Sunday, February 21, 2016

11>शंख 12 रहस्य+दक्षिणावर्ती शंख ==+-रुद्राक्ष =+-गुंजा=श्वेत कुच, लाल कुच==>( 1 to 5--a to n )

11>Myc=Post=11> ****शंख 12 रहस्य+दक्षिणावर्ती शंख=+रुद्राक्ष=+गुंजा****( 1 to 5--a to n )


1------शंख 12 रहस्य
            :a= ।।शंख।।----शंख के विषयमें बिसेस तथ्य -----शंख 12 रहस्य
2------दक्षिणावर्ती शंख
             a=|| दक्षिणावर्ती शंख के महत्वपूर्ण उपाय ||

3------रुद्राक्ष १ से २१ मुखी रुद्राक्ष,
4-----आपकी ग्रह-राशि-नक्षत्र के अनुसार रुद्राक्ष धारण करें
            A=माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्त्पत्ति रूद्र देव के आंसुओं से 
5-----गुंजा=श्वेत कुच, लाल कुच
             
a=गुंजा की लता पर लगी फली में बीज
                  b=चमत्कारी तंत्र वनस्पति गुंजा=( 1 to 13 )
                  c=**दुर्लभ काली गुंजा के कुछ प्रयोग:
                  d=क्या आप जानते है बड़े काम की और चमत्कारी होती है गूंजा
                  e=शुद्ध जल 
                  f=भूत-प्रेतादि शक्तियों के दर्शन 
                  g=कुछ प्रयोग ---
                  h=रक्त गुंजा
                  i=वे विशेष उपाय हैं जिन्हें आप केवल दीवाली के दिन ही कर सकते हैं
                  j=गुंजा 'रत्ती' सात सौ रुपए किलो, ढूंढ़ रहे व्यापारी 
                      जिले में अपने आप उगने वाली उपेक्षित सबसे महंगा बीज
                  k=गुंजा का प्रयोग अनेक तांत्रिक कार्यों में होता है. 
                  l=गुंजा की लता पर लगी फली में बीज
                  m=चमत्कारी तंत्र वनस्पति गुंजा
                  n=क्या आप जानते है बड़े काम की और चमत्कारी होती है गूंजा

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1>शंख 12 रहस्य


:a= ।।शंख।।----शंख के विषयमें बिसेस तथ्य -----शंख 12 रहस्य

शिव को छोड़कर सभी देवताओं पर शंख से जल अर्पित किया जा सकता है। शिव ने शंखचूड़ नामक दैत्य का वध किया था अत: शंख का जल शिव को निषेध बताया गया है।

शंख के नाम से कई बातें विख्यात है जैसे योग में शंख प्रक्षालन और शंख मुद्रा होती है, तो आयुर्वेद में शंख पुष्पी और शंख भस्म का प्रयोग किया जाता है। प्राचीनकाल में शंक लिपि भी हुआ करती थी। विज्ञान के अनुसार शंख समुद्र में पाए जाने वाले एक प्रकार के घोंघे का खोल है जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है।

शंख से वास्तुदोष ही दूर नहीं होता इससे आरोग्य वृद्धि, आयुष्य प्राप्ति, लक्ष्मी प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति, पितृ-दोष शांति, विवाह आदि की रुकावट भी दूर होती है। इसके अलावा शंख कई चमत्कारिक लाभ के लिए भी जाना जाता है। उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ शंख कैलाश मानसरोवर, मालद्वीप, लक्षद्वीप, कोरामंडल द्वीप समूह, श्रीलंका एवं भारत में पाये जाते हैं।

त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृत: करे।
नमित: सर्वदेवैश्य पाञ्चजन्य नमो स्तुते।।

वर्तमान समय में शंख का प्रयोग प्राय: पूजा-पाठ में किया जाता है। अत: पूजारंभ में शंखमुद्रा से शंख की प्रार्थना की जाती है। शंख को हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण और पवित्र माना गया माना गया है। शंख कई प्रकार के होते हैं। शंख के चमत्का‍रों और रहस्य के बारे में पुराणों में विस्तार से लिखा गया है। आओ जानते हैं शंख और शंख ध्वनि के 12 रहस्य..

1-पहला रहस्य-
शंख के प्रकार : शंख के प्रमुख 3 प्रकार होते हैं:- दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख। इन शंखों के कई उप प्रकार होते हैं। शंखों की शक्ति का वर्णन महाभारत और पुराणों में मिलता है। यह प्रकार इस तरह भी है- वामावर्ती, दक्षिणावर्ती तथा गणेश शंख।

शंख के अन्य प्रकार : लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देव शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, गरूड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख, गोमुखी शंख, पांचजन्य शंख, अन्नपूर्णा शंख, मोती शंख, हीरा शंख, शेर शंख आदि प्रकार के होते हैं।


द्विधासदक्षिणावर्तिर्वामावत्तिर्स्तुभेदत:
दक्षिणावर्तशंकरवस्तु पुण्ययोगादवाप्यते
यद्गृहे तिष्ठति सोवै लक्ष्म्याभाजनं भवेत्

2-द्वितीय रहस्य-
    शंख दो प्रकार के होते हैं:- दक्षिणावर्ती एवं वामावर्ती। लेकिन एक तीसरे प्रकार का भी शंख पाया जाता
    है जिसे मध्यावर्ती या गणेश शंख कहा गया है।

    * दक्षिणावर्ती शंख पुण्य के ही योग से प्राप्त होता है। यह शंख जिस घर में रहता है, वहां लक्ष्मी की वृद्धि
        होती  है। इसका प्रयोग अर्घ्य आदि देने के लिए विशेषत: होता है।
    * वामवर्ती शंख का पेट बाईं ओर खुला होता है। इसके बजाने के लिए एक छिद्र होता है। इसकी ध्वनि से                रोगोत्पादक कीटाणु कमजोर पड़ जाते हैं।
    * दक्षिणावर्ती शंख के प्रकार : दक्षिणावर्ती शंख दो प्रकार के होते हैं नर और मादा। जिसकी परत
       मोटी हो और भारी हो वह नर और जिसकी परत पतली हो और हल्का हो, वह मादा शंख होता है।

    * दक्षिणावर्ती शंख पूजा : दक्षिणावर्ती शंख की स्थापना यज्ञोपवीत पर करनी चाहिए। शंख का पूजन
       केसर युक्त चंदन से करें। प्रतिदिन नित्य क्रिया से निवृत्त होकर शंख की धूप-दीप-नैवेद्य-पुष्प से पूजा
       करें और तुलसी दल चढ़ाएं।

       प्रथम प्रहर में पूजन करने से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। द्वितीय प्रहर में पूजन करने से धन-
       सम्पत्ति में वृद्धि होती है। तृतीय प्रहर में पूजन करने से यश व कीर्ति में वृद्धि होती है। चतुर्थ प्रहर में
       पूजन करने से संतान प्राप्ति होती है। प्रतिदिन पूजन के बाद 108 बार या श्रद्धा के अनुसार मंत्र का
        जप करें।

3- तीसरा रहस्य...

     विविध नाम : शंख, समुद्रज, कंबु, सुनाद, पावनध्वनि, कंबु, कंबोज, अब्ज, त्रिरेख, जलज, अर्णोभव,
      महानाद, मुखर, दीर्घनाद, बहुनाद, हरिप्रिय, सुरचर, जलोद्भव, विष्णुप्रिय, धवल, स्त्रीविभूषण, पांचजन्य,               अर्णवभव आदि।

4-चौथा रहस्य...
     महाभारत यौद्धाओं के पास शंख : महाभारत में लगभग सभी यौद्धाओं के पास शंख होते थे। उनमें से
    कुछ यौद्धाओं के पास तो चमत्कारिक शंख होते थे। जैसे भगवान कृष्ण के पास पाञ्चजन्य शंख था
    जिसकी ध्वनि कई किलोमीटर तक पहुंच जाती थी।

     पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय:।
     पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर:।।-महाभारत

      अर्जुन के पास देवदत्त, युधिष्ठिर के पास अनंतविजय, भीष्म के पास पोंड्रिक, नकुल के पास सुघोष,
      सहदेव के पास मणिपुष्पक था। सभी के शंखों का महत्व और शक्ति अलग-अलग थी। कई देवी
       देवतागण शंख को अस्त्र रूप में धारण किए हुए हैं। महाभारत में युद्धारंभ की घोषणा और उत्साहवर्धन
       हेतु शंख नाद किया गया था।

      अथर्ववेद के अनुसार, शंख से राक्षसों का नाश होता है- शंखेन हत्वा रक्षांसि। भागवत पुराण में भी शंख
       का उल्लेख हुआ है। यजुर्वेद के अनुसार युद्ध में शत्रुओं का हृदय दहलाने के लिए शंख फूंकने वाला
       व्यक्ति अपिक्षित है।

      अद्भुत शौर्य और शक्ति का संबल शंखनाद से होने के कारण ही योद्धाओं द्वारा इसका प्रयोग किया
       जाता था। श्रीकृष्ण का ‘पांचजन्य’ नामक शंख तो अद्भुत और अनूठा था, जो महाभारत में विजय का
       प्रतीक बना।

5-पांचवां रहस्य...

नादब्रह्म : शंख को नादब्रह्म और दिव्य मंत्र की संज्ञा दी गई है। शंख की ध्वनि को ॐ की ध्वनि के समकक्ष माना गया है। शंखनाद से आपके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा का नाश तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शंख से निकलने वाली ध्वनि जहां तक जाती है वहां तक बीमारियों के कीटाणुओं का नाश हो जाता है।

6= छठा रहस्य...

धन प्राप्ति में सहायक शंख : शंख समुद्र मंथन के समय प्राप्त चौदह अनमोल रत्नों में से एक है। लक्ष्मी के साथ उत्पन्न होने के कारण इसे लक्ष्मी भ्राता भी कहा जाता है। यही कारण है कि जिस घर में शंख होता है वहां लक्ष्मी का वास होता है।

*यदि मोती शंख को कारखाने में स्था‍पित किया जाए तो कारखाने में तेजी से आर्थिक उन्नति होती है। यदि व्यापार में घाटा हो रहा है, दुकान से आय नहीं हो रही हो तो एक मोती शंख दुकान के गल्ले में रखा जाए तो इससे व्यापार में वृद्धि होती है।

*यदि मोती शंख को मंत्र सिद्ध व प्राण-प्रतिष्ठा पूजा कर स्थापित किया जाए तो उसमें जल भरकर लक्ष्मी के चित्र के साथ रखा जाए तो लक्ष्मी प्रसन्न होती है और आर्थिक उन्नति होती है।

*मोती शंख को घर में स्थापित कर रोज 'ॐ श्री महालक्ष्मै नम:' 11 बार बोलकर 1-1 चावल का दाना शंख में भरते रहें। इस प्रकार 11 दिन तक प्रयोग करें। यह प्रयोग करने से आर्थिक तंगी समाप्त हो जाती है।
इसी तरह प्रत्येक शंख से अलग अलग लाभ प्रा‍प्त किए जा सकते हैं।

7- सातवां रहस्य...

शंख पूजन का लाभ : शंख सूर्य व चंद्र के समान देवस्वरूप है जिसके मध्य में वरुण, पृष्ठ में ब्रह्मा तथा अग्र में गंगा और सरस्वती नदियों का वास है। तीर्थाटन से जो लाभ मिलता है, वही लाभ शंख के दर्शन और पूजन से मिलता है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है। शंख से शिवलिंग, कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता प्रसन्न होते हैं।

8-आठवां रहस्य...

सेहत में फायदेमंद शंख : शंखनाद से सकारात्मक ऊर्जा का सर्जन होता है जिससे आत्मबल में वृद्धि होती है। शंख में प्राकृतिक कैल्शियम, गंधक और फास्फोरस की भरपूर मात्रा होती है। प्रतिदिन शंख फूंकने वाले को गले और फेफड़ों के रोग नहीं होते।

शंख बजाने से चेहरे, श्वसन तंत्र, श्रवण तंत्र तथा फेफड़ों का व्यायाम होता है। शंख वादन से स्मरण शक्ति बढ़ती है। शंख से मुख के तमाम रोगों का नाश होता है। गोरक्षा संहिता, विश्वामित्र संहिता, पुलस्त्य संहिता आदि ग्रंथों में दक्षिणावर्ती शंख को आयुर्वद्धक और समृद्धि दायक कहा गया है।

पेट में दर्द रहता हो, आंतों में सूजन हो अल्सर या घाव हो तो दक्षिणावर्ती शंख में रात में जल भरकर रख दिया जाए और सुबह उठकर खाली पेट उस जल को पिया जाए तो पेट के रोग जल्दी समाप्त हो जाते हैं। नेत्र रोगों में भी यह लाभदायक है। यही नहीं, कालसर्प योग में भी यह रामबाण का काम करता है।

9-नौवां रहस्य...

सबसे बड़ा शंख : विश्व का सबसे बड़ा शंख केरल राज्य के गुरुवयूर के श्रीकृष्ण मंदिर में सुशोभित है, जिसकी लंबाई लगभग आधा मीटर है तथा वजन दो किलोग्राम है।

10-दसवां रहस्य...


श्रेष्ठ शंख के लक्षण:-
शंखस्तुविमल: श्रेष्ठश्चन्द्रकांतिसमप्रभ:
अशुद्धोगुणदोषैवशुद्धस्तु सुगुणप्रद:

अर्थात् निर्मल व चन्द्रमा की कांति के समानवाला शंख श्रेष्ठ होता है जबकि अशुद्ध अर्थात् मग्न शंख गुणदायक नहीं होता। गुणोंवाला शंख ही प्रयोग में लाना चाहिए। क्षीरसागर में शयन करने वाले सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु के एक हाथ में शंख अत्यधिक पावन माना जाता है। इसका प्रयोग धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष रूप से किया जाता है।

11-ग्यारहवां रहस्य-

शंख से वास्तु दोष का निदान : शंख से वास्तु दोष भी मिटाया जा सकता है। शंख को किसी भी दिन लाकर पूजा स्थान पर पवित्र करके रख लें और प्रतिदिन शुभ मुहूर्त में इसकी धूप-दीप से पूजा की जाए तो घर में वास्तु दोष का प्रभाव कम हो जाता है। शंख में गाय का दूध रखकर इसका छिड़काव घर में किया जाए तो इससे भी सकारात्मक उर्जा का संचार होता है।


12-बारहवां रहस्य-

*गणेश शंख: इस शंख की आकृति भगवान श्रीगणेश की तरह ही होती है। यह शंख दरिद्रता नाशक और धन प्राप्ति का कारक है।

*अन्नपूर्णा शंख : अन्नपूर्णा शंख का उपयोग घर में सुख-शान्ति और श्री समृद्धि के लिए अत्यन्त उपयोगी है। गृहस्थ जीवन यापन करने वालों को प्रतिदिन इसके दर्शन करने चाहिए।

*कामधेनु शंख : कामधेनु शंख का उपयोग तर्क शक्ति को और प्रबल करने के लिए किया जाता है। इस शंख की पूजा-अर्चना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

*मोती शंख : इस शंख का उपयोग घर में सुख और शांति के लिए किया जाता है। मोती शंख हृदय रोग नाशक भी है। मोती शंख की स्थापना पूजा घर में सफेद कपड़े पर करें और प्रतिदिन पूजन करें, लाभ मिलेगा।

ऐरावत शंख : ऐरावत शंख का उपयोग मनचाही साधना सिद्ध को पूर्ण करने के लिए, शरीर की सही बनावट देने तथा रूप रंग को और निखारने के लिए किया जाता है। प्रतिदिन इस शंख में जल डाल कर उसे ग्रहण करना चाहिए। शंख में जल प्रतिदिन 24 - 28 घण्टे तक रहे और फिर उस जल को ग्रहण करें, तो चेहरा कांतिमय होने लगता है।

*विष्णु शंख : इस शंख का उपयोग लगातार प्रगति के लिए और असाध्य रोगों में शिथिलता के लिए किया जाता है। इसे घर में रखने भर से घर रोगमुक्त हो जाता है।

*पौण्ड्र शंख : पौण्ड्र शंख का उपयोग मनोबल बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग विद्यार्थियों के लिए उत्तम है। इसे विद्यार्थियों को अध्ययन कक्ष में पूर्व की ओर रखना चाहिए।

*मणि पुष्पक शंख : मणि पुष्पक शंख की पूजा-अर्चना से यश कीर्ति, मान-सम्मान प्राप्त होता है। उच्च पद की प्राप्ति के लिए भी इसका पूजन उत्तम है।

*देवदत्त शंख : इसका उपयोग दुर्भाग्य नाशक माना गया है। इस शंख का उपयोग न्याय क्षेत्र में विजय दिलवाता है। इस शंख को शक्ति का प्रतीक माना गया है। न्यायिक क्षेत्र से जुड़े लोग इसकी पूजा कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

*दक्षिणावर्ती शंख : इस शंख को दक्षिणावर्ती इसलिए कहा जाता है क्योंकि जहां सभी शंखों का पेट बाईं ओर खुलता है वहीं इसका पेट विपरीत दाईं और खुलता है। इस शंख को देव स्वरूप माना गया है। दक्षिणावर्ती शंख के पूजन से खुशहाली आती है और लक्ष्मी प्राप्ति के साथ-साथ सम्पत्ति भी बढ़ती है। इस शंख की उपस्थिति ही कई रोगों का नाश कर देती है। दक्षिणावर्ती शंख पेट के रोग में भी बहुत लाभदायक है। विशेष कार्य में जाने से पहले दक्षिणावर्ती शंख के दर्शन करने भर से उस काम के सफल होने की संभावना बढ़ जाती है।

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2>   दक्षिणावर्ती शंख 

दक्षिणावर्ती शंख हिंदू संस्कृति में शंखों का विशेष महत्व है। पूजा अनुष्ठानों तथा अन्य मांगलिक उत्सवों में शंखों का उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त इनका उपयोग विभिन्न कामनाओं की पूर्ति हेतु और विभिन्न रोगों की चिकित्सा में भी किया जाता है। वैसे तो शंख अनेक प्रकार के होते हैं, लेकिन उनमें दो मुख्य हैं- दक्षिणावर्ती और वामावर्ती। अनेक चमत्कारी गुणों के कारण दक्षिणावर्ती शंख का अपना विशेष महत्व है। यह दुर्लभ तथा सर्वाधिक मूल्यवान होता है। असली दक्षिणावर्ती शंख को प्राण प्रतिष्ठित कर के उद्योग-व्यवसाय स्थल, कार्यालय, दुकान अथवा घर में स्थापित कर उसकी पूजा करने से दुख-दारिद्र्य से मुक्ति मिलती है और घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होता है। इस शंख की स्थापना करते समय निम्नलिखित श्लोक करना चाहिए। दक्षिणावर्तेशंखाय यस्य सद्मनितिष्ठति। मंगलानि प्रकुर्वंते तस्य लक्ष्मीः स्वयं स्थिरा। चंदनागुरुकर्पूरैः पूजयेद यो गृहेडन्वहम्। स सौभाग्य कृष्णसमो धनदोपमः।। यह विशिष्ट शंख शत्रुओं को निर्बल और रोग, अज्ञान तथा दारिद्र्य को दूर करने वाला और आयुवर्धक होता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है- शंख चंद्रार्कदैवत्यं मध्य वरुणदैवतन्। पृष्ठे प्रजापर्ति विद्यादग्रे गंगा सरस्वतीम्।। त्रैलोक्ये यानि तीर्थापि वासुदेवस्य चाज्ञया। शंखे तिष्ठन्ति विप्रेन्द्र तस्मा शंख प्रपुजयेत्।। दर्शनेन हि शंखस्य की पुनः स्पर्शनेन तु। विलयं यातिं पापनि हिमवद् भास्करोदयेः।। यह शंख चंद्र्र और सूर्य के समान देव स्वरूप है। इसके मध्य भाग में वरुण और पृष्ठ भाग में गंगा के साथ-साथ सारे तीर्थों का वास है। इसे कुबेर का स्वरूप भी माना जाता है। अतः इसकी पूजा अवश्य ही करनी चाहिए। इसके दर्शन मात्र से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। महर्षि मार्कण्डेय के अनुसार दक्षिावर्ती शंख की पूजा उपासना लक्ष्मी प्राप्ति का सर्वोत्तम उपाय है। भगवत्पाद आद्यगुरु शंकराचार्य के अनुसार दक्षिणावर्ती शंख की स्थापना एक श्रेष्ठ तांत्रिक प्रयोग है, जिसका प्रभाव तुरंत और अचूक होता है। इस तरह हमारे ऋषि मुनियों ने अपनी अपनी संहिताओं में दक्षिणावर्ती शंख का विशद उल्लेख किया है। वांछित फल की प्राप्ति के लिए इस शंख की अष्ट लक्ष्मी और सिद्ध कुबेर मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठा कर स्थापना करनी चाहिए। जिस घर मंे यह शंख रहता है वह सदा धन-धान्य से भरा रहता है। इसके अतिरिक्त जिस परिवार में शास्त्रोक्त उपायों द्वारा इसकी स्थापना की जाती है उस पर भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्म, राक्षस आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। शत्रुपक्ष कितना भी बलशाली क्यों न हो उस घर का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। इसके प्रभाव से दुर्घटना, मृत्यु भय, चोरी आदि से रक्षा होती है। शंख को सुख-समृद्धि, यश, कीर्ति तथा लक्ष्मी का साक्षात् प्रतीक माना गया है। धार्मिक कृत्यों, अनुष्ठान-साधना, तांत्रिक-क्रियाओं आदि में सफलता हेतु शंख का प्रयोग किया जाता है। दोषमुक्त शंख को किसी शुभ मुहूर्त में गंगाजल, गोघृत, कच्चे दूध, मधु, गुड़ आदि से अभिषेक करके अपने पूजा स्थल में लाल कपड़े के आसन पर स्थापित करें, घर में लक्ष्मी का वास बना रहेगा। लक्ष्मी जी की विशेष कृपा हेतु दक्षिणावर्ती शंख का जोड़ा, अर्थात् नर और मादा, देव प्रतिमा के सम्मुख स्थापित करें। शास्त्रों में अलग अलग प्रयोजनों हेतु अलग अलग शंखों का उल्लेख मिलता है। इस संदर्भ में एक संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है। अन्नपूर्णा शंख स्थापित करने से घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है। मणि पुष्पक तथा पांच जन्य शंख की स्थापना से घर का वास्तु दोष दूर होता है। इस शंख में जल भरकर घर में छिड़कने से सौभाग्य का आगमन होता है। गणेश शंख जल भर कर उसका सेवन करने से अनेक रोगों का शमन होता है। विष्णु शंख से कार्य स्थल में जल छिड़काव करने से उन्नति के अवसर बनने लगते हैं। दक्षिणावर्ती शंख कल्प करने के इच्छुक साधकों को निम्नलिखित सरल प्रयोग करना चाहिए। पूजन सामग्री - दोषमुक्त तथा पवित्र शंख, शुद्ध घी का दीपक, अगरबत्ती, कुंकुम, केसर, चावल, जलपात्र और दूध। विधि: शंख को दूध तथा जल से स्नान कराकर साफ कपड़े से उसे पोंछ कर उस पर चांदी का बर्क लगाएं। फिर घी का दीपक और जला लें। इसके बाद दूध तथा केसर के मिश्रण से शंख पर श्री एकाक्षरी मंत्र लिखकर उसे तांबे अथवा चांदी के पात्र में स्थापित कर दें।

जप मंत्र

अब निम्नलिखित मंत्र का जप करते हुए उस पर कुंकुम, चावल तथा इत्र अर्पित करें। फिर श्वेत पुष्प चढ़ाकर भोग के रूप में प्रसाद अर्पित करें।

मंत्र: ¬ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीधर करस्थायपयोनिधि जाताय श्री। दक्षिणावर्ती शंखाय ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीकराय पूज्याय नमः।।

अब मन से शंख का ध्यान करें।

ध्यान मंत्र

ध्यान मंत्र - ¬ ह्रीं श्रीं क्लीं ब्लूं श्रीदक्षिणावर्तशंखाय भगवते विश्वरूपाय सर्वयोगोश्वराय त्रैलोक्यनाथाय सर्वकामप्रदाय सर्वऋद्धि समृद्धि वांछितार्थसिद्धिदाय नमः। ¬ सर्वाभरण भूषिताय प्रशस्यांगोपांगसंयुताय कल्पवृक्षाध- स्थितायकामधेनु चिंतामणि-नवनिधिरूपाय चतुर्दश रत्न परिवृताय महासिद्धि-सहिताय लक्ष्मीदेवता युताय कृष्ण देवताकर ललिताय श्री शंखमहानिधिये नमः।

ध्यान मंत्र आवाहन अर्थात् स्तुति मंत्र है। इसके अतिरिक्त बीज मंत्र अथवा पांच जन्य गायत्री शंख मंत्र का ग्यारह माला जप करना भी आवश्यक है।

बीज मंत्र

बीज मंत्र: ¬ ह्रीं श्रीं क्लीं ब्लू दक्षिणमुखाय शंखनिधये समुद्रप्रभावय नमः। शंख का शाबर मंत्र: ¬ दक्षिणावर्ते शंखाय मम् गृह धनवर्षा कुरु-कुरु नमः।।

शंख गायत्री मंत्र

शंख गायत्री मंत्र: ¬ पांचजन्याय विद्महे। पावमानाय धीमहि। तंन शंखः प्रचोदयात्। ऋद्धि-सिद्धि तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए प्रयोग करें। दोषमुक्त दक्षिणावर्ती शंख का ऊपर वर्णित ध्यान मंत्र से पूजन करें। फिर गायत्री और बीज मंत्र दोनों का शंख के सामने बैठकर जप करते रहें।

एक मंत्र पूरा होने पर शंख में अग्नि में सामग्री होम करने की तरह चावल तथा नागकेसर दाएं हाथ के अंगूठे, मध्यमा तथा अनामिका से छोड़ते रहें। जब शंख भर जाए तो उसे घर में स्थापित कर लें।

ध्यान रखें कि शंख की पूंछ उत्तर -पूर्व दिशा की ओर रहे। किसी शुभ मुहूर्त अथवा दीवाली से पूर्व धन त्रयोदशी के दिन पुराने चावल तथा नागकेसर ऊपर वर्णित विधि से पुनः बदल लिया करें। इस प्रकार सिद्ध किया हुआ शंख लाला कपड़े में लपेटकर धन, आभूषण आदि रखने के स्थान पर स्थापित करने से जीवन के हर क्षेत्र में निरंतर श्री की प्राप्ति होने लगती है।

a=|| दक्षिणावर्ती शंख के महत्वपूर्ण उपाय ||

तंत्र शास्त्र में दक्षिणावर्ती शंख का विशेष महत
व है। इस शंख को विधि-विधान पूर्वक घर में रखने से कई प्रकार की बाधाएं शांत हो जाती है और धन की भी कमी नहीं होती। दक्षिणावर्ती शंख के अनेक लाभ हैं, लेकिन इसे घर में रखने से पहले इसका शुद्धिकरण अवश्य करना चाहिए।

इस विधि से करें शुद्धिकरण

लाल कपड़े के ऊपर दक्षिणावर्ती शंख को रखकर इसमें गंगाजल भरें और कुश के आसन पर बैठकर इस मंत्र का जप करें-

ऊं श्री लक्ष्मी सहोदराय नम:

इस मंत्र की कम से कम 5 माला जप करें।

ये हैं दक्षिणावर्ती शंख के उपाय

1- दक्षिणावर्ती शंख को अन्न भण्डार में रखने से अन्न, धन भण्डार में रखने से धन, वस्त्र भण्डार में रखने से
     वस्त्र की कभी कमी नहीं होती। शयन कक्ष में इसे रखने से शांति का अनुभव होता है।

2- इसमें शुद्ध जल भरकर, व्यक्ति, वस्तु, स्थान पर छिड़कने से दुर्भाग्य, अभिशाप, तंत्र-मंत्र आदि का प्रभाव             समाप्त हो जाता है।

3- किसी भी प्रकार के टोने-टोटके इस शंख के आगे निष्फल हो जाते हैं। दक्षिणावर्ती शंख जहां भी रहता है,
    वहां धन की कोई कमी नहीं रहती।

4- इसे घर में रखने से सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा स्वतः ही समाप्त हो जाती है
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3>रुद्राक्ष १ से २१ मुखी रुद्राक्ष,
1 Mukhi to 21 Mukhi Rudraksh

 रुद्राक्ष १ से २१ मुखी रुद्राक्ष,,,,1 Mukhi to 21 Mukhi Rudraksh
रुद्राक्ष देवता मंत्र

१ मुखी शिव 1-ॐ नमः शिवाय । 2 –ॐ ह्रीं नमः
२ मुखी अर्धनारीश्वर ॐ नमः
३ मुखी अग्निदेव ॐ क्लीं नमः
४ मुखी ब्रह्मा,सरस्वती ॐ ह्रीं नमः
५ मुखी कालाग्नि रुद्र ॐ ह्रीं नमः
६ मुखी कार्तिकेय, इन्द्र,इंद्राणी ॐ ह्रीं हुं नमः
७ मुखी नागराज अनंत,सप्तर्षि,सप्तमातृकाएँ ॐ हुं नमः
८ मुखी भैरव,अष्ट विनायक ॐ हुं नमः
९ मुखी माँ दुर्गा १-ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः २-ॐ ह्रीं हुं नमः
१० मुखी विष्णु १-ॐ नमो भवाते वासुदेवाय २-ॐ ह्रीं नमः
११ मुखी एकादश रुद्र १-ॐ तत्पुरुषाय विदमहे महादेवय धीमही तन्नो रुद्रः प्रचोदयात २-ॐ ह्रीं हुं नमः
१२ मुखी सूर्य १-ॐ ह्रीम् घृणिः सूर्यआदित्यः श्रीं २-ॐ क्रौं क्ष्रौं रौं नमः
१३ मुखी कार्तिकेय, इंद्र १-ऐं हुं क्षुं क्लीं कुमाराय नमः २-ॐ ह्रीं नमः
१४ मुखी शिव,हनुमान,आज्ञा चक्र ॐ नमः
१५ मुखी पशुपति ॐ पशुपत्यै नमः
१६ मुखी महामृत्युंजय ,महाकाल ॐ ह्रौं जूं सः त्र्यंबकम् यजमहे सुगंधिम् पुष्टिवर्धनम उर्वारुकमिव बंधनान्

मृत्योर्मुक्षीय सः जूं ह्रौं ॐ ,,
१७ मुखी विश्वकर्मा ,माँ कात्यायनी ॐ विश्वकर्मणे नमः
१८ मुखी माँ पार्वती ॐ नमो भगवाते नारायणाय
१९ मुखी नारायण ॐ नमो भवाते वासुदेवाय
२० मुखी ब्रह्मा ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म
२१ मुखी कुबेर ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्य समृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा


4>आपकी ग्रह-राशि-नक्षत्र के अनुसार रुद्राक्ष धारण करें
ग्रह राषि नक्षत्र लाभकारी रुद्राक्ष मंगल मेष मृगषिरा-चित्रा-धनिष्ठा ३ मुखी
शुक्र वृषभ भरणी-पूर्वाफाल्गुनी-पूर्वाषाढ़ा ६ मुखी,१३ मुखी,१५ मुखी
बुध मिथुन आष्लेषा-ज्येष्ठा-रेवती ४ मुखी
चन्द्र कर्क रोहिणी-हस्त-श्रवण २ मुखी, गौरी-शंकर रुद्राक्ष
सूर्य सिंह कृत्तिका-उत्तराफाल्गुनी-उत्तराषाढ़ा1 मुखी, १२ मुखी
बुध कन्या आष्लेषा-ज्येष्ठा-रेवती ४ मुखी
शुक्र तुला भरणी-पूर्वाफाल्गुनी-पूर्वाषाढ़ा ६ मुखी,१३ मुखी,१५ मुखी
मंगल वृष्चिक मृगषिरा-चित्रा-धनिष्ठा ३ मुखी
गुरु धनु-मीन पुनर्वसु-विषाखा-पूर्वाभाद्रपद ५ मुखी
शनि मकर-कुंभ पुष्य-अनुराधा-उत्तराभाद्रपद ७ मुखी, १४ मुखी
शनि मकर-कुंभ पुष्य-अनुराधा-उत्तराभाद्रपद ७ मुखी, १४ मुखी
गुरु धनु-मीन पुनर्वसु-विषाखा-पूर्वाभाद्रपद ५ मुखी
राहु - आर्द्रा-स्वाति-षतभिषा८ मुखी, १८ मुखी
केतु - अष्विनी-मघा-मूल ९ मुखी,१७ मुखी
नवग्रह दोष निवारणार्थ १० मुखी, २१ मुखी
विषेष : १० मुखी और ११ मुखी किसी एक ग्रह का प्रतिनिधित्व नहीं करते।बल्कि नवग्रहों के दोष

निवारणार्थ प्रयोग मे लाय जाते हैं ।
ॐ तत्पुरुषाय विदमहे, महादेवाय धीमहितन्नो रुद्र: प्रचोदयात्। ॐ ,, ૐ Ψ ॐ नमः शिवाय Ψ ૐ
ॐ तत्पुरुषाय विदमहे, महादेवाय धीमहितन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।
रुद्रस्य अक्षि रुद्राक्ष:, अक्ष्युपलक्षितम्अश्रु, तज्जन्य: वृक्ष:। रुद्राक्षाणांतुभद्राक्ष:स्यान्महाफलम्।
ग्रहणे विषुवे चैवमयने संक्रमेऽपि वा।
दर्द्गोषु पूर्णमसे च पूर्णेषु दिवसेषु च।
रुद्राक्षधारणात् सद्यः सर्वपापैर्विमुच्यते॥
यथा च दृश्यते लोके रुद्राक्ष: फलद: शुभ:।
न तथा दृश्यते अन्या च मालिका परमेश्वरि:।। अर्थात संसार में रुद्राक्ष की माला की तरह अन्य कोई

दूसरी माला फलदायक और शुभ नहीं है।
श्रीमद्- देवीभागवत में लिखा है :रुद्राक्षधारणाद्य श्रेष्ठं न किञ्चिदपि विद्यते।
अर्थात संसार में रुद्राक्ष धारण से बढ़कर श्रेष्ठ ===

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A=माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्त्पत्ति रूद्र देव के आंसुओं से हुई है। रुद्राक्ष का प्रयोग दो रूपों में किया जाता है। एक आध्यात्मिक और दूसरा वैज्ञानिक और स्वास्थवर्धक।

अध्यात्मिक प्रभावअध्यात्मिक प्रभाव

एक मुखी रुद्राक्ष का प्रतीक भगवान शिव को माना जाता है तथा इस एकमुखी रुद्राक्ष का सतारुढ़ ग्रह सूर्य है अत: सूर्य द्वारा शुभ फलों की प्राप्ति तथा सूर्य की अनुकूलता हेतु इसे धारण किया जाता है। एक मुखी रुद्राक्ष आध्यात्मिकता का प्रकाशक बनकर मुक्ति का मार्ग प्राश्स्त करता है. इसे पूजने तथा धारण करने से व्यक्ति के समस्त दुखों एवं पापों का शमन होता है तथा शांति एवं सुख प्राप्त होता है. उनके इर्द गिर्द अष्ट सिद्धियाँ भ्रमण करती रहती हैं। और मोक्ष कों प्राप्त करते है और जन्म जन्म के चक्कर से मुक्त होत जाते है। शास्त्रों में वर्णित है की एक मुखी रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति कों कभी भी धन धान की कमी नहीं होती है और आकस्मित मौत भी नहीं हो सकती.

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5>गुंजा=श्वेत कुच, लाल कुच

गुंजा का प्रयोग अनेक तांत्रिक कार्यों में होता है. यह एक लता का बीज होता है. जो लाल रंग का होता है. सफ़ेद और काले रंग की गुंजा भी मिल सकती है. काली गुंजा बहुत दुर्लभ होती है और वशीकरण के कार्यों में रामबाण की तरह काम करती है. गुंजा के बीजों के अलावा उसकी जड़ को बहुत उपयोगी मन गया है. गुंजा की महिमा कुछ इस प्रकार है

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१. आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रुभी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.
२. गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.
३. जिस व्यक्ति को नजर बहुत लगती हो उसको गुंजा का ब्रासलेट कलाई पर बांधना चाहिए. किसी सभा में या भीड़ भाद वाली जगह पर जाते समय गुंजा का ब्रासलेट पहनने से दूसरे लोग प्रभावित होते हैं.
४. गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.
काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।
रक्तगुंजा: गुंजा का बीज होता है, जो लाल रंग का होता है। इस पर काले रंग का छोटा सा बिंदू बना होता है। लक्ष्मी की प्राप्ति व उसे चिरकाल तक स्थिर रखने हेतु गुंजा का प्रयोग किया जाता है। तंत्रशास्त्र में इसका कई रूपों में प्रयोग होता है।

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गुंजा

a=गुंजा की लता पर लगी फली में बीज

गुंजा या रत्ती (Coral Bead) लता जाति की एक वनस्पति है। शिम्बी के पक जाने पर लता शुष्क हो जाती है। गुंजा के फूल सेम की तरह होते हैं। शिम्बी का आकार बहुत छोटा होता है, परन्तु प्रत्येक में 4-5 गुंजा बीज निकलते हैं अर्थात सफेद में सफेद तथा रक्त में लाल बीज निकलते हैं। अशुद्ध फल का सेवन करने से विसूचिका की भांति ही उल्टी और दस्त हो जाते हैं। इसकी जड़े भ्रमवश मुलहठी के स्थान में भी प्रयुक्त होती है।

गुंजा गुंजा दो प्रकार की होती है।विभिन्न भाषाओं में नामअंग्रेजी Coral Bead हिन्दी गुंजा, चौंटली, घुंघुची, रत्ती संस्कृत सफेद केउच्चटा, कृष्णला, रक्तकाकचिंची बंगाली श्वेत कुच, लाल कुच मराठी गुंजा गुजराती धोलीचणोरी, राती, चणोरी तेलगू गुलुविदे फारसी चश्मेखरुस अरबी हबसुफेद

हानिकारक प्रभाव

पाश्चात्य मतानुसार गुंजा के फलों के सेवन से कोई हानि नहीं होती है। परन्तु क्षत पर लगाने से विधिवत कार्य करती है। सुश्रुत के मत से इसकी मूल गणना है।

गुंजा को आंख में डालने से आंखों में जलन और पलकों में सूजन हो जाती है।

गुण

दोनों गुंजा, वीर्यवर्द्धक (धातु को बढ़ाने वाला), बलवर्द्धक (ताकत बढ़ाने वाला), ज्वर, वात, पित्त, मुख शोष, श्वास, तृषा, आंखों के रोग, खुजली, पेट के कीड़े, कुष्ट (कोढ़) रोग को नष्ट करने वाली तथा बालों के लिए लाभकारी होती है। ये अन्यंत मधूर, पुष्टिकारक, भारी, कड़वी, वातनाशक बलदायक तथा रुधिर विकारनाशक होता है। इसके बीज वातनाशक और अति बाजीकरण होते हैं। गुन्जा से वासिकर्न भि कर सक्ते ही ग्न्जा

अंग्रेजी Coral Bead हिन्दी गुंजा, चौंटली, घुंघुची, रत्ती संस्कृत सफेद केउच्चटा, कृष्णला, रक्तकाकचिंची बंगाली श्वेत कुच, लाल कुच मराठी गुंजा गुजराती धोलीचणोरी, राती, चणोरी तेलगू गुलुविदे फारसी चश्मेखरुस अरबी हबसुफेद
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b=चमत्कारी तंत्र वनस्पति गुंजा

चमत्कारी है गुंजा
तांत्रिक जड़ीबूटियां भाग -9

गुंजा एक फली का बीज है। इसको धुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसकी बेल काफी कुछ मटर की तरह ही लगती है किन्तु अपेक्षाकृत मजबूत काष्ठीय तने वाली। इसे अब भी कहीं कहीं आप सुनारों की दुकानों पर देख सकते हैं। कुछ वर्ष पहले तक सुनार इसे सोना तोलने के काम में लेते थे क्योंकि इनके प्रत्येक दाने का वजन लगभग बराबर होता है करीब 120 मिलीग्राम। ये हमारे जीवन में कितनी बसी है इसका अंदाज़ा मुहावरों और लोकोक्तियों में इसके प्रयोग से लग जाता है।

यह तंत्र शास्त्र में जितनी मशहूर है उतनी ही आयुर्वेद में भी। आयुर्वेद में श्वेत गूंजा का ही अधिक प्रयोग होता है औषध रूप में साथ ही इसके मूल का भी जो मुलैठी के समान ही स्वाद और गुण वाली होती है। इसीकारण कई लोग मुलैठी के साथ इसके मूल की भी मिलावट कर देते हैं।

वहीं रक्त गूंजा बेहद विषैली होती है और उसे खाने से उलटी दस्त पेट में मरोड़ और मृत्यु तक सम्भव है। आदिवासी क्षेत्रों में पशु पक्षी मारने और जंगम विष निर्माण में अब भी इसका प्रयोग होता है।

गुंजा की तीन प्रजातियां मिलती हैं:-

1• रक्त गुंजा: लाल काले रंग की ये प्रजाति भी तीन तरह की मिलती है जिसमे लाल और काले रंगों का अनुपात 10%, 25% और 50% तक भी मिलता है।

ये मुख्यतः तंत्र में ही प्रयोग होती है।

श्वेत गुंजा • श्वेत गुंजा में भी एक सिरे पर कुछ कालिमा रहती है। यह आयुर्वेद और तंत्र दोनों में ही सामान रूप से प्रयुक्त होती है। ये लाल की अपेक्षा दुर्लभ होती है।

काली गुंजा: काली गुंजा दुर्लभ होती है, आयुर्वेद में भी इसके प्रयोग लगभग नहीं हैं हाँ किन्तु तंत्र प्रयोगों में ये बेहद महत्वपूर्ण है।

इन तीन के अलावा एक अन्य प्रकार की गुंजा पायी जाती है पीली गुंजा ये दुर्लभतम है क्योंकि ये कोई विशिष्ट प्रजाति नहीं है किन्तु लाल और सफ़ेद प्रजातियों में कुछ आनुवंशिक विकृति होने पर उनके बीज पीले हो जाते हैं। इस कारण पीली गूंजा कभी पूर्ण पीली तो कभी कभी लालिमा या कालिमा मिश्रित पीली भी मिलती है।

इस चमत्कारी वनस्पति गुंजा के कुछ प्रयोग:-

1• सम्मान प्रदायक :

शुद्ध जल (गंगा का, अन्य तीर्थों का जल या कुएं का) में गुंजा की जड़ को चंदन की भांति घिसें। अच्छा यही है कि किसी ब्राह्मण या कुंवारी कन्या के हाथों से घिसवा लें। यह लेप माथे पर चंदन की तरह लगायें। ऐसा व्यक्ति सभा-समारोह आदि जहां भी जायेगा, उसे वहां विशिष्ट सम्मान प्राप्त होगा।

2• कारोबार में बरकत

किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार के दिन 1 तांबे का सिक्का, 6 लाल गुंजा लाल कपड़े में बांधकर प्रात: 11 बजे से लेकर 1 बजे के बीच में किसी सुनसान जगह में अपने ऊपर से 11 बार उसार कर 11 इंच गहरा गङ्ढा खोदकर उसमें दबा दें। ऐसा 11 बुधवार करें। दबाने वाली जगह हमेशा नई होनी चाहिए। इस प्रयोग से कारोबार में बरकत होगी, घर में धन रूकेगा।

3"• ज्ञान-बुद्धि वर्धक :

(क) गुंजा-मूल को बकरी के दूध में घिसकर हथेलियों पर लेप करे, रगड़े कुछ दिन तक यह प्रयोग करते रहने से व्यक्ति की बुद्धि, स्मरण-शक्ति तीव्र होती है, चिंतन, धारणा आदि शक्तियों में प्रखरता व तीव्रता आती है।

(ख) यदि सफेद गुंजा के 11 या 21 दाने अभिमंत्रित करके विद्यार्थियों के कक्ष में उत्तर पूर्व में रख दिया जाये तो एकाग्रता एवं स्मरण शक्ति में लाभ होता है।

4• वर-वधू के लिए :

विवाह के समय लाल गुंजा वर के कंगन में पिरोकर पहनायी जाती है। यह तंत्र का एक प्रयोग है, जो वर की सुरक्षा, समृद्धि, नजर-दोष निवारण एवं सुखद दांपत्य जीवन के लिए है। गुंजा की माला आभूषण के रूप में पहनी जाती है।

5• पुत्रदाता :

शुभ मुहुर्त में श्वेत गुंजा की जड़ लाकर दूध से धोकर, सफेद चन्दन पुष्प से पूजा करके सफेद धागे में पिरोकर। “ऐं क्षं यं दं” मंत्र के ग्यारह हजार जाप करके स्त्री या पुरूष धारण करे तो संतान सुख की प्राप्ती होती है।

6• वशीकरण -

(क) आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रु भी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.

(ख) गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.

( गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.

7• विद्वेषण में प्रयोग :

किसी दुष्ट, पर-पीड़क, गुण्डे तथा किसी का घर तोड़ने वाले के घर में लाल गुंजा - रवि या मंगलवार के दिन इस कामना के साथ फेंक दिये जाये - 'हे गुंजा ! आप मेरे कार्य की सिद्धि के लिए इस घर-परिवार में कलह (विद्वेषण) उत्पन्न कर दो' तो आप देखेंगे कि ऐसा ही होने लगता है।

8• विष-निवारण :
गुंजा की जड़ धो-सुखाकर रख ली जाये। यदि कोई व्यक्ति विष-प्रभाव से अचेत हो रहा हो तो उसे पानी में जड़ को घिसकर पिलायें।

इसको पानी में घिस कर पिलाने से हर प्रकार का विष उतर जाता है।

9• दिव्य दृष्टि :-

(क) अलौकिक तामसिक शक्तियों के दर्शन :

भूत-प्रेतादि शक्तियों के दर्शन करने के लिए मजबूत हृदय वाले व्यक्ति, गुंजा मूल को रवि-पुष्य योग में या मंगलवार के दिन- शुद्ध शहद में घिस कर आंखों में अंजन (सुरमा/काजल) की भांति लगायें तो भूत, चुडैल, प्रेतादि के दर्शन होते हैं।

(ख) गुप्त धन दर्शन :

अंकोल या अंकोहर के बीजों के तेल में गुंजा-मूल को घिस कर आंखों पर अंजन की तरह लगायें। यह प्रयोग रवि-पुष्य योग में, रवि या मंगलवार को ही करें। इसको आंजने से पृथ्वी में गड़ा खजाना तथा आस पास रखा धन दिखाई देता है।

10• शत्रु में भय उत्पन्न :

गुंजा-मूल (जड़) को किसी स्त्री के मासिक स्राव में घिस कर आंखों में सुरमे की भांति लगाने से शत्रु उसकी आंखों को देखते ही भाग खड़े होते हैं।

11• शत्रु दमन प्रयोग :

यदि लड़ाई झगड़े की नौबत हो तो काले तिल के तेल में गुंजामूल को घिस कर, उस लेप को सारे शरीर में मल लें। ऐसा व्यक्ति शत्रुओं को बहुत भयानक तथा सबल दिखाई देगा। फलस्वरूप शत्रुदल चुपचाप भाग जायेगा।

12• रोग - बाधा

(क) कुष्ठ निवारण प्रयोग :

गुंजा मूल को अलसी के तेल में घिसकर लगाने से कुष्ठ (कोढ़) के घाव ठीक हो जाते हैं।

(ख)अंधापन समाप्त :

गुंजा-मूल को गंगाजल में घिसकर आंखों मे लगाने से आंसू बहुत आते हैं।नेत्रों की सफाई होती है आँखों का जाल कटता है।

देशी घी (गाय का) में घिस कर लगाते रहने से इन दोनों प्रयोगों से अंधत्व दूर हो जाता है।

(ग) वाजीकरण:

श्वेत गुंजा की जड को गाय के शुद्ध घृत में पीसकर लेप तैयार करें। यह लेप शिश्न पर मलने से कामशक्ति की वृद्धि के साथ स्तंभन शक्ति में भी वृद्धि होती है।

13: नौकरी में बाधा
राहु के प्रभाव के कारण व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो तो लाल गुंजा व सौंफ को लाल वस्त्र में बांधकर अपने कमरे में रखें।
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c=**दुर्लभ काली गुंजा के कुछ प्रयोग:

1• काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।

2• दिवाली के दिन अपने गल्‍ले के नीचे काली गुंजा जंगली बेल के दाने डालने से व्‍यवसाय में हो रही हानि रूक जाती है।

3• दिवाली की रात घर के मुख्‍य दरवाज़े पर सरसों के तेल का दीपक जला कर उसमें काली गुंजा के 2-4 दाने डाल दें। ऐसा करने पर घर सुरक्षित और समृद्ध रहता है।

4• होलिका दहन से पूर्व पांच काली गुंजा लेकर होली की पांच परिक्रमा लगाकर अंत में होलिका की ओर पीठ करके पाँचों गुन्जाओं को सिर के ऊपर से पांच बार उतारकर सिर के ऊपर से होली में फेंक दें।

5• घर से अलक्ष्मी दूर करने का लघु प्रयोग-

ध्यानमंत्र :

ॐ तप्त-स्वर्णनिभांशशांक-मुकुटा रत्नप्रभा-भासुरीं ।
नानावस्त्र-विभूषितां त्रिनयनां गौरी-रमाभ्यं युताम् ।
दर्वी-हाटक-भाजनं च दधतीं रम्योच्चपीनस्तनीम् ।
नित्यं तां शिवमाकलय्य मुदितां ध्याये अन्नपूर्णश्वरीम् ॥

मन्त्र :

ॐ ह्रीम् श्रीम् क्लीं नमो भगवति माहेश्वरि मामाभिमतमन्नं देहि-देहि अन्नपूर्णों स्वाहा ।


विधि :

जब रविवार या गुरुवार को पुष्प नक्षत्र हो या नवरात्र में अष्टमी के दिन या दीपावली की रात्रि या अन्य किसी शुभ दिन से इस मंत्र की एक माला रुद्राक्ष माला से नित्य जाप करें । जाप से पूर्व भगवान श्रीगणेश जी का ध्यान करें तथा भगवान शिव का ध्यान कर नीचे दिये ध्यान मंत्र से माता अन्नपूर्णा का ध्यान करें ।

इस मंत्र का जाप दुकान में गल्ले में सात काली गुंजा के दाने रखकर शुद्ध आसन, (कम्बल आसन, या साफ जाजीम आदि ) पर बैठकर किया जाए तो व्यापार में आश्चर्यजनक लाभ महसूस होने गेगा ।

6• कष्टों से छुटकारे हेतु

यदि संपूर्ण दवाओं एवं डाक्टर के इलाज के बावजूद भी यदि घुटनों और पैरों का दर्द दूर नहीं हो रहा हो तो रवि पुष्य नक्षत्र, शनिवार या शनि आमवस्या के दिन यह उपाय करें। प्रात:काल नित्यक्रम से निवृत हो स्नानोपरांत लोहे की कटोरी में श्रद्धानुसार सरसों का तेल भरें। 7 चुटकी काले तिल, 7 लोहे की कील और 7 लाल और 7 काली गुंजा उसमें डाल दें। तेल में अपना मुंह देखने के बाद अपने ऊपर से 7 बार उल्टा उसारकर पीपल के पेड़ के नीचे इस तेल का दीपक जला दें 21 परिक्रमा करें और वहीं बैठकर 108 बार

ऊँ शं विधिरुपाय नम:।।

इस मंत्र का जाप करें। ऐसा 11 शनिवार करें। कष्टों से छुटकारा मिलेगा।


पीली गुंजा:

1• पीले रंग की गुंजा के बीज ,हल्दी की गांठे, सात कौडियों की पूजा अर्चना करके श्री लक्ष्मीनारायण भगवान के मंत्रों से अभिमंत्रित करके पूजा स्थान में रखने से दाम्पत्य सुख एवं परिवार,मे एकता तथा आर्थिक व्यावसायिक सिद्धि मिलती है

2• इसकी माला या ब्रेसलेट धारण करने से व्यक्ति का चित्त शांत रहता है, तनाव से मुक्ति मिलती है।
3• पीत गुंजा की माला गुरु गृह को अनुकूल करती है।
4• अनिद्रा से पीड़ित लोगों को इसकी माला धारण करने से लाभ मिलता है।
5• बड़ी उम्र के जो लोग स्वप्न में डरते हैं या जिन्हें अक्सर ये लगता है की कोई उनका गला दबा रहा है उन्हें इसकी माला या ब्रेसलेट पहनना चाहिए।

अन्य किसी जानकारी, समस्या समाधान और कुंडली विश्लेषण हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।
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d=क्या आप जानते है बड़े काम की और चमत्कारी होती है गूंजा


गुंजा या रत्ती (Coral Bead) लता जाति की एक वनस्पति है। शिम्बी के पक जाने पर लता शुष्क हो जाती है। गुंजा के फूल सेम की तरह होते हैं। शिम्बी का आकार बहुत छोटा होता है, परन्तु प्रत्येक में 4-5 गुंजा बीज निकलते हैं अर्थात सफेद में सफेद तथा रक्त में लाल बीज निकलते हैं। अशुद्ध फल का सेवन करने से विसूचिका की भांति ही उल्टी और दस्त हो जाते हैं। इसकी जड़े भ्रमवश मुलहठी के स्थान में भी प्रयुक्त होती है

इसको चिरमिटी, धुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसे आप सुनारों की दुकानों पर देख सकते हैं। इसका वजन एक रत्ती होता है, जो सोना तोलने के काम आती है। यह तीन रंगों में मिलती है। सफेद गुंजा का प्रयोग तंत्र तथा उपचार में होता है, न मिलने पर लाल गुंजा भी प्रयोग में ली जा सकती है। परंतु काली गुंजा दुर्लभ होती है।

गुंजा का प्रयोग अनेक तांत्रिक कार्यों में होता है. यह एक लता का बीज होता है. जो लाल रंग का होता है. सफ़ेद और काले रंग की गुंजा भी मिल सकती है. काली गुंजा बहुत दुर्लभ होती है और वशीकरण के कार्यों में रामबाण की तरह काम करती है. गुंजा के बीजों के अलावा उसकी जड़ को बहुत उपयोगी मन गया है. गुंजा की महिमा कुछ इस प्रकार है -

वर-वधू के लिए : विवाह के समय लाल गुंजा वर के कंगन में पिरोकर पहनायी जाती है। यह तंत्र का एक प्रयोग है, जो वर की सुरक्षा, समृद्धि, नजर-दोष निवारण एवं सुखद दांपत्य जीवन के लिए है। गुंजा की माला आभूषण के रूप में पहनी जाती है। भगवान श्री कृष्ण भी गुंजामाला धारण करते थे। पुत्र की चाह वाली स्वस्थ स्त्री, शुभ नक्षत्र में गुंजा की जड़ को ताबीज में भरकर कमर में धारण करें। ऐसा करने से स्त्री पुत्र लाभ करती है।


विद्वेषण में प्रयोग :

किसी दुष्ट, पर-पीड़क, गुण्डे तथा किसी का घर तोड़ने वाले के घर में लाल गुंजा - रवि या मंगलवार के दिन इस कामना के साथ फेंक दिये जाये - 'हे गुंजा ! आप मेरे कार्य की सिद्धि के लिए इस घर-परिवार में कलह (विद्वेषण) उत्पन्न कर दो' तो आप देखेंगे कि ऐसा ही होने लगता है। विष-निवारण : गुंजा की जड़ धो-सुखाकर रख ली जाये।

यदि कोई व्यक्ति विष-प्रभाव से अचेत हो रहा हो तो उसे पानी में जड़ को घिसकर पिलायें। इसको पानी में घिस कर पिलाने से हर प्रकार का विष उतर जाता है।

सम्मान प्रदायक :

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e=शुद्ध जल (गंगा का, अन्य तीर्थों का जल या कुएं का) में गुंजा की जड़ को चंदन की भांति घिसें। अच्छा यही है कि किसी ब्राह्मण या कुंवारी कन्या के हाथों से घिसवा लें। यह लेप माथे पर चंदन की तरह लगायें। ऐसा व्यक्ति सभा-समारोह आदि जहां भी जायेगा, उसे वहां विशिष्ट सम्मान प्राप्त होगा। पुत्रदाता : पुत्र की चाह वाली स्वस्थ स्त्री, शुभ नक्षत्र में गुंजा की जड़ को ताबीज में भरकर कमर में धारण करें। ऐसा करने से स्त्री पुत्र लाभ प्राप्त करती है। शत्रु में भय उत्पन्न : गुंजा-मूल (जड़) को किसी स्त्री के मासिक स्राव में घिस कर आंखों में सुरमे की भांति लगाने से शत्रु उसकी आंखों को देखते ही भाग खड़े होते हैं।

अलौकिक तामसिक शक्तियों के दर्शन :

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f=भूत-प्रेतादि शक्तियों के दर्शन करने के लिए मजबूत हृदय वाले व्यक्ति, गुंजा मूल को रवि-पुष्य योग में या मंगलवार के दिन- शुद्ध शहद में घिस कर आंखों में अंजन (सुरमा/काजल) की भांति लगायें तो भूत, चुडैल, प्रेतादि के दर्शन होते हैं। ज्ञान-


बुद्धि वर्धक :

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g=कुछ प्रयोग ---

 गुंजा-मूल को बकरी के दूध में घिसकर हथेलियों पर लेप करे, रगड़े कुछ दिन तक यह प्रयोग करते रहने से व्यक्ति की बुद्धि, स्मरण-शक्ति तीव्र होती है, चिंतन, धारणा आदि शक्तियों में प्रखरता व तीव्रता आती है। गुप्त धन दर्शन : अंकोल या अंकोहर के बीजों के तेल में गुंजा-मूल को घिस कर आंखों पर अंजन की तरह लगायें। यह प्रयोग रवि-पुष्य योग में, रवि या मंगलवार को ही करें। इसको आंजने से पृथ्वी में गड़ा खजाना तथा आस पास रखा धन दिखाई देता है।

शत्रु दमन प्रयोग : काले तिल के तेल में गुंजामूल को घिस कर, उस लेप को सारे शरीर में मल लें। ऐसा व्यक्ति शत्रुओं को बहुत भयानक तथा सबल दिखाई देगा। फलस्वरूप शत्रुदल चुपचाप भाग जायेगा। कुष्ठ निवारण प्रयोग : गुंजा मूल को अलसी के तेल में घिसकर लगाने से कुष्ठ (कोढ़) के घाव ठीक हो जाते हैं।

अंधापन समाप्त : गुंजा-मूल को गंगाजल में घिसकर आंखों मे लगाने से आंसू बहुत आते हैं। देशी घी (गाय का) में घिस कर लगाते रहने से इन दोनों प्रयोगों से अंधत्व दूर हो जाता है।

१. आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रु भी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.

२. गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.

३. जिस व्यक्ति को नजर बहुत लगती हो उसको गुंजा का ब्रासलेट कलाई पर बांधना चाहिए. किसी सभा में या भीड़ भाद वाली जगह पर जाते समय गुंजा का ब्रासलेट पहनने से दूसरे लोग प्रभावित होते हैं.

४. गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.

काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।
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h=रक्त गुंजा

रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र हो,शुक्र तथा मंगल गोचर में अनुकूल हों अथवा कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हस्त नक्षत्र हो, कृष्ण चतुर्दशी को स्वाति नक्षत्र हो या पूर्णिमा को शतभिषा नक्षत्र हो, तो आधी रात को निमंत्रण पूर्वक रक्त गुंजा की जड़ उखाड़ कर ले आएं। घर में लाकर उसकी मिट्टी हटा कर साफ कर दें फिर दूध से स्नान करवा कर धूप-दीप से पूजा करें। इस जड़ के घर में रहने से सर्प भय नहीं रहता…

गुंजा एक प्रकार का लाल रंग का बीज है जो देखने में बहुत सुंदर लगता है। इसके ऊपरी हिस्से पर छोटा सा काला बिंदु होता है। इसकी बेल जंगलों में वृक्षों पर लिपटी पाई जाती है। इसे रत्ती भी कहते हैं और किसी जमाने में इससे सोने की तौल की जाती थी। गुंजा का एक और प्रचलित नाम घुंघची है। यह दो प्रकार की होती है रक्तगुंजा और श्वेत गुंजा। इसके तांत्रिक प्रयोग निम्न हैं-

1-बकरी के दूध में गुंजा मूल को घिस कर हथेलियों पर रगड़ने से बुद्धि का विकास होता है। मेधा,चिंतन, धारणा, विवेक तथा स्मृति की प्रखरता के लिए यह प्रयोग उत्तम होता है।

2-रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र हो,शुक्र तथा मंगल गोचर में अनुकूल हों अथवा कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हस्त नक्षत्र हो , कृष्ण चतुर्दशी को स्वाति नक्षत्र हो या पूर्णिमा को शतभिषा नक्षत्र हो, तो आधी रात को निमंत्रण पूर्वक रक्त गुंजा की जड़ उखाड़ कर ले आएं। घर में लाकर उसकी मिट्टी हटा कर साफ कर दें फिर दूध से स्नान करवा कर धूप-दीप से पूजा करें। इस जड़ के घर में रहने से सर्प भय नहीं रहता।

3- इसकी जड़ को घिस कर माथे पर तिलक की तरह लगाने से मनुष्य में सम्मोहक शक्ति आ जाती है और हर व्यक्ति उसकी बात मानने को तैयार हो जाता है।

4-कहते हैं कि गुंजा की जड़ को बेल पत्र के साथ घिस कर काजल की तरह लगाने से पिछले जीवन की घटनाएं याद आ जाती हैं।

इसकी जड़ को गाय के दूध में पीस कर शरीर पर लेपन करने से कोई भी तांत्रिक साधना सफल होती है यहां तक कि कभी-कभी अशरीरी आत्माएं भी वश में हो जाती हैं जो हमेशा साधक की सहायता करती हैं और उसे छोड़ कर कहीं नहीं जातीं।

श्वेत गुंजा के तांत्रिक प्रयोग

जिस दिन कृष्ण पक्ष की अष्टमी या चतुर्दशी हो उस दिन निम्न मंत्र पढ़ते हुए जंगल से श्वेत गुंजा की फली और वहीं से मिट्टी खोद कर लावे और अपने बगीचे में बो दे ।

मंत्र-ऊँ श्वेतवर्णे सितपर्वतवसिनि अप्रतिहते मम कार्य कुरु ठःठःस्वाहा।

फली लाने और उसे बोते समय यही मंत्र पढें़। फिर प्रति दिन सायंकाल उसमें पानी डालते रहें और इस मंत्र का जप करते रहें।

ऊँ सितवर्णे श्वेतपर्वतवासिनि सर्व कार्याणि कुरु कुरु अप्रतिहते नमो नमः।

गुंजा के बीजों को किसी वृक्ष के समीप बोना चाहिए तकि वह लता उसका सहारा लेकर चढ़ सके। जब लता बड़ी हो जाए तो उसी वृक्ष के नीचे बैठ कर अंगन्यास करें और उसकी पंचोपचार पूजा कर निम्न मंत्र की 21 माला जाप करें।

ऊँ श्वेत वर्णे पद्म मुखे सर्व ज्ञानमये सर्व शक्तिमिति सितपर्वतवासिनि भगवति हृं मम कार्य कुरु कुरु ठःठःनमः स्वाहा।

किसी भी कामना की पूर्ति के लिए संकल्प ले कर मंत्र जप करने पर कामना पूर्ण होती है।

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i=वे विशेष उपाय हैं जिन्हें आप केवल दीवाली के दिन ही कर सकते हैं और पूरे वर्ष उनका असर बना रहता है। ये बहुत ही सस्ते और आसान हैं और असरदार इतने मानो चमत्कारी हों।
बुरी बलाओं से बचने के लिए
लगभग 100 ग्राम रत्ती या गुंजा या घुंघुची के दाने लें जो लाल रंग के हों। इन दानों को तांबे की कटोरी में रखें। फिर शनि के मंत्र की 11 मालाएं जपें। जप का समय है 23.29 से 1.51 तक। रात का जप ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है। यह जप पूर्ण समर्पण के साथ हो। यह आप के पास एक ऐसी औषधि तैयार हो गई जो आपको इन बातों में मदद करेगी-
ल्ल गुप्त शत्रु की चालों को समाप्त कर देगी।
ल्ल बच्चों को नजर दोष होने पर इसे काले कपड़े में बांधकर उनके गले में पहनाएं।
ल्ल यदि घर में गरीबी अचानक आई हो या संतान गर्भ में ही प्राण त्याग देती हो, तो इसके कुछ दाने अपने घर के कोनों में बिखरा दें।
ल्ल यदि आपने कोई नया घर लिया है जहां आपका मन उखड़ने लगा है या आपका मन अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान से उखड़ रहा है, तो वहां इन दानों को पूजा स्थान में रखें।
अच्छी पढ़ाई व नौकरी में सफलता
दीवाली के दिन शाम 6.14 बजे से लेकर रात 8 बजे के बीच दूब घास, गुंजा तथा शमी अथवा पीपल की छोटी सी लकड़ी लेकर एक तांबे के बर्तन में रखें, फिर गणेश जी की पूजा करें। इसे सदैव पूजा में ही रहने दें। जो लोग पढ़ाई या नौकरी में बहुत संघर्ष कर रहे हैं उन्हें सफलता मिलेगी। इसे अपने बैग या पढ़ने की मेज या कार्य करने वाली मेज पर भी रख सकते हैं।
घबराहट व सिरदर्द की समस्या है तो
इस यंत्र को सादे कागज पर हल्दी का रंग बनाकर लिखें। लिखते समय 'ॐ' का जाप करते रहें। ऐसे कई सारे यंत्र बनाकर रख लें।
जब भी सिरदर्द, घबराहट या तनाव हो, तो इसे सिर पर बांधकर सो जाएं।
संपत्ति प्राप्ति के लिए
अनंतमूल की जड़ लें। उसे 'ॐ अं अंगारकाये नम:' की 11 मालाओं से सिद्ध करें। फिर उसे गले में पहनें। संपत्ति की समस्याएं समाप्त होंगी।
दुर्घटनाओं से बचने के लिए
अनंतमूल की जड़ तथा साबूत सुपारी लें। उसे महामृत्युंजय मंत्र की 11 मालाओं से सिद्ध करें। फिर उसे गले मे पहनें। यदि मारकेश भी लगा हो तो भी अकाल मृत्यु से बचा जा सकता है, इसे घर में कोई भी व्यक्ति परेशानी या मारकेश के संकट के समय पहन सकता है। इसे उस व्यक्ति को भी जरूर पहनना चाहिए जिसके चोटें बहुत लगती हों।
धन प्राप्ति के लिए
ल्ल काली व सफेद गुंजा के दाने पूजा में रखकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें । इसे तीन बार लगातार करना होता है, इन दानों को हमेशा संभाल कर रखें।
ल्ल काली व सफेद गुंजा के दाने पूजा में रखकर 11 मालाएं ' ऊं श्रीं नम:' की जपें।
ल्ल एक और मंत्र देखें
ॐ श्रीं ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीं क्लीं ॐ वित्तेश्वराय नम:।
शिवजी के सम्मुख बैठकर इस मंत्र का जप सवा लाख बार करें और इस मंत्र को रात 11.39 से 12.30 के बीच में प्रारम्भ करके सवा लाख जाप पूरे होने तक करें, जिसमें कई दिन लगेंगे, पर गरीबी मिटाने में इस मंत्र का जवाब नहीं।
ल्ल बेलपत्र या अशोक या आक या बरगद के 11 पत्तों पर सिंदूर और हल्दी मिलाकर उस पर 'पं दं लं' लिखकर बहते जल में प्रवाहित करें। इसे शाम 6.56 से लेकर 8.13 बजे के बीच करें। ल्ल 

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j=गुंजा 'रत्ती' सात सौ रुपए किलो, ढूंढ़ रहे व्यापारी
    जिले में अपने आप उगने वाली उपेक्षित सबसे महंगा बीज

विश्वबंधु शर्मा/ सजन बंजारा-जशपुर/कोतबा (निप्र)। जिले में गुंजा जिसे रत्ती भी कहा जाता है, सबसे दुर्लभ वनस्पतियों के नाम के साथ ही सबसे महंगे बीज के रूप में सामने आया है। इस बीज को लेकर पहली बार चौकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इस बीज को व्यापारी सात सौ रुपए किलो तक खरीदने को तैयार हैं और व्यापारी इस बीज को एडवांस में पैसे देकर भी खरीद रहे हैं।

गुंजा जिसे जिले में गूंज के नाम से लोग जानते हैं। नगरीय क्षेत्र के अधिकांश लोग गुंजा के बारे में जानकारी नहीं रखते, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में गुंजा ग्रामीणों के आय का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहा है। जिले में गुंजा की बिक्री ऊंची कीमतों पर खरीदी जा रही है। गुंजा को मुख्य रूप से तीन प्रजातियों के लिए जाना जाता है, जिसका रंग सफेद, लाल-काला और भूरा रंग से है। सबसे ऊंची कीमत सफेद गुंजा की है, जिसके संकलनकर्ताओं को सात सौ रुपए किलो मिल रहे हैं। गुंजा की तीन प्रजातियां जिले में उपलब्ध हैं, जिसकी अलग-अलग कीमत है। सबसे अधिक कीमत सफेद गुंजा के बीज की है, जिसकी कीमत सात सौ रुपए है। प्रतिस्पर्धा में इसकी कीमत अधिक भी होती है। लाल रंग के गुंज की कीमत 70 रुपए किलो है। तीसरी प्रजाति कुछ काली और भूरे रंग लिए होती है उसकी कीमत तीन सौ रुपए किलो है। स्थानीय व्यापारी विजय ने बताया कि वे 10 साल से खरीदी कर बाहर के व्यापारियों को गुंजा बेच रहे हैं, लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि इसका उपयोग क्या है। उन्होंने बताया कि एक बात विचारणीय है कि इसके संकलन और बिक्री करने वाले परंपरागत रूप से ही लगे हैं।

दिसंबर माह में सबसे अधिक व्यवसाय

नवंबर और दिसंबर माह में बीज निकलते हैं और यही समय होता है, जब संकलनकर्ता इस बीज से आय अर्जित करते हैं। बड़े व्यापारियों को जब बीज के कीमत की जानकारी मिल रही है तो कई व्यापारी इस व्यवसाय में खुद को जोड़ने में लगे हैं और स्थिति यह है कि कोतबा, फरसाबहार ब्लाक, पत्थलगांव ब्लाक में व्यापारी ग्रामीणों को एडवांस के रूप में भी पैसे दे रहे हैं, जिससे संग्रहण उनकों मिले। पंड्रीपानी क्षेत्र की स्थिति यह है कि कई किसान अब इसके बीज को लगाने भी लगे हैं। किसान अपने खेतों व आसपास की झाड़ियों के नीचे इसके बीज को लगा रहे हैं। सवाल यह है कि इस बीज का व्यवसाय गुपचुप तरीके से ही क्यों हो रहा है। इस बात को लेकर कई सवाल भी सामने आते हैं, लेकिन कुछ जानकारों का कहना है कि दवाओं के रूप में ही इसका उपयोग होता है, जिसके कारण यह कीमती है। अधिकांश व्यापारियों को इस बात की जानकारी भी नहीं है कि यह कहां जाता है और एक के बाद एक व्यापारियों को यह बीज बेचे जा रहे हैं।

क्या है गुंजा

गुंजा को जिले के पत्थलगांव, फरसाबहार विकासखंड सहित अन्य क्षेत्र में गूंज के नाम से जाना जाता है। मुख्य रूप से इसके क्षेत्रीय व्यापारियों के साथ पत्थलगांव, धरमजयगढ़ व रायगड़ जिले में अधिक व्यापारी हैं। लता जाति की यह वनस्पति है, जिसमें फलियां होती हैं और पकने के बाद फलियां स्वयं फट जाती हैं, जिससे गुंजा का बीज निकलता है और यह बीज काफी कीमती हो रहा है, जिसका कारण इसकी दुर्लभता है। अंग्रेजी नाम कोरल बीड है। हिंदी में इसे गुंजा, चौटली, घुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसके संस्कृत नाम भी कई हैं, जिससे इसकी पौराणिकता भी स्पष्ट होती है। कुछ राज्यों में राज्य की भाषाओं में अलग-अलग नामों से भी यह प्रचलित है। वहीं फारसी में गुंजा को चश्मेखरूस और अरबी में हबसुफेद कहा जाता है। जिले में यह सड़कों के किनारे, निर्गुंडी के पौधों सहित अन्य पौधों और झाड़ियों में लताओं में स्वयं बढ़ता है।

औषधि निर्माण में होता है उपयोग

वनस्पतियों एंव आयर्ुेवेद के जानकार भूपेंद्र थवाईत ने बताया कि आयुर्वेद में गुंजा का विशेष महत्व है और पेट से संबंधित रोगों के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। यह क्षेत्र में अत्यंत दुर्लभ वनस्पतियों में है और विशेष क्षेत्र में होने के कारण ही इसकी ऊंची कीमत है। उन्होंने बताया कि इसके जड़ और पत्तों का भी विशेष महत्व होता है और पत्ते और जड़ भी ऊंचे दामों मे बिकते हैं। पत्थलगांव के व्यापारी मो. हनीफ मेमन ने बताया कि छग में इसके उपयोग संबंधी जानकारी नहीं के बराबर है, लेकिन इसकी दिल्ली व महानगरों में अधिक मांग होती है। सबसे अधिक उपयोग गुंजा का हाजमे की दवा बनाने में किया जाता है और आयुर्वेद की दवा बनाने वाली कंपनियां इसे ऊंची कीमतों में खरीदते हैं।
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k=गुंजा का प्रयोग अनेक तांत्रिक कार्यों में होता है. यह एक लता का बीज होता है. जो लाल रंग का होता है. सफ़ेद और काले रंग की गुंजा भी मिल सकती है. काली गुंजा बहुत दुर्लभ होती है और वशीकरण के कार्यों में रामबाण की तरह काम करती है. गुंजा के बीजों के अलावा उसकी जड़ को बहुत उपयोगी मन गया है. गुंजा की महिमा कुछ इस प्रकार है

-१. आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रुभी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.
२. गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.
३. जिस व्यक्ति को नजर बहुत लगती हो उसको गुंजा का ब्रासलेट कलाई पर बांधना चाहिए. किसी सभा में या भीड़ भाद वाली जगह पर जाते समय गुंजा का ब्रासलेट पहनने से दूसरे लोग प्रभावित होते हैं.
४. गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.
काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।
रक्तगुंजा: गुंजा का बीज होता है, जो लाल रंग का होता है। इस पर काले रंग का छोटा सा बिंदू बना होता है। लक्ष्मी की प्राप्ति व उसे चिरकाल तक स्थिर रखने हेतु गुंजा का प्रयोग किया जाता है। तंत्रशास्त्र में इसका कई रूपों में प्रयोग होता है।

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l=गुंजा की लता पर लगी फली में बीज

गुंजा या रत्ती (Coral Bead) लता जाति की एक वनस्पति है। शिम्बी के पक जाने पर लता शुष्क हो जाती है। गुंजा के फूल सेम की तरह होते हैं। शिम्बी का आकार बहुत छोटा होता है, परन्तु प्रत्येक में 4-5 गुंजा बीज निकलते हैं अर्थात सफेद में सफेद तथा रक्त में लाल बीज निकलते हैं। अशुद्ध फल का सेवन करने से विसूचिका की भांति ही उल्टी और दस्त हो जाते हैं। इसकी जड़े भ्रमवश मुलहठी के स्थान में भी प्रयुक्त होती है।

गुंजा गुंजा दो प्रकार की होती है।विभिन्न भाषाओं में नामअंग्रेजी Coral Bead हिन्दी गुंजा, चौंटली, घुंघुची, रत्ती संस्कृत सफेद केउच्चटा, कृष्णला, रक्तकाकचिंची बंगाली श्वेत कुच, लाल कुच मराठी गुंजा गुजराती धोलीचणोरी, राती, चणोरी तेलगू गुलुविदे फारसी चश्मेखरुस अरबी हबसुफेद

हानिकारक प्रभाव

पाश्चात्य मतानुसार गुंजा के फलों के सेवन से कोई हानि नहीं होती है। परन्तु क्षत पर लगाने से विधिवत कार्य करती है। सुश्रुत के मत से इसकी मूल गणना है।

गुंजा को आंख में डालने से आंखों में जलन और पलकों में सूजन हो जाती है।

गुण

दोनों गुंजा, वीर्यवर्द्धक (धातु को बढ़ाने वाला), बलवर्द्धक (ताकत बढ़ाने वाला), ज्वर, वात, पित्त, मुख शोष, श्वास, तृषा, आंखों के रोग, खुजली, पेट के कीड़े, कुष्ट (कोढ़) रोग को नष्ट करने वाली तथा बालों के लिए लाभकारी होती है। ये अन्यंत मधूर, पुष्टिकारक, भारी, कड़वी, वातनाशक बलदायक तथा रुधिर विकारनाशक होता है। इसके बीज वातनाशक और अति बाजीकरण होते हैं। गुन्जा से वासिकर्न भि कर सक्ते ही ग्न्जा

अंग्रेजी Coral Bead हिन्दी गुंजा, चौंटली, घुंघुची, रत्ती संस्कृत सफेद केउच्चटा, कृष्णला, रक्तकाकचिंची बंगाली श्वेत कुच, लाल कुच मराठी गुंजा गुजराती धोलीचणोरी, राती, चणोरी तेलगू गुलुविदे फारसी चश्मेखरुस अरबी हबसुफेद
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m=चमत्कारी तंत्र वनस्पति गुंजा

चमत्कारी है गुंजा
तांत्रिक जड़ीबूटियां भाग -9

गुंजा एक फली का बीज है। इसको धुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसकी बेल काफी कुछ मटर की तरह ही लगती है किन्तु अपेक्षाकृत मजबूत काष्ठीय तने वाली। इसे अब भी कहीं कहीं आप सुनारों की दुकानों पर देख सकते हैं। कुछ वर्ष पहले तक सुनार इसे सोना तोलने के काम में लेते थे क्योंकि इनके प्रत्येक दाने का वजन लगभग बराबर होता है करीब 120 मिलीग्राम। ये हमारे जीवन में कितनी बसी है इसका अंदाज़ा मुहावरों और लोकोक्तियों में इसके प्रयोग से लग जाता है।

यह तंत्र शास्त्र में जितनी मशहूर है उतनी ही आयुर्वेद में भी। आयुर्वेद में श्वेत गूंजा का ही अधिक प्रयोग होता है औषध रूप में साथ ही इसके मूल का भी जो मुलैठी के समान ही स्वाद और गुण वाली होती है। इसीकारण कई लोग मुलैठी के साथ इसके मूल की भी मिलावट कर देते हैं।

वहीं रक्त गूंजा बेहद विषैली होती है और उसे खाने से उलटी दस्त पेट में मरोड़ और मृत्यु तक सम्भव है। आदिवासी क्षेत्रों में पशु पक्षी मारने और जंगम विष निर्माण में अब भी इसका प्रयोग होता है।

गुंजा की तीन प्रजातियां मिलती हैं:-

1• रक्त गुंजा: लाल काले रंग की ये प्रजाति भी तीन तरह की मिलती है जिसमे लाल और काले रंगों का अनुपात 10%, 25% और 50% तक भी मिलता है।

ये मुख्यतः तंत्र में ही प्रयोग होती है।

श्वेत गुंजा • श्वेत गुंजा में भी एक सिरे पर कुछ कालिमा रहती है। यह आयुर्वेद और तंत्र दोनों में ही सामान रूप से प्रयुक्त होती है। ये लाल की अपेक्षा दुर्लभ होती है।

काली गुंजा: काली गुंजा दुर्लभ होती है, आयुर्वेद में भी इसके प्रयोग लगभग नहीं हैं हाँ किन्तु तंत्र प्रयोगों में ये बेहद महत्वपूर्ण है।

इन तीन के अलावा एक अन्य प्रकार की गुंजा पायी जाती है पीली गुंजा ये दुर्लभतम है क्योंकि ये कोई विशिष्ट प्रजाति नहीं है किन्तु लाल और सफ़ेद प्रजातियों में कुछ आनुवंशिक विकृति होने पर उनके बीज पीले हो जाते हैं। इस कारण पीली गूंजा कभी पूर्ण पीली तो कभी कभी लालिमा या कालिमा मिश्रित पीली भी मिलती है।

इस चमत्कारी वनस्पति गुंजा के कुछ प्रयोग:-

1• सम्मान प्रदायक :

शुद्ध जल (गंगा का, अन्य तीर्थों का जल या कुएं का) में गुंजा की जड़ को चंदन की भांति घिसें। अच्छा यही है कि किसी ब्राह्मण या कुंवारी कन्या के हाथों से घिसवा लें। यह लेप माथे पर चंदन की तरह लगायें। ऐसा व्यक्ति सभा-समारोह आदि जहां भी जायेगा, उसे वहां विशिष्ट सम्मान प्राप्त होगा।

2• कारोबार में बरकत

किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार के दिन 1 तांबे का सिक्का, 6 लाल गुंजा लाल कपड़े में बांधकर प्रात: 11 बजे से लेकर 1 बजे के बीच में किसी सुनसान जगह में अपने ऊपर से 11 बार उसार कर 11 इंच गहरा गङ्ढा खोदकर उसमें दबा दें। ऐसा 11 बुधवार करें। दबाने वाली जगह हमेशा नई होनी चाहिए। इस प्रयोग से कारोबार में बरकत होगी, घर में धन रूकेगा।

3"• ज्ञान-बुद्धि वर्धक :

(क) गुंजा-मूल को बकरी के दूध में घिसकर हथेलियों पर लेप करे, रगड़े कुछ दिन तक यह प्रयोग करते रहने से व्यक्ति की बुद्धि, स्मरण-शक्ति तीव्र होती है, चिंतन, धारणा आदि शक्तियों में प्रखरता व तीव्रता आती है।

(ख) यदि सफेद गुंजा के 11 या 21 दाने अभिमंत्रित करके विद्यार्थियों के कक्ष में उत्तर पूर्व में रख दिया जाये तो एकाग्रता एवं स्मरण शक्ति में लाभ होता है।

4• वर-वधू के लिए :

विवाह के समय लाल गुंजा वर के कंगन में पिरोकर पहनायी जाती है। यह तंत्र का एक प्रयोग है, जो वर की सुरक्षा, समृद्धि, नजर-दोष निवारण एवं सुखद दांपत्य जीवन के लिए है। गुंजा की माला आभूषण के रूप में पहनी जाती है।

5• पुत्रदाता :

शुभ मुहुर्त में श्वेत गुंजा की जड़ लाकर दूध से धोकर, सफेद चन्दन पुष्प से पूजा करके सफेद धागे में पिरोकर। “ऐं क्षं यं दं” मंत्र के ग्यारह हजार जाप करके स्त्री या पुरूष धारण करे तो संतान सुख की प्राप्ती होती है।

6• वशीकरण -

(क) आप जिस व्यक्ति का वशीकरण करना चाहते हों उसका चिंतन करते हुए मिटटी का दीपक लेकर अभिमंत्रित गुंजा के ५ दाने लेकर शहद में डुबोकर रख दें. इस प्रयोग से शत्रु भी वशीभूत हो जाते हैं. यह प्रयोग ग्रहण काल, होली, दीवाली, पूर्णिमा, अमावस्या की रात में यह प्रयोग में करने से बहुत फलदायक होता है.

(ख) गुंजा के दानों को अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के पहने हुए कपड़े या रुमाल में बांधकर रख दिया जायेगा वह वशीभूत हो जायेगा. जब तक कपड़ा खोलकर गुंजा के दाने नहीं निकले जायेंगे वह व्यक्ति वशीकरण के प्रभाव में रहेगा.

( गुंजा की माला गले में धारण करने से सर्वजन वशीकरण का प्रभाव होता है.

7• विद्वेषण में प्रयोग :

किसी दुष्ट, पर-पीड़क, गुण्डे तथा किसी का घर तोड़ने वाले के घर में लाल गुंजा - रवि या मंगलवार के दिन इस कामना के साथ फेंक दिये जाये - 'हे गुंजा ! आप मेरे कार्य की सिद्धि के लिए इस घर-परिवार में कलह (विद्वेषण) उत्पन्न कर दो' तो आप देखेंगे कि ऐसा ही होने लगता है।

8• विष-निवारण :
गुंजा की जड़ धो-सुखाकर रख ली जाये। यदि कोई व्यक्ति विष-प्रभाव से अचेत हो रहा हो तो उसे पानी में जड़ को घिसकर पिलायें।

इसको पानी में घिस कर पिलाने से हर प्रकार का विष उतर जाता है।

9• दिव्य दृष्टि :-

(क) अलौकिक तामसिक शक्तियों के दर्शन :

भूत-प्रेतादि शक्तियों के दर्शन करने के लिए मजबूत हृदय वाले व्यक्ति, गुंजा मूल को रवि-पुष्य योग में या मंगलवार के दिन- शुद्ध शहद में घिस कर आंखों में अंजन (सुरमा/काजल) की भांति लगायें तो भूत, चुडैल, प्रेतादि के दर्शन होते हैं।

(ख) गुप्त धन दर्शन :

अंकोल या अंकोहर के बीजों के तेल में गुंजा-मूल को घिस कर आंखों पर अंजन की तरह लगायें। यह प्रयोग रवि-पुष्य योग में, रवि या मंगलवार को ही करें। इसको आंजने से पृथ्वी में गड़ा खजाना तथा आस पास रखा धन दिखाई देता है।

10• शत्रु में भय उत्पन्न :

गुंजा-मूल (जड़) को किसी स्त्री के मासिक स्राव में घिस कर आंखों में सुरमे की भांति लगाने से शत्रु उसकी आंखों को देखते ही भाग खड़े होते हैं।

11• शत्रु दमन प्रयोग :

यदि लड़ाई झगड़े की नौबत हो तो काले तिल के तेल में गुंजामूल को घिस कर, उस लेप को सारे शरीर में मल लें। ऐसा व्यक्ति शत्रुओं को बहुत भयानक तथा सबल दिखाई देगा। फलस्वरूप शत्रुदल चुपचाप भाग जायेगा।

12• रोग - बाधा

(क) कुष्ठ निवारण प्रयोग :

गुंजा मूल को अलसी के तेल में घिसकर लगाने से कुष्ठ (कोढ़) के घाव ठीक हो जाते हैं।

(ख)अंधापन समाप्त :

गुंजा-मूल को गंगाजल में घिसकर आंखों मे लगाने से आंसू बहुत आते हैं।नेत्रों की सफाई होती है आँखों का जाल कटता है।

देशी घी (गाय का) में घिस कर लगाते रहने से इन दोनों प्रयोगों से अंधत्व दूर हो जाता है।

(ग) वाजीकरण:

श्वेत गुंजा की जड को गाय के शुद्ध घृत में पीसकर लेप तैयार करें। यह लेप शिश्न पर मलने से कामशक्ति की वृद्धि के साथ स्तंभन शक्ति में भी वृद्धि होती है।

13: नौकरी में बाधा

राहु के प्रभाव के कारण व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो तो लाल गुंजा व सौंफ को लाल वस्त्र में बांधकर अपने कमरे में रखें।

**दुर्लभ काली गुंजा के कुछ प्रयोग:

1• काली गुंजा की विशेषता है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, उस पर मुसीबत पड़ने पर इसका रंग स्वतः ही बदलने लगता है ।

2• दिवाली के दिन अपने गल्‍ले के नीचे काली गुंजा जंगली बेल के दाने डालने से व्‍यवसाय में हो रही हानि रूक जाती है।

3• दिवाली की रात घर के मुख्‍य दरवाज़े पर सरसों के तेल का दीपक जला कर उसमें काली गुंजा के 2-4 दाने डाल दें। ऐसा करने पर घर सुरक्षित और समृद्ध रहता है।

4• होलिका दहन से पूर्व पांच काली गुंजा लेकर होली की पांच परिक्रमा लगाकर अंत में होलिका की ओर पीठ करके पाँचों गुन्जाओं को सिर के ऊपर से पांच बार उतारकर सिर के ऊपर से होली में फेंक दें।

5• घर से अलक्ष्मी दूर करने का लघु प्रयोग-

ध्यानमंत्र :

ॐ तप्त-स्वर्णनिभांशशांक-मुकुटा रत्नप्रभा-भासुरीं ।
नानावस्त्र-विभूषितां त्रिनयनां गौरी-रमाभ्यं युताम् ।
दर्वी-हाटक-भाजनं च दधतीं रम्योच्चपीनस्तनीम् ।
नित्यं तां शिवमाकलय्य मुदितां ध्याये अन्नपूर्णश्वरीम् ॥

मन्त्र :

ॐ ह्रीम् श्रीम् क्लीं नमो भगवति माहेश्वरि मामाभिमतमन्नं देहि-देहि अन्नपूर्णों स्वाहा ।


विधि :

जब रविवार या गुरुवार को पुष्प नक्षत्र हो या नवरात्र में अष्टमी के दिन या दीपावली की रात्रि या अन्य किसी शुभ दिन से इस मंत्र की एक माला रुद्राक्ष माला से नित्य जाप करें । जाप से पूर्व भगवान श्रीगणेश जी का ध्यान करें तथा भगवान शिव का ध्यान कर नीचे दिये ध्यान मंत्र से माता अन्नपूर्णा का ध्यान करें ।

इस मंत्र का जाप दुकान में गल्ले में सात काली गुंजा के दाने रखकर शुद्ध आसन, (कम्बल आसन, या साफ जाजीम आदि ) पर बैठकर किया जाए तो व्यापार में आश्चर्यजनक लाभ महसूस होने गेगा ।

6• कष्टों से छुटकारे हेतु

यदि संपूर्ण दवाओं एवं डाक्टर के इलाज के बावजूद भी यदि घुटनों और पैरों का दर्द दूर नहीं हो रहा हो तो रवि पुष्य नक्षत्र, शनिवार या शनि आमवस्या के दिन यह उपाय करें। प्रात:काल नित्यक्रम से निवृत हो स्नानोपरांत लोहे की कटोरी में श्रद्धानुसार सरसों का तेल भरें। 7 चुटकी काले तिल, 7 लोहे की कील और 7 लाल और 7 काली गुंजा उसमें डाल दें। तेल में अपना मुंह देखने के बाद अपने ऊपर से 7 बार उल्टा उसारकर पीपल के पेड़ के नीचे इस तेल का दीपक जला दें 21 परिक्रमा करें और वहीं बैठकर 108 बार

ऊँ शं विधिरुपाय नम:।।

इस मंत्र का जाप करें। ऐसा 11 शनिवार करें। कष्टों से छुटकारा मिलेगा।


पीली गुंजा:

1• पीले रंग की गुंजा के बीज ,हल्दी की गांठे, सात कौडियों की पूजा अर्चना करके श्री लक्ष्मीनारायण भगवान के मंत्रों से अभिमंत्रित करके पूजा स्थान में रखने से दाम्पत्य सुख एवं परिवार,मे एकता तथा आर्थिक व्यावसायिक सिद्धि मिलती है

2• इसकी माला या ब्रेसलेट धारण करने से व्यक्ति का चित्त शांत रहता है, तनाव से मुक्ति मिलती है।
3• पीत गुंजा की माला गुरु गृह को अनुकूल करती है।
4• अनिद्रा से पीड़ित लोगों को इसकी माला धारण करने से लाभ मिलता है।
5• बड़ी उम्र के जो लोग स्वप्न में डरते हैं या जिन्हें अक्सर ये लगता है की कोई उनका गला दबा रहा है उन्हें इसकी माला या ब्रेसलेट पहनना चाहिए।

अन्य किसी जानकारी, समस्या समाधान और कुंडली विश्लेषण हेतु सम्पर्क कर सकते हैं।
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n=क्या आप जानते है बड़े काम की और चमत्कारी होती है गूंजा


गुंजा या रत्ती (Coral Bead) लता जाति की एक वनस्पति है। शिम्बी के पक जाने पर लता शुष्क हो जाती है। गुंजा के फूल सेम की तरह होते हैं। शिम्बी का आकार बहुत छोटा होता है, परन्तु प्रत्येक में 4-5 गुंजा बीज निकलते हैं अर्थात सफेद में सफेद तथा रक्त में लाल बीज निकलते हैं। अशुद्ध फल का सेवन करने से विसूचिका की भांति ही उल्टी और दस्त हो जाते हैं। इसकी जड़े भ्रमवश मुलहठी के स्थान में भी प्रयुक्त होती है

इसको चिरमिटी, धुंघची, रत्ती आदि नामों से जाना जाता है। इसे आप सुनारों की दुकानों पर देख सकते हैं। इसका वजन एक रत्ती होता है, जो सोना तोलने के काम आती है। यह तीन रंगों में मिलती है। सफेद गुंजा का प्रयोग तंत्र तथा उपचार में होता है, न मिलने पर लाल गुंजा भी प्रयोग में ली जा सकती है। परंतु काली गुंजा दुर्लभ होती है।

गुंजा का प्रयोग अनेक तांत्रिक कार्यों में होता है. यह एक लता का बीज होता है. जो लाल रंग का होता है. सफ़ेद और काले रंग की गुंजा भी मिल सकती है. काली गुंजा बहुत दुर्लभ होती है और वशीकरण के कार्यों में रामबाण की तरह काम करती है. गुंजा के बीजों के अलावा उसकी जड़ को बहुत उपयोगी मन गया है. गुंजा की महिमा कुछ इस प्रकार है -

वर-वधू के लिए : विवाह के समय लाल गुंजा वर के कंगन में पिरोकर पहनायी जाती है। यह तंत्र का एक प्रयोग है, जो वर की सुरक्षा, समृद्धि, नजर-दोष निवारण एवं सुखद दांपत्य जीवन के लिए है। गुंजा की माला आभूषण के रूप में पहनी जाती है। भगवान श्री कृष्ण भी गुंजामाला धारण करते थे। पुत्र की चाह वाली स्वस्थ स्त्री, शुभ नक्षत्र में गुंजा की जड़ को ताबीज में भरकर कमर में धारण करें। ऐसा करने से स्त्री पुत्र लाभ करती है।


विद्वेषण में प्रयोग :

किसी दुष्ट, पर-पीड़क, गुण्डे तथा किसी का घर तोड़ने वाले के घर में लाल गुंजा - रवि या मंगलवार के दिन इस कामना के साथ फेंक दिये जाये - 'हे गुंजा ! आप मेरे कार्य की सिद्धि के लिए इस घर-परिवार में कलह (विद्वेषण) उत्पन्न कर दो' तो आप देखेंगे कि ऐसा ही होने लगता है। विष-निवारण : गुंजा की जड़ धो-सुखाकर रख ली जाये।

यदि कोई व्यक्ति विष-प्रभाव से अचेत हो रहा हो तो उसे पानी में जड़ को घिसकर पिलायें। इसको पानी में घिस कर पिलाने से हर प्रकार का विष उतर जाता है।

सम्मान प्रदायक :

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Tuesday, January 12, 2016

10>SCIENTIST:-বিজ্ঞানী গণ ( 1 to 18)

10>Myc=Post=10>***SCIENTIST:-বিজ্ঞানী গণ****( 1 to 18 )

1-----------------------------------Yellapragada Subbarow
2-----------------------------------CV Raman
3-----------------------------------Homi J. Bhabha
4-----------------------------------Visvesvaraya
5-----------------------------------Venkatraman Radhakrishnan
6-----------------------------------S. Chandrasheka
7-----------------------------------Satyendra Nath Bose
8-----------------------------------Meghnad Saha
9-----------------------------------Srinivasa Ramanujan
10----------------------------------Jagadish Chandra Bose
11----------------------------------Vikram Sarabhai
12----------------------------------Salim Ali
13----------------------------------Har Gobind Khorana
14----------------------------------Birbal Sahni
15----------------------------------APJ Abdul Kalam
16----------------------------------Dr. VashishthaNarayanSingh।
17----------------------------------दुनिया के सबसे बेहतरीन आविष्कार जो भारत ने किए
18----------------------------------इतिहास में आजः 13 फरवरी ( गैलिलियो )
19>-----------------------महान पंडित श्रीनिवास रामानुजन्= गणित के महान पंडित
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1>SCIENTIST:-বিজ্ঞানী গণ

1..Yellapragada Subbarow  & 14 Indian Scientists Who Changed The World.

While FB is flooding with Birthday celebration of Swami Vivekananda, I would like to post a few words about a brilliant Indian scientist, who was also born on 12th January. His contribution in the field of medicine and biochemistry is unmatched although he was never awarded Nobel prize in medicine. Nevertheless, many agreed, he deserved Nobel prize in medicine for any of his five major contributions in the area of Biochemistry and medicine.
So what are those ?
(1) Discovery of energy transfer mechanism in ATP (1930)
(2) Synthesis of folic acid (Vitamin B9)
(3) Discovery of methotrexate which was first anti-cancer drug used in chemotherapy -in a sense, he was father of Chemotherapy
(4) Discovery of hetrazan which was used by the World health Organization against filariasis
(5) world's first tetracycline antibiotic, aureomycin

He deserved Nobel prize not once but perhaps five times for all the above five major discoveries in Medicine in last century. Unfortunate as it is, he was also denied a faculty position in Harvard University and then he moved to a Govt lab in USA ( Lederle Laboratories ). In those days, he was victim of racial discrimination in academics. Nevertheless, as SN Bose said, a scientist is lived by his discoveries and not by the prize he wins.

Yellapragada Subbarow (12 January 1895 – 8 August 1948) was an Indian biochemist who discovered the function of adenosine triphosphate as an energy source in the cell, and developed methotrexate for the treatment of cancer. Most of his career was spent in the United States. Despite his isolation of
And other
14 Indian Scientists Who Changed The World.

Science is an important part of our everyday life, even more so than we notice. From our fancy gadgets to the the technologies we can’t live without, from our humble light bulb to the space explorations, it is all gift of science and technology.
I wonder what would we be doing if none of these things were invented? How often do we take out the time to think about those extra ordinary minds who made life easier for us? Here is a list of 14 Indian scientists who achieved a global recognition-

2. CV Raman
Chandrasekhara Venkata Raman won the Nobel Prize for Physics in 1930 for his pioneering work on scattering of light. Born in Tiruchirapalli on November 7, 1888, he was the first Asian and first non-White to receive any Nobel Prize in the sciences. Raman also worked on the acoustics of musical instruments. He was the first to investigate the harmonic nature of the sound of the Indian drums such as the tabla and the mridangam.

He discovered that, when light traverses a transparent material, some of the deflected light changes in wavelength. This phenomenon is now called the Raman scattering and is the result of the Raman effect.

In October 1970, he collapsed in his laboratory. He was moved to a hospital and the doctors gave him four hours to live. He survived and after a few days refused to stay in the hospital as he preferred to die in the gardens of his Institute (the Raman Research Institute in Bangalore) surrounded by his flowers. He died of natural causes on 21 November 1970.

Before dying, Raman told his students,
Do not allow the journals of the Academy to die, for they are the sensitive indicators of the quality of Science being done in the country and whether science is taking root in it or not.

3. Homi J. Bhabha

Born on October 30, 1909 in Bombay, Homi Jehangir Bhabha played an important role in the Quantum Theory.

He was the first person to become the Chairman of the Atomic Energy Commission of India. Having started his scientific career in nuclear physics from Great Britain, Bhabha returned to India and played a key role in convincing the Congress Party’s senior leaders, most notably Jawaharlal Nehru, to start the ambitious nuclear programme.

Bhabha is generally acknowledged as the father of Indian nuclear power. But few people know that he was absolutely against India manufacturing atomic bombs, even if the country had enough resources to do so. Instead he suggested that the production of an atomic reactor should be used to lessen India’s misery and poverty.

He died when Air India Flight 101 crashed near Mont Blanc on 24 January 1966. Many possible theories of the crash came up including a conspiracy theory in which the Central Intelligence Agency (CIA) is involved in order to paralyze India’s nuclear program.

4. Visvesvaraya
Born on 15 September 1860, Sir Mokshagundam Visvesvaraya was a notable Indian engineer, scholar, statesman and the Diwan of Mysore during 1912 to 1918. He was a recipient of the Indian Republic’s highest honour, the Bharat Ratna.

Sir M V suggested that India try to be at par with industrialized nations as he believed that India can become developed through industries.

He has the credit of inventing ‘automatic sluice gates’ and ‘block irrigation system’ which are still considered to be marvels in engineering. Each year, his birthday 15 September is celebrated as Engineer’s Day in India.

Since river beds were costly, he came up with an efficient way of filtering water through ‘Collector Wells’ in 1895 which was rarely seen anywhere in the world. (Source)

5. Venkatraman Radhakrishnan
Venkatraman Radhakrishnan was born on May 18, 1929 in Tondaripet, a suburb of Chennai. Venkataraman was a globally renowned space scientist and a member of the Royal Swedish Academy of Sciences.

He was an internationally acclaimed Astrophysicist and also known for his design and fabrication of ultralight aircraft and sailboats.

His observations and theoretical insights helped the community in unraveling many mysteries surrounding pulsars, interstellar clouds, galaxy structures and various other celestial bodies. He died at the age of 81 in Bangalore.

6. S. Chandrashekar
Born on October 19, 1910 in Lahore, British India, he was awarded the 1983 Nobel Prize for Physics for his mathematical theory of black holes. The Chandrasekhar limit is named after him. He was nephew of CV Raman. Chandra became a United States citizen in 1953.

His most celebrated work concerns the radiation of energy from stars, particularly white dwarf stars, which are the dying fragments of stars. He died on August 21, 1995, at the age of 82 in Chicago.

7. Satyendra Nath Bose
Born on January 1, 1894 in Calcutta, SN Bose was an Indian physicist specialising in quantum mechanics. He is of course most remembered for his role played in the class of particles ‘bosons‘, which were named after him by Paul Dirac to commemorate his work in the field.

Bose adapted a lecture at the University of Dhaka on the theory of radiation and the ultraviolet catastrophe into a short article called “Planck’s Law and the Hypothesis of Light Quanta” and sent it to Albert Einstein. Einstein agreed with him, translated Bose’s paper “Planck’s Law and Hypothesis of Light Quanta” into German, and had it published in Zeitschrift für Physik under Bose’s name, in 1924. This formed the basis of the Bose-Einstein Statistics.

In 1937, Rabindranath Tagore dedicated his only book on science, Visva–Parichay, to Satyendra Nath Bose. The Government of India awarded him India’s second highest civilian award, the Padma Vibhushan in 1954.

8. Meghnad Saha


Born on October 6, 1893 in Dhaka, Bangladesh, Meghnad Saha’s best-known work concerned the thermal ionisation of elements, and it led him to formulate what is known as the Saha Equation. This equation is one of the basic tools for interpretation of the spectra of stars in astrophysics. By studying the spectra of various stars, one can find their temperature and from that, using Saha’s equation, determine the ionisation state of the various elements making up the star.

He also invented an instrument to measure the weight and pressure of solar rays. But did you know, he was also the chief architect of river planning in India? He prepared the original plan for the Damodar Valley Project.

9. Srinivasa Ramanujan



Born on December 22, 1887 in Tamil Nadu, Ramanujam was an Indian mathematician and autodidact who, with almost no formal training in pure mathematics, made extraordinary contributions to mathematical analysis, number theory, infinite series, and continued fractions.

By age 11, he had exhausted the mathematical knowledge of two college students who were lodgers at his home. He was later lent a book on advanced trigonometry written by S. L. Loney. He completely mastered this book by the age of 13 and discovered sophisticated theorems on his own.

We hadn’t known before that he faced a lot of health problems while living in England due to scarcity of vegetarian food. He returned to India and died at a young age of 32.

Ramanujan’s home state of Tamil Nadu celebrates 22 December (Ramanujan’s birthday) as ‘State IT Day’, memorializing both the man and his achievements.

10. Jagadish Chandra Bose


Acharya J.C. Bose was a man of many talents. Born on 30 November, 1858 in Bikrampur, West Bengal, he was a polymath, physicist, biologist, botanist and archaeologist. He pioneered the study of radio and microwave optics, made important contributions to the study of plants and laid the foundation of experimental science in the Indian sub-continent. He was the first person to use semiconductor junctions to detect radio signals, thus demonstrating wireless communication for the first time. What’s more, he is also probably the father of open technology, as he made his inventions and work freely available for others to further develop. His reluctance for patenting his work is legendary.
Another of his well known inventions is the crescograph, through which he measured plant response to various stimuli and hypothesized that plants can feel pain, understand affection etc.
While most of us are aware of his scientific prowess, we might not be aware of his talent as an early writer of science fiction! He is in fact considered the father of Bengali science fiction.

11. Vikram Sarabhai

Considered as the Father of India’s space programme, Vikram Sarabhai was born on on 12 August, 1919 in the city of Ahmedabad in Gujarat. He was instrumental in the setting up of the Indian Space Research Organization (ISRO), when he successfully convinced the Indian government of the importance of a space programme for a developing nation after the launch of the Russian Sputnik, in this quote:


There are some who question the relevance of space activities in a developing nation. To us, there is no ambiguity of purpose. We do not have the fantasy of competing with the economically advanced nations in the exploration of the moon or the planets or manned space-flight.
But we are convinced that if we are to play a meaningful role nationally, and in the community of nations, we must be second to none in the application of advanced technologies to the real problems of man and society.
He was awarded the Padma Bhushan in 1966 and the Padma Vubhushan after his death in 1972. While everyone knows of his primary role in the establishment of ISRO, perhaps many of us do not know that he was also the force behind the establishment of many other Indian institutes of repute, most notably the Indian Institute of Management, Ahmedabad (IIM-A) and the Nehru Foundation for Development.


12. Salim Ali


Sálim Moizuddin Abdul Ali, born on November 12, 1896 in Mumbai, was an ornithologist and a naturalist. Salim Ali was among the first Indians to conduct systematic bird surveys across India and his bird books helped develop ornithology in the sub-continent.
This Birdman of India was the key figure behind the Bombay Natural History Society after 1947 and used his personal influence to garner government support for the organisation. He was awarded India’s second highest civilian honour, the Padma Vibhushan in 1976.


13. Har Gobind Khorana
Born on January 9, 1922 at Raipur village in West Punjab (now in Pakistan), Khorana was an Indian-American biochemist who shared the 1968 Nobel Prize for Physiology or Medicine with Marshall W. Nirenberg and Robert W. Holley for research that helped to show how the order of nucleotides in nucleic acids, which carry the genetic code of the cell, control the cell’s synthesis of proteins.
In 1970, Khorana became the first to synthesize an artificial gene in a living cell. His work became the foundation for much of the later research in biotechnology and gene therapy.
How many are aware that the University of Wisconsin-Madison, the Government of India (DBT Department of Biotechnology), and the Indo-US Science and Technology Forum jointly created the Khorana Program in 2007? The mission of the Khorana Program is to build a seamless community of scientists, industrialists, and social entrepreneurs in the United States and India. Khorana died of natural causes on November 9, 2011 at the age of 89.


14. Birbal Sahni




Born on November 14, 1891 in West Punjab, Sahni was an Indian paleobotanist who studied the fossils of the Indian subcontinent. He was also a geologist who took an interest in archaeology. His greatest contributions lie in the study of the plants of India in the present as well as the historical context.


He was elected a Fellow of the Royal Society of London (FRS) in 1936, the highest British scientific honor, awarded for the first time to an Indian botanist.


He was a founder of The Paleobotanical Society which established the Institute of Palaeobotany on 10 September 1946 and which initially functioned in the Botany Department of Lucknow University. Sahni died on 10 April 1949 due to a heart attack.

15. APJ Abdul Kalam


Avul Pakir Jainulabdeen Abdul Kalam, born on October 15, 1931 is an Indian scientist who worked as an Aerospace engineer with Defence Research and Development Organisation (DRDO) and Indian Space Research Organisation (ISRO).
Kalam started his career by designing a small helicopter for the Indian Army. Kalam was also part of the INCOSPAR committee working under Vikram Sarabhai, the renowned space scientist. In 1969, Kalam was transferred to the Indian Space Research Organization (ISRO) where he was the project director of India’s first indigenous Satellite Launch Vehicle (SLV-III) which successfully deployed the Rohini satellite in near earth’s orbit in July 1980.
He also served as the 11th President of India from 2002 to 2007. Kalam advocated plans to develop India into a developed nation by 2020 in his book India 2020. He has received several prestigious awards, including the Bharat Ratna, India’s highest civilian honour. Known for his love for children, did you know that Kalam had set a goal of meeting 100,000 students in the 2 years after his resignation from the role of scientific adviser in 1999? May he continue to inspire millions


আবদুল কালামের ১০টি উক্তি, যা আপনার জীবনধারা পালটে দেবে . 
১। 'স্বপ্ন সেটা নয় যেটা তুমি ঘুমিয়ে দেখো। স্বপ্ন সেটা যেটা তোমায় ঘুমোতে দেয় না।' 
২। 'সূর্যের মতো দীপ্তিমান হতে হলে প্রথমে তোমাকে সূর্যের মতোই পুড়তে হবে।' 
৩। 'যদি তুমি তোমার কাজকে স্যালুট কর, দেখো তোমায় আর কাউকে স্যালুট করতে হবে না। কিন্তু তুমি যদি                তোমার কাজকে অসম্মান কর, অমর্যাদা কর, ফাঁকি দাও, তাহলে তোমায় সবাইকে স্যালুট করতে হবে।'
 ৪। 'যারা হৃদয় দিয়ে কাজ করতে পারে না; তাদের অর্জন অন্তঃসারশূন্য, উৎসাহহীন সাফল্য চারদিকে তিক্ততার             উদ্ভব ঘটায়।'
 ৫। প্রতিদিন সকালে এই পাঁচটা লাইন বলো : ১) আমি সেরা। ২) আমি করতে পারি ৩) সৃষ্টিকর্তা সব সময় আমার            সঙ্গে আছে ৪) আমি জয়ী ৫) আজ দিনটা আমার 
৬। 'ভিন্নভাবে চিন্তা করার ও উদ্ভাবনের সাহস থাকতে হবে, অপরিচিত পথে চলার ও অসম্ভব জিনিস আবিষ্কারের              সাহস থাকতে হবে এবং সমস্যাকে জয় করে সফল হতে হবে। এ সকল মহানগুণের দ্বারা তরুণদের চালিত 
       হতে হবে। তরুণ প্রজন্মের প্রতি এই আমার বার্তা।' 
৭। 'জীবন একটি কঠিন খেলা। ব্যক্তি হিসেবে মৌলিক অধিকার ধরে রাখার মাধ্যমেই শুধুমাত্র তুমি সেখানে জয়ী              হতে পারবে।' 
৮। 'আকাশের দিকে তাকাও। আমরা একা নই। পুরো মহাবিশ্ব আমাদের প্রতি বন্ধুত্বসুলভ। যারা স্বপ্ন দেখে এবং              কাজ করে শুধুমাত্র তাদেরকেই শ্রেষ্ঠটা দেওয়ার জন্য চক্রান্তে লিপ্ত এই বিশ্ব।'
 ৯। 'উৎকর্ষতা একটি চলমান প্রক্রিয়া এবং এটি কোনো আকস্মিক ঘটনা নয়।' 
১০ 'যদি একটি দেশকে দুর্নীতিমুক্ত এবং সুন্দর মনের মানুষের জাতি হতে হয়, তাহলে আমি দৃঢ়ভাবে বিশ্বাস করি এ       ক্ষেত্রে তিনজন সামাজিক সদস্য পার্থক্য এনে দিতে পারে। তারা হলেন বাবা, মা এবং শিক্ষক।' - 

16> Dr. VashishthaNarayanSingh

পৃথিবীকাঁপানো এই বিখ্যাত মনিষীর কাহিনী পড়ে আমি স্তম্ভিত হয়ে গেছি। হায়রে মানব জীবন!
১৯৬১ সালে পুরো ভারতবর্ষে মাধ্যমিক পরীক্ষায় প্রথম। এরপর ১৯৬৩ সালে ইউনিভার্সিটি অব ক্যালিফোর্নিয়া
থেকে মাত্র দুবছরের মাঝে গণিতে মাস্টার্স ডিগ্রী লাভ করে ১৯৬৯ সালে গণিতে পিএইচডি।
Reproducing Kernels and Operators with a Cyclic Vector- এর জনক হিসাবে স্বীকৃতি। ১৯৬৯ সালেই
নাসার গবেষক হিসাবে যোগদান করে ১৯৭৩ সালে দেশ সেবার মহানব্রত নিয়ে ফিরে আসেন ভারতে। নাসা'তে
উনার অভূতপূর্ব সাফল্যের জন্য বলা হয়েছিলো- গণিতে যদি কোনো নোবেল পুরস্কার থাকতো তবে সেটা উনারই
প্রাপ্য হতো। আইআইটি সহ ভারতের একাধিক বিশ্ববিদ্যালয়ে অধ্যাপনায় নিজেকে নিয়োজিত করেন। তারপর শুরু
হতে থাকে ধীরে ধীরে উনার মানসিক ভারসাম্য হীনতা। তিনি সিজোফ্রেনিয়া নামক একটি রোগে আক্রান্ত হন।
(এ রোগের বৈশিষ্ট্য হচ্ছে ভুলভাল শোনা, উদ্ভট, বিভ্রান্তিকর বা অলীক কিছু দেখা এবং অসঙ্গতিপূর্ণ কথাবার্তা এবং
চিন্তাধারা এবং অনুভূতির প্রকাশের মধ্যে সঙ্গতি থাকে না। এ রোগে আক্রান্ত ব্যক্তি সামাজিক বা কর্মক্ষেত্রে প্রায়শঃই
অক্ষমতাজনিত অসুবিধার সম্মুখীন হন।)
উনি স্ত্রী, ঘর ,সংসার সবকিছু থেকে আলাদা হয়ে যান। প্রায় তিন বছর ব্যাঙ্গালোরের একটি মেডিকেলে চিকিৎসাধীন
থাকা অবস্থায় ১৯৮৮ সালের পর থেকে একেবারেই নিঁখোজ । কারো সাথে কোনো যোগাযোগ নেই। কেউজানেনা উনি
বেঁচে আছেন নাকি মারা গেছেন। তারপর, ১৯৯২ সালে উনাকে পাওয়া যায় গৃহহীন হয়ে বিহারের রাস্তার ফুটপাথে অর্ধউলঙ্গ
হয়ে শুয়ে আছেন। কোনো কথা নেই, কাউকে চিনেন না। গণিতের অসংখ্য সূত্র যিনি পৃষ্ঠার পর পৃষ্ঠা মুহুর্তেই বলে দিতে
পারতেন- সেই বিদ্বান, মনিষী, গণিত বিজ্ঞানী নিজের নামটিও আর বলতে পারেননা। শুধু ভারত নয় , ক্যালিফোর্নিয়া
বিশ্ববিদ্যালয়ে উনি একনামে পরিচিত গণিত বিজ্ঞানী হিসাবে -
ড: বশিষ্ঠ নারায়ণ সিংহ। Dr. VashishthaNarayanSingh।
বিহারে যখন উনাকে ভবঘুরে অবস্থায় পাওয়া যায় তখনকার এই ছবি- পুরো ভারতবর্ষের মানুষ বিশেষ করে
শিক্ষিতজন উনার এই ছবি দেখে চমকে ওঠেছিলো। টাইমস অব ইন্ডিয়ায় হেডলাইন হয়। পাটনার এক ঘরে এখন
তিনি বলতে গেলে একেবারে একাকী জীবন যাপন করেন।এই অসামান্য গুণী মানুষের জীবন কাহিনী পড়ে আমি
নিথর,নীরব, নিস্তব্ধ হয়ে গেছি। হারিয়ে গেছি এক ভাবনার জগতে। হায়!! মানব জীবন!! আমরা কত বেশি অসহায়!!!
কত রহস্যময় এই পৃথিবী। কখন,কেমন করে,কীভাবে যে কি হয়ে যায়। নিমিষেই বদলে যায় মানুষেরজীবন।
এই রকম জীবন্ত একটা দৃষ্টান্ত থেকে যদি শিখার কিছু না থাকে তবে আমাদের চেয়ে হতভাগা আর কেউ নেই।
নিমিষেই সবকিছু চূর্ণ হয়ে যায়।.............
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17>दुनिया के सबसे बेहतरीन आविष्कार जो भारत ने किए – तथ्य।

बहुत से लोग यह मानते या कहते पाए गए हैं कि पश्चिम ने विश्व को विज्ञान दिया और पूर्व ने धर्म। दूसरी ओर हमारे ही भारतीय लोग यह कहते हुए भी पाए गए हैं कि भारत में कोई वैज्ञानिक सोच कभी नहीं रही। ऐसे लोग अपने अधूरे ज्ञान का परिचय देते हैं या फिर वे भारत विरोधी हैं।
भारत के बगैर न धर्म की कल्पना की जा सकती है और न विज्ञान की। हमारे भारतीय ऋषि-मुनियों और वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसे आविष्कार किए और सिद्धांत गढ़े हैं कि जिनके बल पर ही आज के आध‍ुनिक विज्ञान और दुनिया का चेहरा बदल गया है। सोचिए 0 (शून्य) नहीं होता तो क्या हम गणित की कल्पना कर सकते थे? दशमलव (.) नहीं होता तो क्या होता? इसी तरह भारत ने कई मूल: आविष्कार और सिद्धांतों की रचना की। आइए जानते हैं, उनमें से खास 10 आविष्कार जिन्होंने बदल दी दुनिया।

#1. विमान

इतिहास की किताबों और स्कूलों के कोर्स में पढ़ाया जाता है कि विमान का आविष्कार राइट ब्रदर्स ने किया, लेकिन यह गलत है। हां, यह ठीक है कि आज के आधुनिक विमान की शुरुआत ओरविल और विल्बुर राइट बंधुओं ने 1903 में की थी। लेकिन उनसे हजारों वर्ष पूर्व ऋषि भारद्वाज ने विमानशास्त्र लिखा था जिसमें हवाई जहाज बनाने की तकनीक का वर्णन मिलता है।चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखित ‘वैमानिक शास्त्र’ में एक उड़ने वाले यंत्र ‘विमान’ के कई प्रकारों का वर्णन किया गया था तथा हवाई युद्ध के कई नियम व प्रकार बताए गए थे।
‘गोधा’ ऐसा विमान था, जो अदृश्य हो सकता था। ‘परोक्ष’ दुश्मन के विमान को पंगु कर सकता था। ‘प्रलय’ एक प्रकार की विद्युत ऊर्जा का शस्त्र था जिससे विमान चालक भयंकर तबाही मचा सकता था। ‘जलद रूप’ एक ऐसा विमान था, जो देखने में बादल की भांति दिखता था।
स्कंद पुराण के खंड 3 अध्याय 23 में उल्लेख मिलता है कि ऋषि कर्दम ने अपनी पत्नी के लिए एक विमान की रचना की थी जिसके द्वारा कहीं भी आया-जाया सकता था। रामायण में भी पुष्पक विमान का उल्लेख मिलता है जिसमें बैठकर रावण सीताजी को हर ले गया था।

#2.अस्त्र-शस्त्र

धनुष-बाण, भाला या तलवार की बात नहीं कर रहे हैं। इसका आविष्कार तो भारत में हुआ ही है लेकिन हम आग्नेय अस्त्रों की बात कर रहे हैं। आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, पाशुपतास्त्र, सर्पास्त्र, ब्रह्मास्त्र आदि अनेक ऐसे अस्त्र हैं जिसका आधुनिक रूप बंदूक, मशीनगन, तोप, मिसाइल, विषैली गैस तथा परमाणु अस्त्र हैं।

वेद और पुराणों में निम्न अस्त्रों का वर्णन मिलता है:- इन्द्र अस्त्र, आग्नेय अस्त्र, वरुण अस्त्र, नाग अस्त्र, नाग पाशा, वायु अस्त्र, सूर्य अस्त्र, चतुर्दिश अस्त्र, वज्र अस्त्र, मोहिनी अस्त्र, त्वाश्तर अस्त्र, सम्मोहन/ प्रमोहना अस्त्र, पर्वता अस्त्र, ब्रह्मास्त्र, ब्रह्मसिर्षा अस्त्र, नारायणा अस्त्र, वैष्णव अस्त्र, पाशुपत अस्त्र आदि।

महाभारत के युद्ध में कई प्रलयकारी अस्त्रों का प्रयोग हुआ है। उसमें से एक था ब्रह्मास्त्र। आधुनिक काल में परमाणु बम के जनक जे. रॉबर्ट ओपनहाइमर ने गीता और महाभारत का गहन अध्ययन किया। उन्होंने महाभारत में बताए गए ब्रह्मास्त्र की संहारक क्षमता पर शोध किया और अपने मिशन को नाम दिया ट्रिनिटी (त्रिदेव)। रॉबर्ट के नेतृत्व में 1939 से 1945 के बीच वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह कार्य किया। 16 जुलाई 1945 को इसका पहला परमाणु परीक्षण किया गया।

परमाणु सिद्धांत और अस्त्र के जनक जॉन डाल्टन को माना जाता है, लेकिन उनसे भी 2,500 वर्ष पूर्व ऋषि कणाद ने वेदों में लिखे सूत्रों के आधार पर परमाणु सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। भारतीय इतिहास में ऋषि कणाद को परमाणुशास्त्र का जनक माना जाता है। आचार्य कणाद ने बताया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं। कणाद प्रभास तीर्थ में रहते थे। विख्यात इतिहासज्ञ टीएन कोलेबु्रक ने लिखा है कि अणुशास्त्र में आचार्य कणाद तथा अन्य भारतीय शास्त्रज्ञ यूरोपीय वैज्ञानिकों की तुलना में विश्वविख्यात थे

3.पहिए का आविष्कार

आज से 5,000 और कुछ 100 वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ जिसमें रथों के उपयोग का वर्णन है। जरा सोचिए पहिए नहीं होते तो क्या रथ चल पाता? इससे सिद्ध होता है कि पहिए 5,000 वर्ष पूर्व थे।

पहिए का आविष्कार मानव विज्ञान के इतिहास में महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। पहिए के आविष्कार के बाद ही साइकल और फिर कार तक का सफर पूरा हुआ। इससे मानव को गति मिली। गति से जीवन में परिवर्तन आया। हमारे पश्‍चिमी विद्वान पहिए के आविष्कार का श्रेय इराक को देते हैं, जहां रेतीले मैदान हैं, जबकि इराक के लोग 19वीं सदी तक रेगिस्तान में ऊंटों की सवारी करते रहे।

हालांकि रामायण और महाभारतकाल से पहले ही पहिए का चमत्कारी आविष्कार भारत में हो चुका था और रथों में पहियों का प्रयोग किया जाता था। विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता सिन्धु घाटी के अवशेषों से प्राप्त (ईसा से 3000-1500 वर्ष पूर्व की बनी) खिलौना हाथीगाड़ी भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रमाणस्वरूप रखी है। सिर्फ यह हाथीगाड़ी ही प्रमाणित करती है कि विश्व में पहिए का निर्माण इराक में नहीं, बल्कि भारत में ही हुआ था।

5.बिजली का आविष्कार

महर्षि अगस्त्य एक वैदिक ॠषि थे। निश्चित ही बिजली का आविष्कार थॉमस एडिसन ने किया लेकिन एडिसन अपनी एक किताब में लिखते हैं कि एक रात मैं संस्कृत का एक वाक्य पढ़ते-पढ़ते सो गया। उस रात मुझे स्वप्न में संस्कृत के उस वचन का अर्थ और रहस्य समझ में आया जिससे मुझे मदद मिली।
महर्षि अगस्त्य राजा दशरथ के राजगुरु थे। इनकी गणना सप्तर्षियों में की जाती है। ऋषि अगस्त्य ने ‘अगस्त्य संहिता’ नामक ग्रंथ की रचना की। आश्चर्यजनक रूप से इस ग्रंथ में विद्युत उत्पादन से संबंधित सूत्र मिलते हैं-

संस्थाप्य मृण्मये पात्रे ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
छादयेच्छिखिग्रीवेन चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥

दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥

-अगस्त्य संहिता

अर्थात : एक मिट्टी का पात्र लें, उसमें ताम्र पट्टिका (Copper Sheet) डालें तथा शिखिग्रीवा (Copper sulphate) डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगाएं, ऊपर पारा (mercury‌) तथा दस्त लोष्ट (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो उससे मित्रावरुणशक्ति (Electricity) का उदय होगा।

अगस्त्य संहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग (Electroplating) के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पॉलिश चढ़ाने की विधि निकाली अत: अगस्त्य को कुंभोद्भव (Battery Bone) कहते हैं।

6.बटन

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि शर्ट के बटन का आविष्कार भारत में हुआ। इसका सबसे पहला प्रमाण मोहन जोदड़ो की खुदाई में प्राप्त हुआ। खुदाई में बटनें पाई गई हैं। सिन्धु नदी के पास आज से 2500 से 3000 पहले यह सभ्यता अपने अस्तित्व में थी।

7.ज्यामिति

बौधायन भारत के प्राचीन गणितज्ञ और शुल्व सूत्र तथा श्रौतसूत्र के रचयिता हैं। पाइथागोरस के सिद्धांत से पूर्व ही बौधायन ने ज्यामिति के सूत्र रचे थे लेकिन आज विश्व में यूनानी ज्या‍मितिशास्त्री पाइथागोरस और यूक्लिड के सिद्धांत ही पढ़ाए जाते हैं।

दरअसल, 2800 वर्ष (800 ईसापूर्व) बौधायन ने रेखागणित, ज्यामिति के महत्वपूर्ण नियमों की खोज की थी। उस समय भारत में रेखागणित, ज्यामिति या त्रिकोणमिति को शुल्व शास्त्र कहा जाता था।

शुल्व शास्त्र के आधार पर विविध आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाई जाती थीं। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में परिवर्तन करना, इस प्रकार के अनेक कठिन प्रश्नों को बौधायन ने सुलझाया।

8.रेडियो

इतिहास की किताब में बताया जाता है कि रेडियो का आविष्कार जी. मार्कोनी ने किया था, लेकिन यह सरासर गलत है। अंग्रेज काल में मार्कोनी को भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु के लाल डायरी के नोट मिले जिसके आधार पर उन्होंने रेडियो का आविष्कार किया। मार्कोनी को 1909 में वायरलेस टेलीग्राफी के लिए नोबेल पुरस्कार मिला। लेकिन संचार के लिए रेडियो तरंगों का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन मिलीमीटर तरंगें और क्रेस्कोग्राफ सिद्धांत के खोजकर्ता जगदीश चंद्र बसु ने 1895 में किया था।

इसके 2 साल बाद ही मार्कोनी ने प्रदर्शन किया और सारा श्रेय वे ले गए। चूंकि भारत उस समय एक गुलाम देश था इसलिए जगदीश चंद्र बसु को ज्यादा महत्व नहीं दिया गया। दूसरी ओर वे अपने आविष्कार का पेटेंट कराने में असफल रहे जिसके चलते मार्कोनी को रेडियो का आविष्कारक माना जाने लगा। संचार की दुनिया में रेडियो का आविष्कार सबसे बड़ी सफलता है। आज इसके आविष्कार के बाद ही टेलीविजन और मोबाइल क्रांति संभव हो पाई है।

9..प्लास्टिक सर्जरी

जी हां, प्लास्टिक सर्जरी के आविष्कार से दुनिया में क्रांति आ गई। पश्चिम के लोगों के अनुसार प्लास्टिक सर्जरी आधुनिक विज्ञान की देन है। प्लास्टिक सर्जरी का मतलब है- ‘शरीर के किसी हिस्से को ठीक करना।’ भारत में सुश्रुत को पहला शल्य चिकित्सक माना जाता है। आज से करीब 3,000 साल पहले सुश्रुत युद्ध या प्राकृतिक विपदाओं में जिनके अंग-भंग हो जाते थे या नाक खराब हो जाती थी, तो उन्हें ठीक करने का काम वे करते थे।

सुश्रुत ने 1,000 ईसा पूर्व अपने समय के स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के साथ प्रसव, मोतियाबिंद, कृत्रिम अंग लगाना, पथरी का इलाज और प्लास्टिक सर्जरी जैसी कई तरह की जटिल शल्य चिकित्सा के सिद्धांत प्रतिपादित किए थे। हालांकि कुछ लोग सुश्रुत का काल 800 ईसापूर्व का मानते हैं। सुश्रुत से पहले धन्वंतरि हुए थे।

10.गुरुत्वाकर्षन का नियम

हलांकि वेदों में गुरुत्वाकर्षन के नियम का स्पष्ट उल्लेख है लेकिन प्राचीन भारत के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री भास्कराचार्य ने इस पर एक ग्रंथ लिखा ‘सिद्धांतशिरोमणि’ इस ग्रंथ का अनेक विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ और यह सिद्धांत यूरोप में प्रचारित हुआ।

न्यूटन से 500 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण के नियम को जानकर विस्तार से लिखा था और उन्होंने अपने दूसरे ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ में इसका उल्लेख भी किया है।

गुरुत्वाकर्षण के नियम के संबंध में उन्होंने लिखा है, ‘पृथ्वी अपने आकाश का पदार्थ स्वशक्ति से अपनी ओर खींच लेती है। इस कारण आकाश का पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है।’ इससे सिद्ध होता है कि पृथ्वी में गुत्वाकर्षण की शक्ति है।

भास्कराचार्य द्वारा ग्रंथ ‘लीलावती’ में गणित और खगोल विज्ञान संबंधी विषयों पर प्रकाश डाला गया है। सन् 1163 ई. में उन्होंने ‘करण कुतूहल’ नामक ग्रंथ की रचना की। इस ग्रंथ में बताया गया है कि जब चन्द्रमा सूर्य को ढंक लेता है तो सूर्यग्रहण तथा जब पृथ्वी की छाया चन्द्रमा को ढंक लेती है तो चन्द्रग्रहण होता है। यह पहला लिखित प्रमाण था जबकि लोगों को गुरुत्वाकर्षण, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण की सटीक जानकारी थी।

11.भाषा का व्याकरण

दुनिया का पहला व्याकरण पाणिनी ने लिखा। 500 ईसा पूर्व पाणिनी ने भाषा के शुद्ध प्रयोगों की सीमा का निर्धारण किया। उन्होंने भाषा को सबसे सुव्यवस्थित रूप दिया और संस्कृत भाषा का व्याकरणबद्ध किया। इनके व्याकरण का नाम है अष्टाध्यायी जिसमें 8 अध्याय और लगभग 4 सहस्र सूत्र हैं। व्याकरण के इस महनीय ग्रंथ में पाणिनी ने विभक्ति-प्रधान संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और तर्कसिद्ध ढंग से संग्रहीत किए हैं।

अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। उस समय के भूगोल, सामाजिक, आर्थिक, शिक्षा और राजनीतिक जीवन, दार्शनिक चिंतन, खान-पान, रहन-सहन आदि के प्रसंग स्थान-स्थान पर अंकित हैं।

इनका जन्म पंजाब के शालातुला में हुआ था, जो आधुनिक पेशावर (पाकिस्तान) के करीब तत्कालीन उत्तर-पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। हालांकि पाणिनी के पूर्व भी विद्वानों ने संस्कृत भाषा को नियमों में बांधने का प्रयास किया लेकिन पाणिनी का शास्त्र सबसे प्रसिद्ध हुआ।

19वीं सदी में यूरोप के एक भाषा विज्ञानी फ्रेंज बॉप (14 सितंबर 1791- 23 अक्टूबर 1867) ने पाणिनी के कार्यों पर शोध किया। उन्हें पाणिनी के लिखे हुए ग्रंथों तथा संस्कृत व्याकरण में आधुनिक भाषा प्रणाली को और परिपक्व करने के सूत्र मिले। आधुनिक भाषा विज्ञान को पाणिनी के लिखे ग्रंथ से बहुत मदद मिली। दुनिया की सभी भाषाओं के विकास में पाणिनी के ग्रंथ का योगदान है।

वैसे तो भारतीयों ने बहुत सारे आविष्कार कियें हैं जिन्हें अंग्रेज भी मानते हैं, पर भारत पर पहले अंग्रेजों का राज था तो माना जाता है उन्होने हमे सच्चे इतिहास से दूर रखा और वेदों और ग्रथों में मिलावट की ताकि वे हर वस्तु पर अपना आधिपत्य जमा सकें। यह लेख इसलिए लिखा है ताकि हमारे भारत का युवा अपने ग्रंथों का सम्मान करे और जाने कि हम पहले बहुत ही महान थे।
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18>=इतिहास में आजः 13 फरवरी   ( गैलिलियो )

"पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है" इटली के महान दार्शनिक और वैज्ञानिक गैलिलियो के इस दावे को आज हर कोई मानता है. लेकिन 1633 में उनके दावे को ईश्वर से विद्रोह कहा गया. 13 फरवरी को शुरू हुए मुकदमे ने उनकी जान ले ली

पोप के आरोपों और आदेशों का सामना करने के लिए 13 फरवरी 1633 को प्रोफेसर गैलिलियो रोम आए. पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, चर्च ने उनके इस सिद्धांत को विद्रोह कहा और उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू की. अप्रैल में मुकदमा शुरू हुआ. गैलिलियो ने हल्की सजा पाने के लिए चर्च के सामने अपना गुनाह स्वीकार किया. इसके बाद उन्हें फ्लोरेंस में उनके घर में नजरबंद कर दिया गया. इसी पहरे के दौरान उनकी आठ जनवरी 1642 को मौत हो गई.

पीसा में रहने वाले एक संगीतकार के घर गैलिलियो ने 15 फरवरी 1564 को जन्म लिया था. वो पीसा यूनिवर्सिटी में मेडिसिन की पढ़ाई करने के लिए गए लेकिन वहां उनका ध्यान दर्शनशास्त्र और गणित की ओर झुक गया. उन्होंने रोमन दार्शनिक अरस्तू के उस सिद्धांत को गलत साबित किया जिसमें कहा गया था कि ऊपर से गिरने वाली चीज की गति उसके वजन पर आधारित होती है. पीसा की झुकी मीनार से हल्की और भारी चीजें साथ गिरा कर गैलिलियो ने इस सिद्धांत को गलत साबित किया.

इसके बाद गणित के प्रोफेसर गैलिलियो ने पोलैंड के खगोलशास्त्री निकोलाउस कॉपरनिकस के सिद्धांत का समर्थन किया. कॉपरनिकस ने कहा था कि सूर्य सौर मंडल का केंद्र है. यह सिद्धांत इटली पर राज करने वाले कैथोलिक चर्च से मेल नहीं खाता था. चर्च पृथ्वी को सौर मंडल ही नहीं बल्कि ब्रह्मांड का केंद्र कहता था. गैलिलियो ने कहा कि कॉपरनिकस सही हैं. सूर्य सौर मंडल का केंद्र है और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है. पोप ने गैलिलियो की किताबों पर प्रतिबंध लगा दिया और उन्हे ईश्वर विद्रोही करार दिया.


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19>महान पंडित श्रीनिवास रामानुजन्= गणित के महान पंडित

जानिये गणित के महान पंडित श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर को आज उनकी पुण्यतिथि है (22 दिसम्बर, 1887 – 26 अप्रैल, 1920) श्री निवास रामानुजन् इयंगर एक महान भारतीय गणितज्ञ थे। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने अपने प्रतिभा और लगन से न केवल गणित के क्षेत्र में अद्भुत अविष्कार किए वरन भारत को अतुलनीय गौरव भी प्रदान किया।

ये बचपन से ही विलक्षण प्रतिभावान थे। इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है, यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित मुख्यधारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है।

रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर1887 को भारत के दक्षिणी भूभाग में स्थित कोयंबटूर के ईरोड नामके गांव में हुआ था। वह पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। इनकी की माता का नाम कोमलताम्मल और इनके पिता का नाम श्रीनिवास अय्यंगर था। इनका बचपन मुख्यतः कुंभकोणम में बीता था जो कि अपने प्राचीन मंदिरों के लिए जाना जाता है। इन्होंने स्कूल के समय में ही कालेज के स्तर के गणित को पढ़ लिया था। एक बार इनके विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने यह भी कहा था कि विद्यालय में होने वाली परीक्षाओं के मापदंड रामानुजन के लिए लागू नहीं होते हैं। हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्हें गणित और अंग्रेजी मे अच्छे अंक लाने के कारण सुब्रमण्यम छात्रवृत्ति मिली और आगे कालेज की शिक्षा के लिए प्रवेश भी मिला।
आगे एक परेशानी आई। रामानुजन का गणित के प्रति प्रेम इतना बढ़ गया था कि वे दूसरे विषयों पर ध्यान ही नहीं देते थे। यहां तक की वे इतिहास, जीव विज्ञान की कक्षाओं में भी गणित के प्रश्नों को हल किया करते थे। नतीजा यह हुआ कि ग्यारहवीं कक्षा की परीक्षा में वे गणित को छोड़ कर बाकी सभी विषयों में फेल हो गए और परिणामस्वरूप उनको छात्रवृत्ति मिलनी बंद हो गई। एक तो घर की आर्थिक स्थिति खराब और ऊपर से छात्रवृत्ति भी नहीं मिल रही थी। रामानुजन के लिए यह बड़ा ही कठिन समय था। घर की स्थिति सुधारने के लिए इन्होने गणित के कुछ ट्यूशन तथा खाते-बही का काम भी किया। कुछ समय बाद 1907 में रामानुजन ने फिर से बारहवीं कक्षा की प्राइवेट परीक्षा दी और अनुत्तीर्ण हो गए। और इसी के साथ इनके पारंपरिक शिक्षा की इतिश्री हो गई।

विद्यालय छोड़ने के बाद का पांच वर्षों का समय इनके लिए बहुत हताशा भरा था। भारत इस समय परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा था। चारों तरफ भयंकर गरीबी थी। ऐसे समय में रामानुजन के पास न कोई नौकरी थी और न ही किसी संस्थान अथवा प्रोफेसर के साथ काम करने का मौका। बस उनका ईश्वर पर अटूट विश्वास और गणित के प्रति अगाध श्रद्धा ने उन्हें कर्तव्य मार्ग पर चलने के लिए सदैव प्रेरित किया। नामगिरी देवी रामानुजन के परिवार की ईष्ट देवी थीं। उनके प्रति अटूट विश्वास ने उन्हें कहीं रुकने नहीं दिया और वे इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी गणित के अपने शोध को चलाते रहे। इस समय रामानुजन को ट्यूशन से कुल पांच रूपये मासिक मिलते थे और इसी में गुजारा होता था। रामानुजन का यह जीवन काल बहुत कष्ट और दुःख से भरा था। इन्हें हमेशा अपने भरण-पोषण के लिए और अपनी शिक्षा को जारी रखने के लिए इधर उधर भटकना पड़ा और अनेक लोगों से असफल याचना भी करनी पड़ी।
विवाह और गणित साधना

वर्ष 1908 में इनके माता पिता ने इनका विवाह जानकी नामक कन्या से कर दिया। विवाह हो जाने के बाद अब इनके लिए सब कुछ भूल कर गणित में डूबना संभव नहीं था। अतः वे नौकरी की तलाश में मद्रास आए। बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण न होने की वजह से इन्हें नौकरी नहीं मिली और उनका स्वास्थ्य भी बुरी तरह गिर गया। अब डॉक्टर की सलाह पर इन्हें वापस अपने घर कुंभकोणम लौटना पड़ा। बीमारी से ठीक होने के बाद वे वापस मद्रास आए और फिर से नौकरी की तलाश शुरू कर दी। ये जब भी किसी से मिलते थे तो उसे अपना एक रजिस्टर दिखाते थे। इस रजिस्टर में इनके द्वारा गणित में किए गए सारे कार्य होते थे। इसी समय किसी के कहने पर रामानुजन वहां के डिप्टी कलेक्टर श्री वी. रामास्वामी अय्यर से मिले। अय्यर गणित के बहुत बड़े विद्वान थे। यहां पर श्री अय्यर ने रामानुजन की प्रतिभा को पहचाना और जिलाधिकारी श्री रामचंद्र राव से कह कर इनके लिए 25 रूपये मासिक छात्रवृत्ति का प्रबंध भी कर दिया। इस वृत्ति पर रामानुजन ने मद्रास में एक साल रहते हुए अपना प्रथम शोधपत्र प्रकाशित किया। शोध पत्र का शीर्षक था "बरनौली संख्याओं के कुछ गुण” और यह शोध पत्र जर्नल ऑफ इंडियन मैथेमेटिकल सोसाइटी में प्रकाशित हुआ था। यहां एक साल पूरा होने पर इन्होने मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क की नौकरी की। सौभाग्य से इस नौकरी में काम का बोझ कुछ ज्यादा नहीं था और यहां इन्हें अपने गणित के लिए पर्याप्त समय मिलता था। यहां पर रामानुजन रात भर जाग कर नए-नए गणित के सूत्र लिखा करते थे और फिर थोड़ी देर तक आराम कर के फिर दफ्तर के लिए निकल जाते थे। रामानुजन गणित के शोधों को स्लेट पर लिखते थे। और बाद में उसे एक रजिस्टर में लिख लेते थे।रात को रामानुजन के स्लेट और खड़िए की आवाज के कारण परिवार के अन्य सदस्यों की नींद चौपट हो जाती थी।


इस समय भारतीय और पश्चिमी रहन सहन में एक बड़ी दूरी थी और इस वजह से सामान्यतः भारतीयों को अंग्रेज वैज्ञानिकों के सामने अपने बातों को प्रस्तुत करने में काफी संकोच होता था। इधर स्थिति कुछ ऐसी थी कि बिना किसी अंग्रेज गणितज्ञ की सहायता लिए शोध कार्य को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था। इस समय रामानुजन के पुराने शुभचिंतक इनके काम आए और इन लोगों ने रामानुजन द्वारा किए गए कार्यों को लंदन के प्रसिद्ध गणितज्ञों के पास भेजा। पर यहां इन्हें कुछ विशेष सहायता नहीं मिली लेकिन एक लाभ यह हुआ कि लोग रामानुजन को थोड़ा बहुत जानने लगे थे। इसी समय रामानुजन ने अपने संख्या सिद्धांत के कुछ सूत्र प्रोफेसर शेषू अय्यर को दिखाए तो उनका ध्यान लंदन के ही प्रोफेसर हार्डी की तरफ गया। प्रोफेसर हार्डी उस समय के विश्व के प्रसिद्ध गणितज्ञों में से एक थे। और अपने सख्त स्वभाव और अनुशासन प्रियता के कारण जाने जाते थे। प्रोफेसर हार्डी के शोधकार्य को पढ़ने के बाद रामानुजन ने बताया कि उन्होने प्रोफेसर हार्डी के अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर खोज निकाला है। अब रामानुजन का प्रोफेसर हार्डी से पत्रव्यवहार आरंभ हुआ। अब यहां से रामानुजन के जीवन में एक नए युग का सूत्रपात हुआ जिसमें प्रोफेसर हार्डी की बहुत बड़ी भूमिका थी। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जिस तरह से एक जौहरी हीरे की पहचान करता है और उसे तराश कर चमका देता है, रामानुजन के जीवन में वैसा ही कुछ स्थान प्रोफेसर हार्डी का है। प्रोफेसर हार्डी आजीवन रामानुजन की प्रतिभा और जीवन दर्शन के प्रशंसक रहे। रामानुजन और प्रोफेसर हार्डी की यह मित्रता दोनो ही के लिए लाभप्रद सिद्ध हुई। एक तरह से देखा जाए तो दोनो ने एक दूसरे के लिए पूरक का काम किया। प्रोफेसर हार्डी ने उस समय के विभिन्न प्रतिभाशाली व्यक्तियों को 100 के पैमाने पर आंका था। अधिकांश गणितज्ञों को उन्होने 100 में 35 अंक दिए और कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को 60 अंक दिए। लेकिन उन्होंने रामानुजन को 100 में पूरे 100 अंक दिए थे।
आरंभ में रामानुजन ने जब अपने किए गए शोधकार्य को प्रोफेसर हार्डी के पास भेजा तो पहले उन्हें भी पूरा समझ में नहीं आया। जब उन्होंने अपने मित्र गणितज्ञों से सलाह ली तो वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि रामानुजन गणित के क्षेत्र में एक दुर्लभ व्यक्तित्व है और इनके द्वारा किए गए कार्य को ठीक से समझने और उसमें आगे शोध के लिए उन्हें इंग्लैंड आना चाहिए। अतः उन्होने रामानुजन को कैंब्रिज आने के लिए आमंत्रित किया।

कुछ व्यक्तिगत कारणों और धन की कमी के कारण रामानुजन ने प्रोफेसर हार्डी के कैंब्रिज के आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। प्रोफेसर हार्डी को इससे निराशा हुई लेकिन उन्होनें किसी भी तरह से रामानुजन को वहां बुलाने का निश्चय किया। इसी समय रामानुजन को मद्रास विश्वविद्यालय में शोध वृत्ति मिल गई थी जिससे उनका जीवन कुछ सरल हो गया और उनको शोधकार्य के लिए पूरा समय भी मिलने लगा था। इसी बीच एक लंबे पत्रव्यवहार के बाद धीरे-धीरे प्रोफेसर हार्डी ने रामानुजन को कैंब्रिज आने के लिए सहमत कर लिया। प्रोफेसर हार्डी के प्रयासों से रामानुजन को कैंब्रिज जाने के लिए आर्थिक सहायता भी मिल गई। रामानुजन ने इंग्लैण्ड जाने के पहले गणित के करीब 3000 से भी अधिक नये सूत्रों को अपनी नोटबुक में लिखा था।
रामानुजन ने लंदन की धरती पर कदम रखा। वहां प्रोफेसर हार्डी ने उनके लिए पहले से व्ववस्था की हुई थी अतः इन्हें कोई विशेष परेशानी नहीं हुई। इंग्लैण्ड में रामानुजन को बस थोड़ी परेशानी थी और इसका कारण था उनका शर्मीला, शांत स्वभाव और शुद्ध सात्विक जीवनचर्या। अपने पूरे इंग्लैण्ड प्रवास में वे अधिकांशतः अपना भोजन स्वयं बनाते थे। इंग्लैण्ड की इस यात्रा से उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। उन्होंने प्रोफेसर हार्डी के साथ मिल कर उच्चकोटि के शोधपत्र प्रकाशित किए। अपने एक विशेष शोध के कारण इन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा बी.ए. की उपाधि भी मिली। लेकिन वहां की जलवायु और रहन-सहन की शैली उनके अधिक अनुकूल नहीं थी और उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा। डॉक्टरों ने इसे क्षय रोग बताया। उस समय क्षय रोग की कोई दवा नहीं होती थी और रोगी को सेनेटोरियम मे रहना पड़ता था। रामानुजन को भी कुछ दिनों तक वहां रहना पड़ा। वहां इस समय भी यह गणित के सूत्रों में नई नई कल्पनाएं किया करते थे।
रॉयल सोसाइटी की सदस्यता

इसके बाद वहां रामानुजन को रॉयल सोसाइटी का फेलो नामित किया गया। ऐसे समय में जब भारत गुलामी में जी रहा था तब एक अश्वेत व्यक्ति को रॉयल सोसाइटी की सदस्यता मिलना एक बहुत बड़ी बात थी। रॉयल सोसाइटी के पूरे इतिहास में इनसे कम आयु का कोई सदस्य आज तक नहीं हुआ है। पूरे भारत में उनके शुभचिंतकों ने उत्सव मनाया और सभाएं की। रॉयल सोसाइटी की सदस्यता के बाद यह ट्रिनीटी कॉलेज की फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय भी बने। अब ऐसा लग रहा था कि सब कुछ बहुत अच्छी जगह पर जा रहा है। लेकिन रामानुजन का स्वास्थ्य गिरता जा रहा था और अंत में डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें वापस भारत लौटना पड़ा। भारत आने पर इन्हें मद्रास विश्वविद्यालय में प्राध्यापक की नौकरी मिल गई। और रामानुजन अध्यापन और शोध कार्य में पुनः रम गए।

भारत लौटने पर भी स्वास्थ्य ने इनका साथ नहीं दिया और हालत गंभीर होती जा रही थी। इस बीमारी की दशा में भी इन्होने मॉक थीटा फंक्शन पर एक उच्च स्तरीय शोधपत्र लिखा। रामानुजन द्वारा प्रतिपादित इस फलन का उपयोग गणित ही नहीं बल्कि चिकित्साविज्ञान में कैंसर को समझने के लिए भी किया जाता है।
इनका गिरता स्वास्थ्य सबके लिए चिंता का विषय बन गया और यहां तक की अब डॉक्टरों ने भीजवाब दे दिया था। अंत में रामानुजन के विदा की घड़ी आ ही गई। 26 अप्रैल1920 के प्रातः काल में वे अचेत हो गए और दोपहर होते होते उन्होने प्राण त्याग दिए। इस समय रामानुजन की आयु मात्र 33 वर्ष थी। इनका असमय निधन गणित जगत के लिए अपूरणीय क्षति था। पूरे देश विदेश में जिसने भी रामानुजन की मृत्यु का समाचार सुना वहीं स्तब्ध हो गया।
रामानुजन की कार्यशैली और शोध

रामानुजन और इनके द्वारा किए गए अधिकांश कार्य अभी भी वैज्ञानिकों के लिए अबूझ पहेली बने हुए हैं। एक बहुत ही सामान्य परिवार में जन्म ले कर पूरे विश्व को आश्चर्यचकित करने की अपनी इस यात्रा में इन्होने भारत को अपूर्व गौरव प्रदान किया। इनका उनका वह पुराना रजिस्टर जिस पर वे अपने प्रमेय और सूत्रों को लिखा करते थे 1976 में अचानक ट्रिनीटी कॉलेज के पुस्तकालय में मिला। करीब एक सौ पन्नों का यह रजिस्टर आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली बना हुआ है। इस रजिस्टर को बाद में रामानुजन की नोट बुक के नाम से जाना गया। मुंबई के टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान द्वारा इसका प्रकाशन भी किया गया है। रामानुजन के शोधों की तरह उनके गणित में काम करने की शैली भी विचित्र थी। वे कभी कभी आधी रात को सोते से जाग कर स्लेट पर गणित से सूत्र लिखने लगते थे और फिर सो जाते थे। इस तरह ऐसा लगता था कि वे सपने में भी गणित के प्रश्न हल कर रहे हों। रामानुजन के नाम के साथ ही उनकी कुलदेवी का भी नाम लिया जाता है। इन्होने शून्य और अनन्त को हमेशा ध्यान में रखा और इसके अंतर्सम्बन्धों को समझाने के लिए गणित के सूत्रों का सहारा लिया। रामानुजन के कार्य करने की एक विशेषता थी। पहले वे गणित का कोई नया सूत्र या प्रमेंय पहले लिख देते थे लेकिन उसकी उपपत्ति पर उतना ध्यान नहीं देते थे। इसके बारे में पूछे जाने पर वे कहते थे कि यह सूत्र उन्हें नामगिरी देवी की कृपा से प्राप्त हुए हैं। रामानुजन का आध्यात्म के प्रति विश्वास इतना गहरा था कि वे अपने गणित के क्षेत्र में किये गए किसी भी कार्य को आध्यात्म का ही एक अंग मानते थे। वे धर्म और आध्यात्म में केवल विश्वास ही नहीं रखते थे बल्कि उसे तार्किक रूप से प्रस्तुत भी करते थे। वे कहते थे कि "मेरे लिए गणित के उस सूत्र का कोई मतलब नहीं है जिससे मुझे आध्यात्मिक विचार न मिलते हों।

रामानुजन ने इंग्लैण्ड में पाँच वर्षों तक मुख्यतः संख्या सिद्धान्त के क्षेत्र में काम किया।

अतः 1729, 4104, 20683, 39312, 40033 आदि रामानुजन संख्याएं हैं।

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