, कृष्णला, रक्तकाकचिंची बंगाली श्वेत कुच, लाल कुच मराठी गुंजा गुजराती धोलीचणोरी, राती, चणोरी तेलगू गुलुविदे फारसी चश्मेखरुस अरबी हबसुफेद
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m=चमत्कारी तंत्र वनस्पति गुंजा

चमत्कारी है गुंजा
तांत्रिक जड़ीबूटियां भाग -9

गुंजा एक फली का बीज है। इसको धुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसकी बेल काफी कुछ मटर की तरह ही लगती है किन्तु अपेक्षाकृत मजबूत काष्ठीय तने वाली। इसे अब भी कहीं कहीं आप सुनारों की दुकानों पर देख सकते हैं। कुछ वर्ष पहले तक सुनार इसे सोना तोलने के काम में लेते थे क्योंकि इनके प्रत्येक दाने का वजन लगभग बराबर होता है करीब 120 मिलीग्राम। ये हमारे जीवन में कितनी बसी है इसका अंदाज़ा मुहावरों और लोकोक्तियों में इसके प्रयोग से लग जाता है।

यह तंत्र शास्त्र में जितनी मशहूर है उतनी ही आयुर्वेद में भी। आयुर्वेद में श्वेत गूंजा का ही अधिक प्रयोग होता है औषध रूप में साथ ही इसके मूल का भी जो मुलैठी के समान ही स्वाद और गुण वाली होती है। इसीकारण कई लोग मुलैठी के साथ इसके मूल की भी मिलावट कर देते हैं।

वहीं रक्त गूंजा बेहद विषैली होती है और उसे खाने से उलटी दस्त पेट में मरोड़ और मृत्यु तक सम्भव है। आदिवासी क्षेत्रों में पशु पक्षी मारने और जंगम विष निर्माण में अब भी इसका प्रयोग होता है।

गुंजा की तीन प्रजातियां मिलती हैं:-

1• रक्त गुंजा: लाल काले रंग की ये प्रजाति भी तीन तरह की मिलती है जिसमे लाल और काले रंगों का अनुपात 10%, 25% और 50% तक भी मिलता है।

ये मुख्यतः तंत्र में ही प्रयोग होती है।

श्वेत गुंजा • श्वेत गुंजा में भी एक सिरे पर कुछ कालिमा रहती है। यह आयुर्वेद और तंत्र दोनों में ही सामान रूप से प्रयुक्त होती है। ये लाल की अपेक्षा दुर्लभ होती है।

काली गुंजा: काली गुंजा दुर्लभ होती है, आयुर्वेद में भी इसके प्रयोग लगभग नहीं हैं हाँ किन्तु तंत्र प्रयोगों में ये बेहद महत्वपूर्ण है।

इन तीन के अलावा एक अन्य प्रकार की गुंजा पायी जाती है पीली गुंजा ये दुर्लभतम है क्योंकि ये कोई विशिष्ट प्रजाति नहीं है किन्तु लाल और सफ़ेद प्रजातियों में कुछ आनुवंशिक विकृति होने पर उनके बीज पीले हो जाते हैं। इस कारण पीली गूंजा कभी पूर्ण पीली तो कभी कभी लालिमा या कालिमा मिश्रित पीली भी मिलती है।

इस चमत्कारी वनस्पति गुंजा के कुछ प्रयोग:-

1• सम्मान प्रदायक :

शुद्ध जल (गंगा का, अन्य तीर्थों का जल या कुएं का) में गुंजा की जड़ को चंदन की भांति घिसें। अच्छा यही है कि किसी ब्राह्मण या कुंवारी कन्या के हाथों से घिसवा लें। यह लेप माथे पर चंदन की तरह लगायें। ऐसा व्यक्ति सभा-समारोह आदि जहां भी जायेगा, उसे वहां विशिष्ट सम्मान प्राप्त होगा।

2• कारोबार में बरकत

किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार के दिन 1 तांबे का सिक्का, 6 लाल गुंजा लाल कपड़े में बांधकर प्रात: 11 बजे से लेकर 1 बजे के बीच में किसी सुनसान जगह में अपने ऊपर से 11 बार उसार कर 11 इंच गहरा गङ्ढा खोदकर उसमें दबा दें। ऐसा 11 बुधवार करें। दबाने वाली जगह हमेशा नई होनी चाहिए। इस प्रयोग से कारोबार में बरकत होगी, घर में धन रूकेगा।

3"• ज्ञान-बुद्धि वर्धक :

(क) गुंजा-मूल को बकरी के दूध में घिसकर हथेलियों पर लेप करे, रगड़े कुछ दिन तक यह प्रयोग करते रहने से व्यक्ति की बुद्धि, स्मरण-शक्ति तीव्र होती है, चिंतन, धारणा आदि शक्तियों में प्रखरता व तीव्रता आती है।

(ख) यदि सफेद गुंजा के 11 या 21 दाने अभिमंत्रित करके विद्यार्थियों के कक्ष में उत्तर पूर्व में रख दिया जाये तो एकाग्रता एवं स्मरण शक्ति में लाभ होता है।

4• वर-वधू के लिए :

विवाह के समय लाल गुंजा वर के कंगन में पिरोकर पहनायी जाती है। यह तंत्र का एक प्रयोग है, जो वर की सुरक्षा, समृद्धि, नजर-दोष निवारण एवं सुखद दांपत्य जीवन के लिए है। गुंजा की माला आभूषण के रूप में पहनी जाती है।

5• पुत्रदाता :

शुभ मुहुर्त में श्वेत गुंजा की जड़ लाकर दूध से धोकर, सफेद चन्दन पुष्प से पूजा करके सफेद धागे में पिरोकर। “ऐं क्षं यं दं” मंत्र के ग्यारह हजार जाप करके स्त्री या पुरूष धारण करे तो संतान सुख की प्राप्ती होती है।

6• वशीकरण -

(क) आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रु भी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.

(ख) गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.

( गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.

7• विद्वेषण में प्रयोग :

किसी दुष्ट, पर-पीड़क, गुण्डे तथा किसी का घर तोड़ने वाले के घर में लाल गुंजा - रवि या मंगलवार के दिन इस कामना के साथ फेंक दिये जाये - 'हे गुंजा ! आप मेरे कार्य की सिद्धि के लिए इस घर-परिवार में कलह (विद्वेषण) उत्पन्न कर दो' तो आप देखेंगे कि ऐसा ही होने लगता है।

8• विष-निवारण :
गुंजा की जड़ धो-सुखाकर रख ली जाये। यदि कोई व्यक्ति विष-प्रभाव से अचेत हो रहा हो तो उसे पानी में जड़ को घिसकर पिलायें।

इसको पानी में घिस कर पिलाने से हर प्रकार का विष उतर जाता है।

9• दिव्य दृष्टि :-

(क) अलौकिक तामसिक शक्तियों के दर्शन :

भूत-प्रेतादि शक्तियों के दर्शन करने के लिए मजबूत हृदय वाले व्यक्ति, गुंजा मूल को रवि-पुष्य योग में या मंगलवार के दिन- शुद्ध शहद में घिस कर आंखों में अंजन (सुरमा/काजल) की भांति लगायें तो भूत, चुडैल, प्रेतादि के दर्शन होते हैं।

(ख) गुप्त धन दर्शन :

अंकोल या अंकोहर के बीजों के तेल में गुंजा-मूल को घिस कर आंखों पर अंजन की तरह लगायें। यह प्रयोग रवि-पुष्य योग में, रवि या मंगलवार को ही करें। इसको आंजने से पृथ्वी में गड़ा खजाना तथा आस पास रखा धन दिखाई देता है।

10• शत्रु में भय उत्पन्न :

गुंजा-मूल (जड़) को किसी स्त्री के मासिक स्राव में घिस कर आंखों में सुरमे की भांति लगाने से शत्रु उसकी आंखों को देखते ही भाग खड़े होते हैं।

11• शत्रु दमन प्रयोग :

यदि लड़ाई झगड़े की नौबत हो तो काले तिल के तेल में गुंजामूल को घिस कर, उस लेप को सारे शरीर में मल लें। ऐसा व्यक्ति शत्रुओं को बहुत भयानक तथा सबल दिखाई देगा। फलस्वरूप शत्रुदल चुपचाप भाग जायेगा।

12• रोग - बाधा

(क) कुष्ठ निवारण प्रयोग :

गुंजा मूल को अलसी के तेल में घिसकर लगाने से कुष्ठ (कोढ़) के घाव ठीक हो जाते हैं।

(ख)अंधापन समाप्त :

गुंजा-मूल को गंगाजल में घिसकर आंखों मे लगाने से आंसू बहुत आते हैं।नेत्रों की सफाई होती है आँखों का जाल कटता है।

देशी घी (गाय का) में घिस कर लगाते रहने से इन दोनों प्रयोगों से अंधत्व दूर हो जाता है।

(ग) वाजीकरण:

श्वेत गुंजा की जड को गाय के शुद्ध घृत में पीसकर लेप तैयार करें। यह लेप शिश्न पर मलने से कामशक्ति की वृद्धि के साथ स्तंभन शक्ति में भी वृद्धि होती है।

13: नौकरी में बाधा

राहु के प्रभाव के कारण व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो तो लाल गुंजा व सौंफ को लाल वस्त्र में बांधकर अपने कमरे में रखें।

**दुर्लभ काली गुंजा के कुछ प्रयोग:

1• काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।

2• दिवाली के दिन अपने गल्‍ले के नीचे काली गुंजा जंगली बेल के दाने डालने से व्‍यवसाय में हो रही हानि रूक जाती है।

3• दिवाली की रात घर के मुख्‍य दरवाज़े पर सरसों के तेल का दीपक जला कर उसमें काली गुंजा के 2-4 दाने डाल दें। ऐसा करने पर घर सुरक्षित और समृद्ध रहता है।

4• होलिका दहन से पूर्व पांच काली गुंजा लेकर होली की पांच परिक्रमा लगाकर अंत में होलिका की ओर पीठ करके पाँचों गुन्जाओं को सिर के ऊपर से पांच बार उतारकर सिर के ऊपर से होली में फेंक दें।

5• घर से अलक्ष्मी दूर करने का लघु प्रयोग-

ध्यानमंत्र :

ॐ तप्त-स्वर्णनिभांशशांक-मुकुटा रत्नप्रभा-भासुरीं ।
नानावस्त्र-विभूषितां त्रिनयनां गौरी-रमाभ्यं युताम् ।
दर्वी-हाटक-भाजनं च दधतीं रम्योच्चपीनस्तनीम् ।
नित्यं तां शिवमाकलय्य मुदितां ध्याये अन्नपूर्णश्वरीम् ॥

मन्त्र :

ॐ ह्रीम् श्रीम् क्लीं नमो भगवति माहेश्वरि मामाभिमतमन्नं देहि-देहि अन्नपूर्णों स्वाहा ।


विधि :

जब रविवार या गुरुवार को पुष्प नक्षत्र हो या नवरात्र में अष्टमी के दिन या दीपावली की रात्रि या अन्य किसी शुभ दिन से इस मंत्र की एक माला रुद्राक्ष माला से नित्य जाप करें । जाप से पूर्व भगवान श्रीगणेश जी का ध्यान करें तथा भगवान शिव का ध्यान कर नीचे दिये ध्यान मंत्र से माता अन्नपूर्णा का ध्यान करें ।

इस मंत्र का जाप दुकान में गल्ले में सात काली गुंजा के दाने रखकर शुद्ध आसन, (कम्बल आसन, या साफ जाजीम आदि ) पर बैठकर किया जाए तो व्यापार में आश्चर्यजनक लाभ महसूस होने गेगा ।

6• कष्टों से छुटकारे हेतु

यदि संपूर्ण दवाओं एवं डाक्टर के इलाज के बावजूद भी यदि घुटनों और पैरों का दर्द दूर नहीं हो रहा हो तो रवि पुष्य नक्षत्र, शनिवार या शनि आमवस्या के दिन यह उपाय करें। प्रात:काल नित्यक्रम से निवृत हो स्नानोपरांत लोहे की कटोरी में श्रद्धानुसार सरसों का तेल भरें। 7 चुटकी काले तिल, 7 लोहे की कील और 7 लाल और 7 काली गुंजा उसमें डाल दें। तेल में अपना मुंह देखने के बाद अपने ऊपर से 7 बार उल्टा उसारकर पीपल के पेड़ के नीचे इस तेल का दीपक जला दें 21 परिक्रमा करें और वहीं बैठकर 108 बार

ऊँ शं विधिरुपाय नम:।।

इस मंत्र का जाप करें। ऐसा 11 शनिवार करें। कष्टों से छुटकारा मिलेगा।


पीली गुंजा:

1• पीले रंग की गुंजा के बीज ,हल्दी की गांठे, सात कौडियों की पूजा अर्चना करके श्री लक्ष्मीनारायण भगवान के मंत्रों से अभिमंत्रित करके पूजा स्थान में रखने से दाम्पत्य सुख एवं परिवार,मे एकता तथा आर्थिक व्यावसायिक सिद्धि मिलती है

2• इसकी माला या ब्रेसलेट धारण करने से व्यक्ति का चित्त शांत रहता है, तनाव से मुक्ति मिलती है।
3• पीत गुंजा की माला गुरु गृह को अनुकूल करती है।
4• अनिद्रा से पीड़ित लोगों को इसकी माला धारण करने से लाभ मिलता है।
5• बड़ी उम्र के जो लोग स्वप्न में डरते हैं या जिन्हें अक्सर ये लगता है की कोई उनका गला दबा रहा है उन्हें इसकी माला या ब्रेसलेट पहनना चाहिए।

अन्य किसी जानकारी, समस्या समाधान और कुंडली विश्लेषण हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।
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n=क्या आप जानते है बड़े काम की और चमत्कारी होती है गूंजा


गुंजा या रत्ती (Coral Bead) लता जाति की एक वनस्पति है। शिम्बी के पक जाने पर लता शुष्क हो जाती है। गुंजा के फूल सेम की तरह होते हैं। शिम्बी का आकार बहुत छोटा होता है, परन्तु प्रत्येक में 4-5 गुंजा बीज निकलते हैं अर्थात सफेद में सफेद तथा रक्त में लाल बीज निकलते हैं। अशुद्ध फल का सेवन करने से विसूचिका की भांति ही उल्टी और दस्त हो जाते हैं। इसकी जड़े भ्रमवश मुलहठी के स्थान में भी प्रयुक्त होती है

इसको चिरमिटी, धुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसे आप सुनारों की दुकानों पर देख सकते हैं। इसका वजन एक रत्ती होता है, जो सोना तोलने के काम आती है। यह तीन रंगों में मिलती है। सफेद गुंजा का प्रयोग तंत्र तथा उपचार में होता है, न मिलने पर लाल गुंजा भी प्रयोग में ली जा सकती है। परंतु काली गुंजा दुर्लभ होती है।

गुंजा का प्रयोग अनेक तांत्रिक कार्यों में होता है. यह एक लता का बीज होता है. जो लाल रंग का होता है. सफ़ेद और काले रंग की गुंजा भी मिल सकती है. काली गुंजा बहुत दुर्लभ होती है और वशीकरण के कार्यों में रामबाण की तरह काम करती है. गुंजा के बीजों के अलावा उसकी जड़ को बहुत उपयोगी मन गया है. गुंजा की महिमा कुछ इस प्रकार है -

वर-वधू के लिए : विवाह के समय लाल गुंजा वर के कंगन में पिरोकर पहनायी जाती है। यह तंत्र का एक प्रयोग है, जो वर की सुरक्षा, समृद्धि, नजर-दोष निवारण एवं सुखद दांपत्य जीवन के लिए है। गुंजा की माला आभूषण के रूप में पहनी जाती है। भगवान श्री कृष्ण भी गुंजामाला धारण करते थे। पुत्र की चाह वाली स्वस्थ स्त्री, शुभ नक्षत्र में गुंजा की जड़ को ताबीज में भरकर कमर में धारण करें। ऐसा करने से स्त्री पुत्र लाभ करती है।


विद्वेषण में प्रयोग :

किसी दुष्ट, पर-पीड़क, गुण्डे तथा किसी का घर तोड़ने वाले के घर में लाल गुंजा - रवि या मंगलवार के दिन इस कामना के साथ फेंक दिये जाये - 'हे गुंजा ! आप मेरे कार्य की सिद्धि के लिए इस घर-परिवार में कलह (विद्वेषण) उत्पन्न कर दो' तो आप देखेंगे कि ऐसा ही होने लगता है। विष-निवारण : गुंजा की जड़ धो-सुखाकर रख ली जाये।

यदि कोई व्यक्ति विष-प्रभाव से अचेत हो रहा हो तो उसे पानी में जड़ को घिसकर पिलायें। इसको पानी में घिस कर पिलाने से हर प्रकार का विष उतर जाता है।

सम्मान प्रदायक :

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