Monday, December 21, 2015

4>ভারতীয় পরম্পরা ------( 2 )=1 to 6



4>Myc=Post=6>***ভারতীয় পরম্পরা Part=( 2 )***(1 to 6 )

1>“स्वस्तिक” का प्रयोग क्योँ और क्या है इसकी वैज्ञानिकता?
        (a)”अर्थ और निहित विश्वबन्धुत्व एवं कल्याण”:-
        (b)वैज्ञानिकता और शोध:-
        (c)मानक दर्शन:-
        (d)प्राचीन काल में राजा महाराज द्वारा किलों का निर्माण 
        (e)निष्कर्ष:-
2>जानिए किन 15 बातों की निशानी है तिलक -संस्कृति।
3>जानिए सूर्य पर जल चढ़ाने का वैज्ञानिक कारण।
4>जानिए हिन्दू धर्म के सोलह संस्कार – संस्कृति
5>ধর্মীয় রীতি কুসংস্কার না বিজ্ঞান?
6>हिंदू धर्म में किसी के मरने और जन्म लेने के बाद क्यों मनाया जाता है सूतक
7>हिंदू परम्पराओं से जुड़े वैज्ञानिक तर्क:
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ভারতীয় পরম্পরা ------( 2 )

1>“स्वस्तिक” का प्रयोग क्योँ और क्या है इसकी वैज्ञानिकता?

सनातन धर्म में स्वास्तिक का प्रयोग हर त्यौहार पर होता है। दीपावली हो या होली सभी इस को बनातें है और इसकी पूजा करते हैं। स्वस्तिक चिन्ह परमात्मा को भी बहुत प्रिय है। आज हम आपको इस अनमोल चिन्ह का प्रयोग और वैज्ञानिकता बताने वाले हैं, ध्यान से पढ़े।

(a)”अर्थ और निहित विश्वबन्धुत्व एवं कल्याण”:-

स्वस्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभकार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्व अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। ‘सु’ का अर्थ अच्छा, ‘अस’ का अर्थ ‘सत्ता’ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का अर्थ ‘कर्त्ता’ या करने वाले से है। इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द का अर्थ हुआ ‘अच्छा’ या ‘मंगल’ करने वाला। ‘अमरकोश’ में भी ‘स्वस्तिक’ का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं – ‘स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध’ अर्थात् ‘सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।’ इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना निहित है।

‘स्वस्तिक’ शब्द की निरुक्ति है – ‘स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः’ अर्थात् ‘कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है।

(b)वैज्ञानिकता और शोध:-

यदि आधुनिक दृ्ष्टिकोण से देखा जाए तो अब तो विज्ञान भी स्वस्तिक, इत्यादि माँगलिक चिन्हों की महता स्वीकार करने लगा है । आधुनिक विज्ञानने वातावरण तथा किसी भी जीवित वस्तु,पदार्थ इत्यादि के उर्जा को मापने के लिए विभिन्न उपकरणों का आविष्कार किया है ओर इस उर्जा मापने की इकाई को नाम दिया है—“बोविस” । मृत मानव शरीर का बोविस शून्य माना गया है और मानव में औसत ऊर्जा क्षेत्र 6,500 बोविस पाया गया है। स्वस्तिक में इस उर्जा का स्तर 1,00,0000 बोविस है। यदि इसे उल्टा बना दिया जाएतो यह प्रतिकूल ऊर्जा को इसी अनुपात में बढ़ाता है। इसी स्वस्तिक को थोड़ा टेड़ा बना देने पर इसकी ऊर्जा मात्र 1,000 बोविस रह जाती है। इसके साथ ही विभिन्न धार्मिक स्थलों यथा मन्दिर,गुरूद्वारा इत्यादि का ऊर्जा स्तर काफी उंचा मापा गया है जिसके चलते वहां जाने वालों को शांति का अनुभव और अपनी समस्याओं,कष्टों से मुक्ति हेतु मन में नवीनआशा का संचारहोता है। यही नहीं हमारे घरों,मन्दिरों,पूजा पाठ इत्यादि में प्रयोग किए जाने वाले अन्य मांगलिक चिन्हों यथा ॐ इत्यादि में भी इसी तरहकी ऊर्जा समाई है। जिसका लाभ हमें जाने अनजाने में मिलता ही रहता हैं।

(c)मानक दर्शन:-

इसके अनुसार स्वस्तिक दक्षिणोन्मुख दाहिने हाथ की दिशा (घडी की सूई चलने की दिशा) का संकेत तथा वामोन्मुख बाईं दिशा (उसके विपरीत) के प्रतीक हैं। दोनों दिशाओंके संकेत स्वरूप दो प्रकार के स्वस्तिक स्त्री एवं पुरूष के प्रतीक के रूप मे भी मान्य हैं । किन्तु जहाँ दाईं ओर मुडी भुजा वाला स्वस्तिक शुभ एवं सौभाग्यवर्द्धक हैं ,वहीं उल्टा (वामावर्त) स्वस्तिक को अमांगलिक, हानिकारक माना गया है।

(d)प्राचीन काल में राजा महाराज द्वारा किलों का निर्माण स्वस्तिक के आकार में किया जाता रहा हैताकि किले की सुरक्षा अभेद्य बनी रहे। प्राचीन पारम्परिक तरीके से निर्मित किलों में शत्रु द्वारा एक द्वार पर ही सफलता अर्जित करने के पश्चात सेना द्वारा किले में प्रवेश कर उसके अधिकाँश भाग अथवा सम्पूर्ण किले पर अधिकार करने के बाद नर संहार होता रहाहै । परन्तु स्वस्तिक नुमा द्वारों के निर्माण के कारण शत्रु सेना को एक द्वार पर यदि सफलता मिल भी जाती थी तो बाकी के तीनों द्वार सुरक्षित रहते थे। ऎसी मजबूत एवं दूरगामी व्यवस्थाओं के कारण शत्रु के लिए किले के सभी भागों को एक साथ जीतना संभव नहीं होताथा । यहाँ स्वस्तिक किला/दुर्ग निर्माण के परिपेक्ष्य में “सु वास्तु” था । स्वस्तिक का महत्व सभी धर्मों में बताया गया है। इसे विभिन्न देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। चार हजार साल पहले सिंधु घाटी की सभ्यताओंमें भी स्वस्तिक के निशान मिलते हैं। बौद्ध धर्म में स्वस्तिक का आकार गौतमबुद्ध के हृदय स्थल पर दिखाया गया है।मध्य एशिया के देशों में स्वस्तिक चिन्ह मांगलिक एवं सौभाग्य सूचक माना जाता रहा है। नेपाल में हेरंब , मिस्रमें एक्टोन तथा बर्मा में महा पियेन्ने के नाम से पूजित हैं। आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड के मावरी आदिवासियों द्वारा आदिकाल से स्वस्तिक को मंगल प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा हैं।

(e)निष्कर्ष:-

हिन्दू धर्म जितना विशाल और गहन है,उसकी मान्यताएं और प्रक्रियाएं भी उतनी ही विशद और विस्तृ्त हैं । आज हम देखते हैं कि जागरूकता की अधिकता के चलते बहुत से व्यक्ति विशेष रूप से पश्चिमी सभ्यता से अति प्रभावित लोग, अपने धर्म से संबंधित मान्यताओं,रीति- रिवाजों एवं कर्मकांडों पर शंका व्यक्त करने लगे हैं ।बहुत ही बातों को बिना जाने-समझे सिर्फ उन्हे ढकोसला एवं अनावश्यक समझने लगे हैं । जब कि यदि वे इन सब चीजों,प्रक्रियाओं के बारें में गहराई से मनन करें तो पाएंगें कि हिन्दू धर्म विश्व का एकमात्र ऎसा धर्म है जो कि अपने प्रत्येक कर्म, संस्कार और परम्परा में पूर्णत: वैज्ञानिकता समेटे हुए है। साभार
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2>जानिए किन 15 बातों की निशानी है तिलक -संस्कृति।

तिलक लगाना सनातन संस्कृति का एक प्रचीन हिस्सा रहा है। हमने अपने पिछले लेख में तिलक का महत्व बताया था । आब हम आपको औऱ भी सहज भाषा में उन बातों के बारे में बतायेंगे जिनसे तिलक लगाने से शुभ होता है।

1.खुशी के अवसर की तिलक देने की परम्परा चली आती है।

2.तिलक भाग्य की निशानी है। सौभाग्यशाली कि निशानी है। तिलक लगाने से हम परमात्मा के करीब होते हैं इसलिए हमारे भाग्य का उदय होना निश्चित होता है।

3.नकारात्मक ऊर्जा को भगाता है। जब ललाट पर तिलक शुशोभित होता है तो हमारे मन में सकारात्मक्ता का प्रवाह होता है। हमे हर समय खुशी का अनुभव होता है।

4.संकट को दूर करने कि निशानी है। संकट के समय पूजारी लोग तिलक लगाते है।

5.सफलता प्राप्त करने के लिए तिलक देने की परम्परा है। चाहे किसी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करे। घर से रवाना होने से पहले तिलक अवश्य देते हैं।

6.तिलक पवित्रता की निशानी है। किसी की बुरी नजर नहीं लगे। इसलिए ही शादी के बाद बहनें तिलक अर्थात बिन्दी लगाती है।

7.बुरी नजर नहीं लगे इस के लिए मातायें छोटे बच्चों को मस्तक पर काला तिलक लगा देती है। ताकि कोई टोक नहीं हो जाये। गाँव में आज भी यह परम्परा प्रचलित है। यहां तक कि मुझ पर भी बालपन पर नजर उतराने के लिए काला टीका लगाया गया था।

8.युद्ध के मैदान में जाते समय बहन अपने भाई को तथा माँ अपने बच्चे को विजयी होने का तिलक देकर घर से रवाना करती है।

9.तीसरे नैत्र की निशानी भी तिलक देते है। भृकुटी के मध्य में आज्ञा चक्र होता है। योगी लोग अपना ध्यान यहाँ पर केद्रित करते है।

10.तिलक देना हिन्दू संस्कृति अर्थात देवी देवता धर्म की मुख्य तथा सर्वोच्च परम्परा है। तिलक लगाना ही हिन्दू धर्म की मुख्य पहचान है। सनातन धर्म की यह बहुत प्राचीन परम्परा है।

11.सुहाग की निशानी की तिलक देना है सुहागिन मातायें बहनें अपने सुहागिन होने की निशानी भी तिलक देती हैं।

12.आत्म स्मृति की निशानी भी चन्दन का तिलक मन्दिर में देते है। हम आत्मा भाई -भाई है इस की निशानी भी तिलक देते है।

13.अपनी चेतना की जागृति के लिए, मन की एकाग्रता को बढ़ाने के लिए भक्ति मार्ग में तिलक लगाते है।

14.तिलक धारण करने में अनामिका अंगुली मानसिक शांति प्रदान करती है। मध्यमा अंगुली मनुष्य की आयु वृद्धि करती है। अंगूठा प्रभाव, ख्याति और आरोग्य प्रदान करता है, इसलिए विजय तिलक अंगूठे से ही करने की परम्परा है।

15.मस्तिष्क में सेराटोनिन व बीटाएंडोरफिन नामक रसायनों का संतुलन होता है। इनसे मेघाशक्ति बढ़ती है तथा मानसिक थकावट के विकार नहीं होते हैं। मस्तक पर चंदन का तिलक सुगंध के साथ-साथ शीतलता देता है। ईश्वर को चंदन अर्पण करने का भाव यह है कि हमारा जीवन आपकी कृपा रूपी सुगंध से भर जाए एवं हम व्यवहार से शीतल रहें अर्थात् ठंडे दिमाग से कार्य करें। अधिकतर उत्तेजना में कार्य बिगड़ता है और चंदन लगाने से उत्तेजना नियंत्रित होती है। चंदन का तिलक लगाने से दिमाग में शांति, तरावट एवं शीतलता बनी रहती है।

हम अपने पुर्व लेख में तिलक का वैज्ञानिक महत्व बता चुके हैं। इस लेख में हम आपके लिए कुछ महत्वपुर्ण तिलक की जानकारियां दे रहे थे। यह लेख सनातान संस्कृति के एक ब्लाग से लिया गया है। इसे साझा करके आप तक पहुँचाना ही हमारा धर्म है।

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3>जानिए सूर्य पर जल चढ़ाने का वैज्ञानिक कारण।

सनातन संस्कृति अत्यंत प्रचीन संस्कृति है, माना जाता है कि हमारे पुर्व के श्रषि-मुनि खुद शोध किया करते थे। उन्हीं शोधो को फिर लिखकर मानव जीवन को बताते थे। वेद, पुराण, और सभी ग्रंथ इसी का एक सार हैं। मनुष्य अपने कर्तव्यों को कभी ना छोड़े इसलिए इन ग्रंथो का निर्माण किया गया था। आज हमारे यही ग्रंथ हमें सदबुद्धि प्रदान करते हैं, और हमें अपना निहित कर्तव्य बताते हैं। वेदों में एक और बात कही गई है कि हमें हर रोज प्रातकाल: सूर्य को जल चढ़ाना चाहिए। हम सभी यह करते हैं पर बहुत से कम लोग ही इसका वैज्ञानिक कारण जानते होंगे। इसलिए आज फिर हम आपको इसका वैज्ञानिक कारण बताने जा रहे हैं।

सूर्य हमारे लिए वैज्ञानिक दृष्टि में एक तारा है जो हमेशा अग्नि से दधकता रहता है। सूर्य के आने वाले प्रकाश से ही हमारा दिन शुरू होता है, सूर्य हमारे लिए बहुत महत्व रखता है , हर प्राणी औऱ प्रजाति को सूर्य की किसी ना किसी रूप में आवश्यकता होती है।

पेंड-पौधे सूर्य से अपना भोजन पाते हैं, इंसान सूर्य की रोशनी में प्रफुल्लित होकर नये दिन का अारंभ करता है। सभी प्रकार के काम सूर्य से ही होते हैं। सूर्य का प्रकाश हमारे लिए इतना महत्व रखता है कि बिना इसके हमारी पृथ्वी की कल्पना भी नहीं करी जा सकती है। प्राचीन मुनियों ने इसी दान को ध्यान में रखते हुए सूर्य को जल चढ़ाने की विधि आरंभ की थी।
सूर्य पर जल चढाने का कारण(वैज्ञानिक तर्क)

अगर सूर्य को जल देने की बात करें तो इसके पीछे छिपा है रंगो का विज्ञान।मानव शरीर में रंगो का संतुलन बिगड़ने से भी कई रोगों के शिकार होने का खतरा होता है।

सुबह के समय सूर्यदेव को जल चढाते समय शरीर पर पड़ने वाले प्रकाश से ये रंग संतुलित हो जाते हैं। (प्रिज़्म के सिद्दांत से) जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ जाती है।

इसके आलावा सूर्य नमस्कार की योगमुद्रा होने से एकाग्रता बढ़ती है। मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) की कई बीमारी सही होती हैं।आँखों की कई समस्या दूर होती हैं।

सूर्य की रौशनी से मिलने वाला विटामिन D शरीर में पूरा होता है। आपका मुखमंडल ओजस्वी होता है त्वचा के रोग कम होते हैं। प्राकृतिक संतुलन भी बनता है।(यही जल वाष्पीकृत हो कर, वर्षाजल का अमृत बनकर वापस मिलता है)

इन्ही कारणों से हम सूर्य देव का जल चढ़ाकर अभिनंदन करते हैं , और वह हमें आशीर्वाद देते हैं।
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4>जानिए हिन्दू धर्म के सोलह संस्कार – संस्कृति

संस्कार मनुष्यों के लिए परम आवश्यक होते हैं। संस्कार ही एक साधारण मनुष्य तॉशास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन के लिए कुछ आवश्यक नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना हमारे लिए आवश्यक माना गया है। मनुष्य जीवन में हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से सोलह संस्कारों का पालन करना चाहिए। यह संस्कार व्यक्ति के जन्म से मृत्यु तक अलग-अलग समय पर किए जाते हैं।

प्राचीन काल से इन सोलह संस्कारों के निर्वहन की परंपरा चली आ रही है। हर संस्कार का अपना अलग महत्व है। जो व्यक्ति इन सोलह संस्कारों का निर्वहन नहीं करता है उसका जीवन अधूरा ही माना जाता है।

ये सोलह संस्कार क्या-क्या हैं –

1.गर्भाधान संस्कार ( Garbhaadhan Sanskar) – यह ऐसा संस्कार है जिससे हमें योग्य, गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है।

शास्त्रों में मनचाही संतान प्राप्त के लिए गर्भधारण संस्कार किया जाता है। इसी संस्कार से वंश वृद्धि होती है।

2.पुंसवन संस्कार (Punsavana Sanskar) – गर्भस्थ शिशु के बौद्धिक और मानसिक विकास के लिए यह संस्कार किया जाता है।

पुंसवन संस्कार के प्रमुख लाभ ये है कि इससे स्वस्थ, सुंदर गुणवान संतान की प्राप्ति होती है।

3.सीमन्तोन्नयन संस्कार ( Simanta Sanskar) – यह संस्कार गर्भ के चौथे, छठवें और आठवें महीने में किया जाता है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म का ज्ञान आए, इसके लिए मां उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है।

4.जातकर्म संस्कार (Jaat-Karm Sansakar) – बालक का जन्म होते ही इस संस्कार को करने से शिशु के कई प्रकार के दोष दूर होते हैं। इसके अंतर्गत शिशु को शहद और घी चटाया जाता है साथ ही वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है ताकि बच्चा स्वस्थ और दीर्घायु हो।

5.नामकरण संस्कार (Naamkaran Sanskar)– शिशु के जन्म के बाद 11वें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है।
ब्राह्मण द्वारा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बच्चे का नाम तय किया जाता है।

6.निष्क्रमण संस्कार (Nishkraman Sanskar) – निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना। जन्म के चौथे महीने में यह संस्कार किया जाता है। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिन्हें पंचभूत कहा जाता है, से बना है। इसलिए पिता इन देवताओं से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। साथ ही कामना करते हैं कि शिशु दीर्घायु रहे और स्वस्थ रहे।

7.अन्नप्राशन संस्कार ( Annaprashana) – यह संस्कार बच्चे के दांत निकलने के समय अर्थात 6-7 महीने की उम्र में किया जाता है।इस संस्कार के बाद बच्चे को अन्न खिलाने की शुरुआत हो जाती है।

8.मुंडन संस्कार ( Mundan Sanskar)– जब शिशु की आयु एक वर्ष हो जाती है तब या तीन वर्ष की आयु में या पांचवे या सातवे वर्ष की आयु में बच्चे के बाल उतारे जाते हैं जिसे मुंडन संस्कार कहा जाता है। इस संस्कार से बच्चे का सिर मजबूत होता है तथा बुद्धि तेज होती है। साथ ही शिशु के बालों में चिपके कीटाणु नष्ट होते हैं जिससे शिशु को स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।

9.विद्या आरंभ संस्कार ( Vidhya Arambha Sanskar )– इस संस्कार के माध्यम से शिशु को उचित शिक्षा दी जाती है। शिशु को शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से परिचित कराया जाता है।

10.कर्णवेध संस्कार ( Karnavedh Sanskar) – इस संस्कार में कान छेदे जाते है । इसके दो कारण हैं, एक- आभूषण पहनने के लिए।
दूसरा- कान छेदने से एक्यूपंक्चर होता है। इससे मस्तिष्क तक जाने वाली नसों में रक्त का प्रवाह ठीक होता है। इससे श्रवण शक्ति बढ़ती है और कई रोगों की रोकथाम हो जाती है।

11.उपनयन या यज्ञोपवित संस्कार (Yagyopaveet Sanskar) – उप यानी पास और नयन यानी ले जाना। गुरु के पास ले जाने का अर्थ है उपनयन संस्कार। आज भी यह परंपरा है। जनेऊ यानि यज्ञोपवित में तीन सूत्र होते हैं। ये तीन देवता- ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं। इस संस्कार से शिशु को बल, ऊर्जा और तेज प्राप्त होता है।

12.वेदारंभ संस्कार (Vedaramba Sanskar) – यह संस्कार व्यक्ति के पाठन और पढ़न के लिए ही है। इसके अंतर्गत व्यक्ति को वेदों का ज्ञान दिया जाता है।

13.केशांत संस्कार (Keshant Sanskar) – केशांत संस्कार अर्थ है केश यानी बालों का अंत करना, उन्हें समाप्त करना। विद्या अध्ययन से पूर्व भी केशांत किया जाता है। मान्यता है गर्भ से बाहर आने के बाद बालक के सिर पर माता-पिता के दिए बाल ही रहते हैं।
इन्हें काटने से शुद्धि होती है। शिक्षा प्राप्ति के पहले शुद्धि जरूरी है, ताकि मस्तिष्क ठीक दिशा में काम करें। पुराने में गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद केशांत संस्कार किया जाता था।

14.समावर्तन संस्कार (Samavartan Sanskar)– समावर्तन संस्कार अर्थ है फिर से लौटना। आश्रम या गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद व्यक्ति को फिर से समाज में लाने के लिए यह संस्कार किया जाता था। इसका आशय है ब्रह्मचारी व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षों के लिए तैयार किया जाना।

15.विवाह संस्कार ( Vivah Sanskar) – यह धर्म का साधन है। विवाह संस्कार सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। इसके अंतर्गत वर और वधू दोनों साथ रहकर धर्म के पालन का संकल्प लेते हुए विवाह करते हैं। विवाह के द्वारा सृष्टि के विकास में योगदान दिया जाता है। इसी संस्कार से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है।

16.अंत्येष्टी संस्कार (Antyesti Sanskar)– अंत्येष्टि संस्कार इसका अर्थ है अंतिम संस्कार। शास्त्रों के अनुसार इंसान की मृत्यु यानि देह त्याग के बाद मृत शरीर अग्नि को समर्पित किया जाता है। आज भी शवयात्रा के आगे घर से अग्नि जलाकर ले जाई जाती है।
इसी से चिता जलाई जाती है। आशय है विवाह के बाद व्यक्ति ने जो अग्नि घर में जलाई थी उसी से उसके अंतिम यज्ञ कीअग्नि जलाई जाती है।
कहने का एक तात्पर्य यह भी है कि सनातन धर्म एक मात्र ऐसा धर्म है जिसमें व्यक्ति को जन्म से लेकर मरण तक संस्कारो पर चलना ही सिखाया जाता है। सनातन धर्म अत्यंत प्रचीन होते हुए भी आज भी वैज्ञानितका से भरपूर है।
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5>ধর্মীয় রীতি কুসংস্কার না বিজ্ঞান?

মন্দিরে ঘণ্টা বাজানো থেকে শুরু করে নদীতে কয়েন ফেলা, এমনকি নমস্কার করা, এ সবই আমরা হিন্দুধর্মের রীতি মেনে করে থাকি। অনেকে হিন্দু ধর্মের রীতি..

ধর্মীয় রীতি কুসংস্কার না বিজ্ঞান?

মন্দিরে ঘণ্টা বাজানো থেকে শুরু করে নদীতে কয়েন ফেলা, এমনকি নমস্কার করা, এ সবই আমরা হিন্দুধর্মের রীতি মেনে করে থাকি। অনেকে হিন্দু ধর্মের রীতিনীতিকে কুসংস্কার বলে মনে করেন। কিন্তু আপনারা কী জানেন হিন্দু ধর্মের এই সমস্ত প্রথা বা রীতিনীতির বৈজ্ঞানিক ভিত্তি রয়েছে? আর তাই যুগ-যুগ ধরে এই ঐতিহ্য পালিত হচ্ছে। কী এই ঐতিহ্য বা প্রথাগুলি, যার পিছনে বৈজ্ঞানিক কারণ রয়েছে? আজ প্রথম পর্ব।

নদীতে কয়েন ফেলা: আমাদের ধারণা, নদীতে কয়েন ফেললে, তা আমাদের জন্য গুড লাক নিয়ে আসবে। কিন্তু এর একটি বিজ্ঞানভিত্তিক কারণও রয়েছে। প্রাচীন কালে তামার মুদ্রা প্রচলিত ছিল, আজকের যুগের মতো স্টেইনলেস স্টিলের মুদ্রা নয়। মানবশরীরের জন্য তামা খুব উপকারি ধাতু। জলের মাধ্যমে আমাদের শরীরে যাতে পর্যাপ্ত পরিমাণে তামা যায়, তা নিশ্চিত করার জন্যই আমাদের পূর্বপুরুষরা এই প্রথা চালু করেন। কারণ, নদীই পানীয় জলের একমাত্র উত্‍‌স।

হাতজোড় করে নমস্কার করা: কাউকে অভ্যর্থনা জানানোর জন্য আমরা সাধারণত হাতজোড় করে নমস্কার করে থাকি। এই প্রথার প্রচলিত ব্যাখ্যা হল, কাউকে নমস্কার করার অর্থ তাঁকে সম্মান প্রদর্শন। কিন্তু বিজ্ঞান বলছে, হাতজোড় করার ফলে আমাদের দুই হাতের পাঁচটি আঙুলের ডগা পরস্পরের সঙ্গে মিলে যায়। যার ফলে আমাদের চোখ, কান এবং মস্তিষ্কের প্রেশার পয়েন্টে চাপ পড়ে। এই চাপই ওই ব্যক্তিকে দীর্ঘ দিনের জন্য মনে রাখতে আমাদের সাহায্য করে।

পায়ের আঙুলে আংটি পড়া: বিবাহিত মহিলারা হিন্দু প্রথা মেনে পায়ের আঙুলে আংটি পড়লেও, এর পিছনে বিজ্ঞান রয়েছে। সাধারণত পায়ের দ্বিতীয় আঙুলে এই আংটি পড়া হয়। ওই দ্বিতীয় আঙুলের একটি স্নায়ু জরায়ু হয়ে হৃদযন্ত্রের সঙ্গে যুক্ত। এই আঙুলে আংটি পড়লে, তা জরায়ুকে সুস্থ, সবল রাখে। এর ফলে রক্তপ্রবাহ নিয়ন্ত্রিত হয় এবং নিয়মিত মাসিক হয়। রুপো ভালো কনডাক্টর হওয়ায় তা পৃথিবী থেকে পোলার এনার্জি আত্মসাত্‍‌ করে শরীরে ছড়িয়ে দেয়।

তিলক করা: কপালে, দু'টি ভুরুর মাঝখানে তিলক করি। দুই ভুরুর মাঝখানের অংশে মানবশরীরের গুরুত্বপূর্ণ স্নায়ু বর্তমান। মনে করা হয়, তিলক শক্তি অপচয় রোধ করে। লাল রঙের কুমকুম মানবশরীরে শক্তি বজায় রাখে এবং মনোযোগের বিভিন্ন স্তর নিয়ন্ত্রণ করে। কপালে কুমকুম লাগানোর সময়ে ভুরুর মাধখানের অংশ এবং আদ্য-চক্রে চাপ পড়ে। এর ফলে মুখের পেশিতে রক্ত চলাচল সুচারু ভাবে সম্পন্ন হয়।

মন্দিরে ঘণ্টা বাজাই কেন? মন্দিরের গর্ভগৃহে ঢোকার আগে আমরা ঘণ্টা বাজাই। আগামা শাস্ত্রে বলা গয়েছে, ঘণ্টাধ্বনি সেখান থেকে অশুভ শক্তিকে দূরে রাখে এবং সেই ধ্বনি ঈশ্বরের প্রিয়। কিন্তু বিজ্ঞান বলছে, ঘণ্টাধ্বনি আমাদের মস্তিষ্ক পরিষ্কার করে। ঘণ্টা বাজানোর সঙ্গে সঙ্গে আমাদের মস্তিষ্কের ডান এবং বাম অংশ এক হয়ে যায়। ইকো মোডে ৭ সেকেন্ড পর্যন্ত ঘণ্টাধ্বনি বজায় থাকে। এই সাত সেকেন্ডে আমাদের শরীরের সাতটি আরোগ্য কেন্দ্র সক্রিয় হয়। যার ফলে আমাদের মস্তিষ্কে বর্তমান সমস্ত নেগেটিভ চিন্তাধারা মুছে যায় এবং ঈশ্বর আরাধনায় আমাদের সম্পূর্ণভাবে মনোযোগী করে তোলে।

বছরে দু'বার নবরাত্রি কেন হয়? এই ২ মাসে ঋতু পরিবর্তন হয়। আবার এই দুই মাসের খাদ্যাভ্যাসও একে অপরের থেকে আলাদা। পরিবর্তিত ঋতুর সঙ্গে মানিয়ে নিতে সময়ের প্রয়োজন। নবরাত্রি মানবশরীরকে সেই সময় দেয়, যাতে মানুষ পরিবর্তিত ঋতুর সঙ্গে নিজেকে মানিয়ে নিতে পারে। এই ৯ দিনের উপবাসে মানুষ অত্যধিক পরিমাণে নুন বা চিনি খায় না। যা মানুষের শরীর পরিষ্কার করে দেয়। এর ফলে মানুষের পজিটিভ এনার্জি, আত্মবিশ্বাস এবং আত্মনির্ধারণ ক্ষমতা বৃদ্ধি পায়। অবশেষে ব্যক্তি পরিবর্তিত ঋতুর চ্যালেঞ্জের মুখোমুখি হওয়ার জন্য প্রস্তুত হয়।

তুলসি পুজো কেন করি? হিন্দু ধর্মে তুলসিকে মা মনে করা হয়। বৈদিক যুগের সাধুরা তুলসির উপযোগিতা সম্পর্কে সচেতন ছিলেন, তাই তাঁরা সকলের মনে ধারণা গড়ে তোলেন যে তুলসি ঈশ্বরসম এবং সমগ্র সমাজের কাছে তুলসি সংরক্ষণের বার্তা পৌঁছে দেন। তুলসি মানবজাতির জন্য সঞ্জিবনী। তুলসির একাধিক ঔষধি গুণ রয়েছে। এটি অসাধারণ অ্যান্টিবায়োটিক। চা বা অন্য কোনও ভাবে তুলসি খেলে তা মানবশরীরের অনাক্রম্যতা বৃদ্ধি করে এবং মানুষকে রোগমুক্ত করে। এমনকি আয়ুও বাড়িয়ে তোলে। বাড়িতে তুলসি গাছ রাখলে, তা কীটপতঙ্গ বা মশা ঘরে ঢুকতে দেয় না। কথিত আছে, সাপ তুলসি গাছের ধারে-কাছে যেতে সাহস করে না। হয়তো তাই, প্রাচীন কালে বাড়ির সামনে তুলসি গাছ লাগানো থাকত।

অশ্বত্থ গাছের পুজো কেন করি? সাধারণ মানুষের কাছে অশ্বত্থ গাছের কোনও উপকারিতা নেই। ছায়া প্রদান করা ছাড়া এই গাছটি না সুস্বাদু ফল দেয় আর না এর কাঠ এত শক্তপোক্ত, যে তা অন্য কাজে ব্যবহার করা যাবে। তা সত্ত্বেও অশ্বত্থ গাছের পুজো কেন করি আমরা? আমাদের পূর্বপুরুষরা জানতেন যে, অশ্বত্থ নির্দিষ্ট কয়েকটি গাছের মধ্যে অন্যতম (বা সম্ভবত একমাত্র গাছ) যা রাত্রিবেলাতেও অক্সিজেন উত্‍‌পন্ন করে। তাই এই গাছকে বাঁচানোর জন্য এর পুজো চালু করা হয়।

ঝাল দিয়ে খাওয়া শুরু, মিষ্টি দিয়ে শেষ: খেতে বসে মশলাদার বা ঝাল খাওয়ার আগে খেতে হয় এবং শেষে মিষ্টি। ছোটবেলা থেকেই আমাদের এই খাদ্যাভ্যাস তৈরি করা হয়েছে। এ ধরনের খাদ্যাভ্যাস তৈরির কারণ হল, মশলাদার বা ঝাল খাদ্য হজম পদ্ধতিকে সহজ করে দেয়। কিন্তু মিষ্টি বা কার্বোহাইড্রেট হজম পদ্ধতিকে ধীরগতিতে চালিত করে। তাই সব সময় খাবারের শেষে মিষ্টি খাওয়া উচিত।

মাথায় টিকি রাখা: শুশ্রুত ঋষি মাথায় মুখ্য স্পর্শকাতর অংশটিকে অধিপতি মর্ম হিসেবে ব্যাখ্যা করেছেন। যা সমস্ত স্নায়ুর যোগসূত্র। শিখা বা টিকি ওই অংশটিকে নিরাপত্তা প্রদান করে। শরীরের নিম্নাংশ থেকে মস্তিষ্কের নীচে, ব্রহ্মরন্ধ্রে সুশুম্না স্নায়ু পৌঁছয়। যোগ অনুসারে ব্রহ্মরন্ধ্র ১০০০ পাপড়ি বিশিষ্ট পদ্ম এবং এটি শীর্ষ সপ্তমচক্র। এটি জ্ঞানের কেন্দ্র। গিঁঠ বাধা শিখা বা টিকি কেন্দ্রটিকে উত্‍‌সাহিত করে এবং ওজস নামে পরিচিত এর সূক্ষ্ম শক্তিকে সংরক্ষিত করে।

মেহেন্দি কেন লাগানো হয়: মেহেন্দি খুবই শক্তিশালী ঔষধি। বিয়ের সময় চাপ এবং চিন্তা বেড়ে যায়, যার ফলে মাথাব্যথা, এমনকি জ্বর পর্যন্ত হওয়ার সম্ভাবনা থাকে। মেহেন্দি শরীর ঠান্ডা করে। ফলে চাপ কমে এবং স্নায়ুকে চিন্তাগ্রস্ত হতে দেয় না। তাই হাতে এবং পায়ে মেহেন্দি লাগানোর প্রথা প্রচলিত।

দীপাবলির আগে ঘর পরিষ্কার: সাধারণত অক্টোবর বা নভেম্বরে দীপাবলি উত্‍‌সব পালিত হয়। দীপাবলির আগে বর্ষাকাল শেষ হয় এবং শীতকাল শুরু হয়। ভারী বৃষ্টির ফলে অনেকের ঘর-বাড়িই সারাই এবং পরিষ্কার করার প্রয়োজন হয়। তাই দিওয়ালির আগে ঘরদোর পরিষ্কার এবং সৌন্দর্যায়নের কাজ করা হয়ে থাকে। মাটিতে বসে খাদ্যগ্রহণ: মাটিতে বসে খাদ্যগ্রহণের সময়ে আমরা সাধারণত সুখাসনে বসি। সুখাসনে বসে খাবার খেলে তা আমাদের হজমশক্তি বাড়িয়ে দেয়। সংবহনতন্ত্র হজমের ওপর দৃষ্টি দেয়। যা চেয়ারে বসে বা দাঁড়িয়ে খেলে হয় না।
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6>हिंदू धर्म में किसी के मरने और जन्म लेने के बाद क्यों मनाया जाता है सूतक

धर्म डेस्क: हर इंसान के जीवन में खुशी और गम आता जाता रहता है। इस दुनिया में किसी कोने में कोई खुश होता है तो वही दूसरें कोने में गमगीन। अगर हमें कोई खुशी मिलती है तो हमें लगता है कि यह पल कभी न जाए और गम हो तो सोचते है कि यह पल जल्दी से निकल जाए। गम में तो एक-एक दिन भी काटना बहुत कठिन हो जाता है। हमारे जीवन में ऐसे कई पड़ाव आते है। कोई छोटा पड़ाव होता है तो कोई गम का तो कोई खुशी का।

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जिंदगी के इन्ही पड़ावों में दो पड़ाव आते है वो है जन्म और मृत्यु। हमारा जीवन जन्म के साथ शुरु होता और मृत्यु से खत्म हो जाता है। बस फर्क इतना होता है कि जन्म में खुशी वहीं मृत्यु में गम होता है।

हिंदू धर्म में जन्म और मृत्यु बहुत अधिक महत्व रखते है। हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जहां पर हजारों रीति-रिवाज और परंपराएं है। जिसके कारण इस धर्म की अपनी एक पहचान है। इस परंपरा में एक है सूतक की परंपरा यानी कि किसी बच्चें के जन्म लेने और किसी व्यक्ति के मरने के बाद के वो दिन जब कोई भी शुभ काम नहीं होता है।

हमारे समाज में इससे जुड़े कई परंपराए है जैसे कि कोई शुभ काम न करना यानी कि अगर आपको कोई व्यापार करना है तो उसे इस समय में नहीं कर सकते है। इसे आप अंधविश्वास भी कह सकते है। लेकिन आप जानते है कि इसके पीछें वैज्ञानिक कारण भी है। जानिए आखिर क्यों यह सूतक मनाया जाता है।

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जन्म के बाद

हमारे समाज में जब किसी के घर में किसी का जन्म होता है तो उसके घर में 10 दिन तक सूतक और जन्म देने वाली मां के लिए एक महीने के लिए सूतक होता है। इस समय में वह महिला उसी कमरे में रहेगी जहां पर वह विश्राम करती है और वह घर के कोई काम नहीं कर सकती है साथ ही किचन में भी नहीं जा सकती है। साथ ही इस समय में घर का कोई भी सदस्य किसी भी धार्मिक कामों में भाग नहीं ले सकता है।

वह किसी मंदिर में भी नहीं जा सकता है। इसे आप अंधविश्वास का नाम भी दे सकते है, लेकिन आप जानते है कि इस पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी है। इसके अनुसार पहले के जमाने में जो परिवार होते थे। वह सयुंक्त रुप में रहते थे। जिसके कारण एक महिला के लिए अधिक काम हो जाता था। और डिलीवरी के बाद वह महिला बहुत ही कमजोर हो जाती थी। जिसके कारण उसे आराम करने की आवश्यकता होती थी। जिसे सूतक का नाम दिया गया। जिसके की वह अपने कमजोर शरीर को फिर से ठीक कर सके।

इसके साथ ही दूसरा कारण था कि बच्चें को संक्रमण से बचाना। क्योंकि जन्म से लेकर एक महीने तक एक बच्चें में प्रतिरोधक क्षमता शून्य के बराबर होती है। जिसके कराण उनको कोई भी बीमारी हो सकती है। जिसके कारण उसे बाहरी लोगों से दूर रखा जाता था। जिससे कि उसे किसी भी प्रकार का संक्रमण न हो।

आज इस सूतक को एक अंधविश्वास मान लिया गया है, लेकिन इसके पीछे जो कारण है वो है मां और बच्चें दोनों को आराम और दोनों के सेहत में अच्छा प्रभाव पड़े।

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मृत्यु के बाद

हम अपने समाज में देखते है कि आज के समय में भी जिस तरह जन्म के समय सूतक मनाया जाता है। उसी तरह किसी व्यक्ति के मरने में भी सूतक मनाया जाता है। इसमें भी उस परिवार का कोई भी सदस्य किसी भी धार्मिक कामों के साथ-साथ किसी मंदिर में जाना वर्जित हो जाता है। इस बारें में हिंदू धर्म के एक ग्रंथ गरुड़ पुराण में कहा गया है कि जब भी परिवार के किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो परिवार पर सूतक लग जाता है। परिवार के सदस्यों को पुजारी को बुलाकर गरुण पुराण का पाठ करवाकर पातक के नियमों को समझना चाहिए।

किसी व्यक्ति के मरने के 13वें दिन क्रिया कराई जाती है। जिसके बाद अपने क्षमतानुसार ब्राह्मणों को बुलाकर उनको भोजन कराने के साथ-साथ उन्हे दक्षिणा दी जाती है। इसके बाद घर को अच्छी तरह से शुद्ध किया जाता है। और उस मृत व्यक्ति से जुड़ी चीजें जैसे कि कपड़े और उसका समान किसी जरुरतमंद को दे दिया जाता है।

आपने देखा होगा कि किसी व्यक्ति का अंतिन संस्कार करने के बाद वही तट पर सभी लोग स्नान भी करते है। माना जाता है कि इससे मृत व्यक्ति की आत्मा आपके साथ नहीं जाएगी। उसका आपसे लगाव हट जाएगा, लेकिन इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है।

इसके अनुसार माना जाता है कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो वह किस तरह मरा यह सबसे बड़ी बात होती है। जिसके कारण उससे आपको संक्रमण हो सकता है। इस संक्रमण से बचने के लिए हम स्नान करते है। जिससे कि हामरे साथ वहां पर मौजूद कोई भी किटाणु आप के साथ आपके घर न जाएं। जिससे कि आपके बीच कोई संक्रमण फैले।

13वें दिन आपने देखा होगा कि घर में पूजा-पाठ और हवन का आयोजन किया जाता है। इसे पीछे मान्यता है कि इससे मृत व्यक्ति की आत्मा को शांति मिलती है। वही इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। इसके अनुसार घर में पूजा-पाठ और हवन से हामरे घर का वातावरण ठीक हो जाता है साथ ही शुद्ध हो जाता है। जिससे हमारे घर में मौजूद सभी बैक्टेरिया भी मर जाते है। इसके साथ ही सूतक की समाप्ति हो जाती है।
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7>हिंदू परम्पराओं से जुड़े वैज्ञानिक तर्क:

👉1- कान छिदवाने की परम्परा:

भारत में लगभग सभी धर्मों में कान छिदवाने की परम्परा है।

वैज्ञानिक तर्क-

दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे सोचने की शक्ति बढ़ती है।जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित रहता है।

👉2- माथे पर कुमकुम/तिलक

महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं।

वैज्ञानिक तर्क- आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है। इससे चेहरे की कोशिकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता

👉3-जमीन पर बैठकर भोजन:

भारतीय संस्कृति के अनुसार जमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है।

वैज्ञानिक तर्क- पालथी मारकर बैठना एक प्रकार का योग आसन है। इस पोजीशन में बैठने से मस्तिष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त अगर दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। इस पोजीशन में बैठते ही खुद-ब-खुद दिमाग से एक सिगनल पेट तक जाता है, कि वह भोजन के लिए तैयार हो जाये।

👉4- हाथ जोड़कर नमस्ते करना:

जब किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते अथवा नमस्कार करते हैं।

वैज्ञानिक तर्क- जब सभी उंगलियों के शीर्ष एक दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है। एक्यूप्रेशर के कारण उसका सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है, ताकि सामने वाले व्यक्ति को हम लंबे समय तक याद रख सकें।

दूसरा तर्क यह कि हाथ मिलाने (पश्चिमी सभ्यता) के बजाये अगर आप नमस्ते करते हैं तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुंच सकते। अगर सामने वाले को स्वाइन फ्लू भी है तो भी वह वायरस आप तक नहीं पहुंचेगा।

👉5-: भोजन की शुरुआत तीखे से अंत मीठे से:

जब भी कोई धार्मिक या पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से होता है।

वैज्ञानिक तर्क- तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इससे पाचन तंत्र ठीक तरह से संचालित होता है। अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है। इससे पेट में जलन नहीं होती है।

👉6- पीपल की पूजा:

तमाम लोग सोचते हैं कि पीपल की पूजा करने से भूत-प्रेत दूर भागते हैं।

वैज्ञानिक तर्क- इसकी पूजा इसलिये की जाती है, ताकि इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े और उसे काटें नहीं। पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जो रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता है।

👉7- दक्षिण की तरफ सिर करके सोना:

दक्षिण की तरफ कोई पैर करके सोता है, तो लोग कहते हैं कि बुरे सपने आयेंगे, भूत प्रेत का साया आ जायेगा, आदि। इसलिये उत्तर की ओर पैर करके सोयें।

वैज्ञानिक तर्क-: जब हम उत्तर की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है। शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर संचारित होने लगता है। इससे अलजाइमर, परकिंसन, या दिमाग संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। यही नहीं रक्तचाप भी बढ़ जाता है।

👉8-सूर्य नमस्कार:

हिंदुओं में सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परम्परा है।

वैज्ञानिक तर्क- पानी के बीच से आने वाली सूर्य की किरणें जब आंखों में पहुंचती हैं, तब हमारी आंखों की

रौशनी अच्छी होती है।

👉9-सिर पर चोटी या शिखा:

हिंदू धर्म में ऋषि मुनि चुटिया रखते थे। आज भी लोग रखते हैं।

वैज्ञानिक तर्क- जिस जगह पर चुटिया रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं। इससे दिमाग स्थिर रहता है। इंसान को क्रोध नहीं आता, सोचने की क्षमता बढ़ती है।

👉10-व्रत रखना

कोई भी पूजा-पाठ या त्योहार होता है, तो लोग व्रत रखते हैं।

वैज्ञानिक तर्क- आयुर्वेद के अनुसार व्रत करने से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से शरीर का डीटॉक्सीफिकेशन होता है, यानी उसमें से खराब तत्व बाहर निकलते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत से कैंसर का खतरा कम होता है। हृदय रोगों, मधुमेह, आदि रोग भी जल्द नहीं लगते।

👉11-चरण स्पर्श करना:

हिंदू मान्यता के अनुसार जब भी आप किसी बड़े से मिलें, तो उसके चरण स्पर्श करें। हम बच्चों को भी सिखाते हैं, ताकि वे बड़ों का आदर करें।

वैज्ञानिक तर्क- मस्तिष्क से निकलने वाली ऊर्जा हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है। इसे कॉसमिक एनर्जी का प्रवाह कहते हैं। इसमें दो प्रकार से ऊर्जा का प्रवाह होता है, या तो बड़े के पैरों से होते हुए

छोटे के हाथों तक या फिर छोटे के हाथों से बड़ों के पैरों तक।

👉12- शादीशुदा हिंदू महिलाएं सिंदूर लगाती हैं।

वैज्ञानिक तर्क- सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी होता है।यह मिश्रण शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित करता है। चूंकि इससे यौन उत्तेजनाएं भी बढ़ती हैं, इसीलिये विधवा औरतों के लिये सिंदूर लगाना वर्जित है। इससे स्ट्रेस कम होता है।

👉13- तुलसी के पेड़ की पूजा

तुलसी की पूजा करने से घर में समृद्धि आती है। सुख शांति बनी रहती है।

वैज्ञानिक तर्क- तुलसी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है। लिहाजा अगर घर में पेड़ होगा, तो इसकी पत्तियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे बीमारियां दूर होती हैं।
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3>ভারতীয় পরম্পরা -=" वैज्ञानिक तर्क "-----( 1 )==1 to 20

3>Myc=Post=5>***ভারতীয় পরম্পরা=" वैज्ञानिक तर्क"Part-( 1 )***( 1 to 21 )

1----------------------------- अक्सर शादी और विवाह समारोहों में दिखावा
2----------------------------- एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं 
3-----------------------------कान छिदवाने की परम्परा:
4-----------------------------माथे पर तिलक लगाने का रहस्य – संस्कृति।
5-----------------------------जमीन पर बैठकर भोजन
6----------------------------- हाथ जोड़कर नमस्ते करना
7------------------------------भोजन की शुरुआत तीखे से और
8------------------------------पीपल की पूजा
9------------------------------दक्ष‍िण की तरफ सिर करके सोना
10-----------------------------सूर्य नमस्कार
11-----------------------------सिर पर चोटी
12----------------------------- व्रत रखना
13-A---------------------------चरण स्पर्श करना
13-B---------------------------चरण स्पर्श की परंपरा के अनुसार कुछ लाभ :-
14------------------------------क्यों लगाया जाता है सिंदूर
15------------------------------पूजा-पाठ में दीपक क्यों जलाया जाता है।
16------------------------------ मंदिर का घंटा" .
17------------------------------मुहूर्त
18------------------------------पूजा में कपूर का खास प्रयोग होता है,
19------------------------------क्यों बजाई जाती है मंदिर में प्रवेश करते समय घंटी ?
20------------------------------आखिर परिक्रमा क्यों करते है देवी-देवताओ की?
21>-----------------------------सिर पर शिखा रखने के पीछे बहुत बड़ीवैज्ञानिकता है 



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ভারতীয় পরম্পরা ------( 1 )
30{  भारतीय परम्पराए "==" वैज्ञानिक तर्क " 
    
    1>   अक्सर शादी और विवाह समारोहों में दिखावा

       अक्सर शादी और विवाह समारोहों में दिखावा और एक दूसरे से ज्यादा पैसे की झूठी शान दिखाने के चक्कर में 
       हम लोग अंधे होते जा रहे हैं।अभी हाल में गुजरात में एक विवाह समारोह में स्टेज पर दूल्हा और दुल्हन को
      लाने के लिये कांच का हीरे के आकार का केप्सूल बना कर क्रेन से स्टेज पर लाते समय क्रेन का सन्तुलन 
     बिगड़ा और कांच का        केप्सूल जमीन पर गिरा और उस पर क्रेन का हिस्सा आ गिरा । नतीजा यह हुआ कि
     दूल्हा और दुल्हन की उसी स्थान पर मृत्यु हो गई।
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   2>   एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं         

      एक गोत्र में शादी क्यूँ नहीं.. वैज्ञानिक कारण..!


     एक दिन डिस्कवरी पर जेनेटिक बीमारियों से  सम्बन्धित एक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम था
     उस प्रोग्राम में एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने कहा की  जेनेटिक बीमारी न हो
     इसका एक ही इलाज है और वो है
     "सेपरेशन ऑफ़ जींस"
     मतलब अपने नजदीकी रिश्तेदारो में  विवाह नही करना चाहिए क्योकि
     नजदीकी रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नही हो पाता और
     जींस लिंकेज्ड बीमारियाँ जैसे हिमोफिलिया, कलर ब्लाईंडनेस, और
      एल्बोनिज्म होने की 100% चांस होती है ..
     फिर बहुत ख़ुशी हुई जब उसी कार्यक्रम में ये दिखाया गया की आखिर
    "हिन्दूधर्म" में  हजारों-हजारों सालों पहले  जींस और डीएनए के बारे मे
      कैसे लिखा गया है ?
      हिंदुत्व में गोत्र होते है और   एक गोत्र के लोग आपस में शादी नही कर सकते
     ताकि जींस सेपरेट (विभाजित) रहे.. 
    उस वैज्ञानिक ने कहा की आज पूरे विश्व को मानना पड़ेगा की
    "हिन्दूधर्म ही" विश्व का एकमात्र ऐसा धर्म है जो
    "विज्ञान पर आधारित" है !
     हिंदू परम्पराओं से जुड़े  ये वैज्ञानिक तर्क:

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3-> कान छिदवाने की परम्परा:
    भारत में लगभग सभी धर्मों में कान छिदवाने की परम्परा है।
     वैज्ञानिक तर्क-
      दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे सोचने की शक्त‍ि बढ़ती है। जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली
     अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का
      रक्त संचार नियंत्रित रहता है।
4-> माथे पर कुमकुम/तिलक

     महिलाएं एवं पुरुष माथे पर  कुमकुम या तिलक लगाते हैं
     वैज्ञानिक तर्क-
     आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा

     बनी रहती है।   माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है,
     तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है।
     इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता

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4>माथे पर तिलक लगाने का रहस्य – संस्कृति।

सनातन धर्म पर्णत: विज्ञान पर आधारित है। सनातन धर्म में अपनाई जाने वाली हर पद्धति विज्ञान को सही समझाती है। इसी में हम आपको ललाट पर लिलक लगाने का रहस्य बता रहे हैं। शायद भारत के सिवा और कहीं भी मस्तक पर तिलक लगाने की प्रथा प्रचलित नहीं है। यह रिवाज अत्यंत प्राचीन है। माना जाता है कि मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान का निवास होता है, और तिलक ठीक इसी स्थान पर लगाया जाता है।

मनोविज्ञान की दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है। माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है, जहां सबकी नजर अटकती है। उसके मध्य में तिलक लगाकर, विशेषकर स्त्रियों में, देखने वाले की दृष्टि को बांधे रखने का प्रयत्न किया जाता है।

स्त्रियां लाल कुंकुम का तिलक लगाती हैं। यह भी बिना प्रयोजन नहीं है। लाल रंग ऊर्जा एवं स्फूर्ति का प्रतीक होता है। तिलक स्त्रियों के सौंदर्य में अभिवृद्धि करता है। तिलक लगाना देवी की आराधना से भी जुड़ा है। देवी की पूजा करने के बाद माथे पर तिलक लगाया जाता है। तिलक देवी के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।
तिलक का महत्व

हिन्दु परम्परा में मस्तक पर तिलक लगाना शूभ माना जाता है इसे सात्विकता का प्रतीक माना जाता है विजयश्री प्राप्त करने के उद्देश्य रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुम्कुम का तिलक या कार्य की महत्ता को ध्यान में रखकर, इसी प्रकार शुभकामनाओं के रुप में हमारे तीर्थस्थानों पर, विभिन्न पर्वो-त्यौहारों, विशेष अतिथि आगमन पर आवाजाही के उद्देश्य से भी लगाया जाता है ।

मस्तिष्क के भ्रु-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है । शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता हैं, तो मस्तष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है । इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा । इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शूभकार्यो में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें । इस आसान तरीके से सर्वसाधारण की रुचि धार्मिकता की ओर, आत्मिकता की ओर, तृतीय नेत्र जानकर इसके उन्मीलन की दिशा में किया गयचा प्रयास जिससे आज्ञाचक्र को नियमित उत्तेजना मिलती रहती है ।

तन्त्र शास्त्र के अनुसार माथे को इष्ट इष्ट देव का प्रतीक समझा जाता है हमारे इष्ट देव की स्मृति हमें सदैव बनी रहे इस तरह की धारणा क ध्यान में रखकर, ताकि मन में उस केन्द्रबिन्दु की स्मृति हो सकें । शरीर व्यापी चेतना शनैः शनैः आज्ञाचक्र पर एकत्रित होती रहे । चुँकि चेतना सारे शरीर में फैली रहती है । अतः इसे तिलक या टीके के माधअयम से आज्ञाचक्र पर एकत्रित कर, तीसरे नेत्र को जागृत करा सकें ताकि हम परामानसिक जगत में प्रवेश कर सकें ।

तिलक का हमारे जीवन में कितना महत्व है शुभघटना से लेकर अन्य कई धार्मिक अनुष्ठानों, संस्कारों, युद्ध लडने जाने वाले को शुभकामनाँ के तौर पर तिलक लगाया जाता है वे प्रसंग जिन्हें हम हमारी स्मृति-पटल से हटाना नही चाहते इन शुशियों को मस्तिष्क में स्थआई तौर पर रखने, शुभ-प्रसंगों इत्यादि के लिए तिलक लगाया जाता है हमारे जीवन में तिलक का बडा महत्व है तत्वदर्शन व विज्ञान भी इसके प्रचलन को शिक्षा को बढाने व हमारे हमारे जीवन सरल व सार्थकता उतारने के जरुरत है ?

तिलक हिंदू संस्कृति में एक पहचान चिन्ह का काम करता है। तिलक केवल धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि कई वैज्ञानिक कारण भी हैं इसके पीछे। तिलक केवल एक तरह से नहीं लगाया जाता। हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं। जितने पंथ है, संप्रदाय हैं उन सबके अपने अलग-अलग तिलक है।
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5> जमीन पर बैठकर भोजन

      भारतीय संस्कृति के अनुसार  जमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है
      वैज्ञानिक तर्क-

     पलती मारकर बैठना एक प्रकार का योग आसन है। इस पोजीशन में बैठने से मस्त‍िष्क शांत रहता है

     और भोजन करते वक्त अगर दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। इस पोजीशन में 
     बैठते ही खुद-ब-खुद दिमाग से 1 सिगनल पेट तक जाता है, कि वह भोजन के लिये तैयार हो जाये
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6-> हाथ जोड़कर नमस्ते करना

      जब किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते अथवा नमस्कार करते हैं।
      वैज्ञानिक तर्क-


       जब सभी उंगलियों के शीर्ष एक दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है।
       एक्यूप्रेशर के कारण उसका सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है,
       ताकि सामने वाले व्यक्त‍ि को हम लंबे समय तक याद रख सकें।
       दूसरा तर्क यह कि हाथ मिलाने (पश्च‍िमी सभ्यता) के बजाये अगर आप नमस्ते करते हैं
       तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुंच सकते।
       अगर सामने वाले को स्वाइन फ्लू भी है तो भी वह वायरस आप तक नहीं पहुंचेगा।

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7-> भोजन की शुरुआत तीखे से और
       अंत मीठे से
        जब भी कोई धार्मिक या  पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो  भोजन की शुरुआत तीखे से और
        अंत मीठे से होता है।


        वैज्ञानिक तर्क-

   तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं इससे
      पाचन तंत्र ठीक से संचालित होता है अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है
      इससे पेट में जलन नहीं होती है

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8-> पीपल की पूजा

      तमाम लोग सोचते हैं कि पीपल की पूजा करने से भूत-प्रेत दूर भागते हैं।
     वैज्ञानिक तर्क-

     इसकी पूजा इसलिये की जाती है, ताकि इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े और उसे काटें नहीं
     पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जो रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता है



पीपल का पूजन क्यों ?
गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं -
‘अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम्’

अर्थात् मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष हूं । इस कथन में उन्होंने अपने आपको पीपल के वृक्ष के समान ही घोषित किया है । पद्मपुराण के अनुसार पीपल का वृक्ष भगवान विष्णु का रूप है । इसलिए इसे धार्मिक श्रेष्ठ देव वृक्ष की पदवी मिली और इसका विधिवत् पूजन आरंभ हुआ । अनेक अवसरों पर पीपल की पूजा का विधान है ।

सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष में साक्षात् भगवान विष्णु एवं लक्ष्मी का वास होता है ।पुराणों में पीपल (अश्वत्थ) का बड़ा महत्त्व बताया गया है -

मूल विष्णु: स्थितो नित्यं स्कंधे केशव एव च ।
नारायणस्तु शाखासु पत्रेषु भगवान हरि: ।।
फलेऽच्युतो न सन्देह: सर्वदेवै: समन्वित: ।।
स एव विष्णुर्द्रुम एव मूर्तो महात्मभि: सेवतिपुष्यमुल: ।यस्याश्रय: पापसहस्त्रहन्ताभवेन्नृणां कामदुघो गुणाढ्य: ।।

अर्थात् :- ‘पीपल की जड़ में विष्णु, तने में केशव. शाखाओं में नारायण, पत्तों में भगवान हरि और फल में सब देवताओं से युक्त अच्युत सदा निवास करते हैं । यह वृक्ष मूर्तिमान श्रीविष्णुस्वरूप है । महात्मा पुरुष इस वृक्षके आश्रय मनुष्यों के हजारों पापों का नाश करने वाला है ।
’पद्मपुराण के मतानुसार पीपल को प्रणाम करने और उसकी परिक्रमा करने से आयु लंबी होती है । जो व्यक्ति इस वृक्ष को पानी देता है, वह सभी पापों से छुटकारा पाकर स्वर्ग को जाता है । पीपल में पितरों का वास माना गया है । इसमें सब तीर्थों का निवास भी होता है । इसलिए मुंडन आदि संस्कार पीपल के नीचे करवाने का प्रचलन है ।महिलाओं में यह विश्वास है कि पीपल की निरंतर पूजा अर्चना व परिक्रमा करके जल चढ़ाते रहने से संतान की प्राप्ति होती है, पुत्र उत्पन्न होता है, पुण्य मिलता है।

अदृष्य आत्माएं तृप्त होकर सहायक बन जाती हैं । कामनापूर्ति के लिए पीपल के तने पर सूत लपेटने की भी परंपरा है । पीपल की जड़ में शनिवार को जन चढ़ाने और दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है । शनि की जब साढ़ेसाती दशा होती है, तो लोग पीपल के वृक्ष का पूजन और परिक्रमा करते हैं, क्योंकि भगवानकृष्ण के पुराणकथा आदि के लिए श्रेष्ठ मानी गयी है ।

पीपल के पत्तों से शुभकाम में वंदनवार भी बनाए जाते हैं । धार्मिक श्रद्धालु लोग इसे मंदिर परिसर में अवश्य लगाते हैं । सूर्योदय से पूर्व पीपल पर दरिद्रता का अधिकार होता है और सूर्योदय के बाद लक्ष्मी का अधिकार होता है । इसलिए सूर्योदय से पहले इसकी पूजा करना निषेध किया गया है ।

इसके वृक्ष को काटना या नष्ट करना ब्रह्महत्या के तुल्य पाप माना गया है । रात में इस वृक्ष के नीचे सोना अशुभ माना जाता है ।वैज्ञानिक दृष्टि से पीपल रात दिन निरंतर 24 घंटे आक्सीजन देने वाला एकमात्र अद्भुत वृक्ष है । इसके निकट रहने से प्राणशक्ति बढ़ती है । इसकी छाया गर्मियों में ठंडी और सर्दियों में गर्म रहती है । इसके अलावा पीपल के पत्ते, फल आदि में औषधीय गुण रहने के कारण यह रोगनाशक भी होता है ।
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9-> दक्ष‍िण की तरफ सिर करके सोना

     दक्ष‍िण की तरफ कोई पैर करके सोता है तो लोग कहते हैं कि बुरे सपने आयेंगे
     भूत प्रेत का साया आयेगा आदि इसलिये उत्तर की ओर पैर करके सोयें


     वैज्ञानिक तर्क-
     जब हम उत्तर की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है।
     शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर संचारित होने लगता है इससे अलजाइमर, परकिंसन,

     या दिमाग संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है यही नहीं रक्तचाप भी बढ़ जाता है
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10-> सूर्य नमस्कार

     हिंदुओं में सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते नमस्कार करने की परम्परा है।


     वैज्ञानिक तर्क-
     पानी के बीच से आने वाली सूर्य की किरणें जब आंखों में पहुंचती हैं तब हमारी आंखों की रौशनी 

     अच्छी होती है
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11-> 
सिर पर चोटी

      हिंदू धर्म में ऋषि मुनी सिर पर चुटिया रखते थे आज भी लोग रखते हैं


      वैज्ञानिक तर्क-
      जिस जगह पर चुटिया रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं इससे दिमाग 

     स्थ‍िर रहता है और इंसान को क्रोध नहीं आता सोचने की क्षमता बढ़ती है।
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12-> व्रत रखना

      कोई भी पूजा-पाठ, त्योहार होता है तो लोग व्रत रखते हैं।


      वैज्ञानिक तर्क-
     आयुर्वेद के अनुसार व्रत करने से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से शरीर का डीटॉक्सीफिकेशन

     होता है यानी उसमें से खराब तत्व बाहर निकलते हैं शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से कैंसर का खतरा कम 
     होता है हृदय संबंधी रोगों,मधुमेह,आदि रोग भी जल्दी नहीं लगते
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13-> A=चरण स्पर्श करना

      हिंदू मान्यता के अनुसार जब भी आप किसी बड़े से मिलें तो उसके चरण स्पर्श करें यह हम बच्चों को 

     भी सिखाते हैं ताकि वे बड़ों का आदर करें

      वैज्ञानिक तर्क-
      मस्त‍िष्क से निकलने वाली ऊर्जा हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है इसे
     कॉसमिक एनर्जी का प्रवाह कहते हैं इसमें दो प्रकार से ऊर्जा का प्रवाह होता है या तो बड़े के पैरों से 

     होते हुए छोटे के हाथों तक या फिर छोटे के हाथों से बड़ों के पैरों तक
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B=चरण स्पर्श की परंपरा के अनुसार कुछ लाभ :-

* चरण स्पर्श से आपसी मेलजोल प्रेम व सहनशिलता बढती है॥
* चरण स्पर्श से पराये भी अपने लगते है॥
* चरण स्पर्श से दुसरो के भावना ओ की कदर होती है ॥
* चरण स्पर्श से छुआछुत के विकार की समाप्ती होती है ॥
* चरण स्पर्श से अहंकार का नाश होता है ॥
* चरण स्पर्श से समद्रष्टी को बढावा मिलता है॥
* चरण स्पर्श से दुसरों के लिए दुआए निकलती है ॥
* चरण स्पर्श से सेवा की भावना जागृत होती है ॥
* चरण स्पर्श से संत महा पुरुषोंका आशिर्वाद मिलता है ॥
* चरण स्पर्श से मन की मलिनता दुर होती है ॥
* चरण स्पर्श से समत्व बुद्धि का विकास होती है ॥
* चरण स्पर्श से मानव मे जागृती आती है ॥
* चरण स्पर्श से सभ्यता और संस्कृती फुलती है ॥
* चरण स्पर्श से आत्मा के विकास व स्वंय की विनम्रता का परिक्षण होता है

दरअसल इसके पीछे अध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक कारण छुपा है।

हमारी मान्यताओं के मुताबिक जब आप किसी का चरण स्पर्श करते हैं तो अहंकार समाप्त होता है और हृदय में समर्पण एवं विनम्रता का भाव जागृत होता है। आपके शरीर की उर्जा चरण स्पर्श करने वाले व्यक्ति में पहुंचती है। श्रेष्ठ व्यक्ति में पहुंचकर उर्जा में मौजूद नकारात्मक तत्व नष्ट हो जाता है। सकारात्मक उर्जा चरण स्पर्श करने वाले व्यक्ति से आशीर्वाद के माध्यम से वापस मिल जाती है। इससे जिन उद्देश्यों को मन में रखकर आप बड़ों को प्रणाम करते हैं उस लक्ष्य को पाने का बल मिलता है।
अध्यात्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि, जब आप किसी का चरण स्पर्श करते हैं तो यह किसी व्यक्ति के लिए नहीं होता है। चरण स्पर्श से आप उस परमात्मा को प्रणाम करते हैं जो व्यक्ति के शरीर में आत्मा के रूप में मौजूद होता है। चरण स्पर्श करते समय हमेशा दोनों हाथों से दोनों पैरों को छूना चाहिए। एक हाथ से पांव छूने के तरीके को शास्त्रों में गलत बताया गया है।
शास्त्रों में चरण स्पर्श के तीन प्रकार बताये गये हैं। झुककर, घुटनों के बल बैठकर और साष्टांग प्रणाम। वैज्ञानिक दृष्टि से झुककर चरण स्पर्श करने से कमर और रीढ़ की हड्डियों को आराम मिलता है। रक्त का प्रवाह सिर की ओर होता है जिससे मानसिक क्षमता और आंखों की रोशनी बढ़ती है।
घुटनों के बल बैठकर चरण स्पर्श करने से जोड़ों में मौजूद तनाव दूर होता है और शरीर लचीला बनता है। जोड़ों में मौजूद तकलीफों से मुक्ति मिलती है। साष्टांग होकर चरण स्पर्श करने से सभी अंग एक्टिव होते हैं और बुद्धि तीक्ष्ण होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि स्त्रियों को साष्टांग होकर किसी का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए।
चरण स्पर्श से आयु भी लंबी होती है। इस संदर्भ में एक बहुत ही सुंदर कथा है। ऋषि मार्कण्डेय जी अल्पायु थे। जब इनके पिता को इस बात की जानकारी हुई तो उनका जनेऊ संस्कार कर दिया और चरण स्पर्श की दीक्षा दी। मार्कण्डेय जी के पिता ने कहा कि पुत्र मार्कण्डेय तुम्हें जो भी व्यक्ति दिखे उनका चरण स्पर्श करना। मार्कण्डेय जी ने ऐसा ही करना शुरू कर दिया। एक दिन उनके सामने सप्तऋषि आए।
मार्कण्डेय जी ने झुककर सप्तऋषियों का चरण स्पर्श किया। अनजाने में सप्तऋषियों ने मार्कण्डेय जी को दीर्घायु का आशीर्वाद दे दिया। जब इन्हें पता चला कि मार्कण्डेय जी अल्पायु हैं तो चिंता में पड़ गये। सप्तऋषि बालक मार्कण्डेय को ब्रह्मा जी के पास ले गये। मार्कण्डेय जी ने ब्रह्मा जी का भी चरण स्पर्श किया। ब्रह्मा जी ने भी मार्कण्डेय को दीर्घायु का आशीर्वाद दिया।
सप्तऋषियों ने ब्रह्मा जी से कहा कि यह बालक तो अल्पायु है। अगर कम उम्र में ही इसकी मृत्यु होती है तो हम दोनों का आशीर्वाद झूठा शाबित होगा। सप्तऋषि की बात सुनकर ब्रह्मा जी ने कहा कि अब यह बालक दीर्घायु होगा और कई कल्पों तक जीवित रहेगा। मार्कण्डेय जी के प्राण लेने जब यमराज आये तो भगवान शिव ने यमराज को भगा दिया। बालक मार्कण्डेय ऋषि मार्कण्डेय बनकर कई कल्पों तक जीवित रहे।
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14-> क्यों लगाया जाता है सिंदूर

       शादीशुदा हिंदू महिलाएं सिंदूर लगाती हैं


       वैज्ञानिक तर्क-
      सिंदूर में हल्दी,चूना और मरकरी होता है यह मिश्रण शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित करता है चूंकि
      इससे यौन उत्तेजनाएं भी बढ़ती हैं इसीलिये विधवा औरतों के लिये सिंदूर लगाना वर्जित है
      इससे स्ट्रेस कम होता है।

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15>   पूजा-पाठ में दीपक क्यों जलाया जाता है।
मान्यता है कि अग्नि देव को साक्षी मानकर उसकी मौजूदगी में किए काम जरूर सफल होते हैं। हमारे शरीर की रचना में सहायक पांच तत्वों में से अग्नि भी एक है। दूसरा अग्नि पृथ्वी पर सूर्य का बदला हुआ रूप है।
इसलिए किसी भी देवी- देवता के पूजन के समय ऊर्जा को केंद्रीभूत करने के लिए दीपक प्रज्वलित किया जाता है।
दीपक का और भी महत्व बताया गया है कि प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है। परमात्मा प्रकाश और ज्ञान रूप में ही सब जगह व्याप्त है। ज्ञान प्राप्त करने से अज्ञान रूपी मनोविकार दूर होते हैं और सांसारिक शूल मिटते हैं।
इसलिए प्रकाश की पूजा को ही परमात्मा की पूजा कहा गया है। मंदिर में आरती करते समय दीपक जलाने के पीछे उद्देश्य यही होता है कि प्रभु हमारा मन प्रकाश की ओर ले चलें।
दीपक से हमें जीवन के उद्धर्वगामी होने, ऊंचा उठने और अंधकार को मिटा डालने की भी प्रेरणा मिलती है। इसके अलावा दीप ज्योति से पाप खत्म होते हैं। शत्रु का शमन होता है और आयु, आरोग्य, पुण्यमय, सुखमय जीवन में बढ़ोतरी होती है।
दीपक को सही दिशा में भी जलाना चाहिए। सम संख्या में जलाने से ऊर्जा संवहन निष्क्रिय हो जाता है, जबकि विषम संख्या में जलाने से सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है। पश्चिम की ओर लौ रखने से दुख और दक्षिण की ओर लौ रखने से हानि होती है। दीपक की लौ पूर्व और उत्तर की ओर रखने से सुख और समृद्धि आती है।

पूजा-पाठ में दीपक क्यों जलाया जाता है?

भारतीय संस्कृति में हर धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम में दीपक जलाने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि अग्नि देव को साक्षी मानकर उसकी मौजूदगी में किए काम जरूर सफल होते हैं। हमारे शरीर की रचना में सहायक पांच तत्वों में से अग्नि भी एक है। दूसरा अग्नि पृथ्वी पर सूर्य का बदला हुआ रूप है। इसलिए किसी भी देवी- देवता के पूजन के समय ऊर्जा को केंद्रीभूत करने के लिए दीपक प्रज्वलित किया जाताहै।

a= दीपक का जो असाधाण महत्व बताया गया है, उसके पीछे मान्यता यह है कि प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है। परमात्मा प्रकाश और ज्ञान रूप में ही सब जगह व्याप्त है। ज्ञान प्राप्त करने सेअज्ञान रूपी मनोविकार दूर होते हैं और सासारिक शूल मिटते हैं। इसलिए प्रकाश की पूजा को ही परमात्मा की पूजा कहा गया है। मंदिर में आरती करते समय दीपक जलाने के पीछे उद्देश्य यही होता है कि प्रभु हमारा मन प्रकाश की ओर ले चलें। मौत सेअमरता की ओर हमें ले चलें। दीपक के प्रकाश से की गई प्रार्थना का उल्लेख ऋगवेद में यूं मिलता है ।

                    अयं कविकविषु प्रचेता मत्र्येप्वाग्निरमृतो नि धायि।
                    समानो अत्र जुहुर: स्हस्व: सदा त्व्सुमनस: स्याम।।

यानी हे प्रकाश रूप परमात्मन। तुम अकवियों में कवि होकर, मृत्यों में अमृत बनकर निवास करते हो। हे प्रकाश स्वरूप तुमसे हमारा यह जीवन दुख न पाए हम हमेशा सुखी बने रहें।दीपकसे हमें जीवन के उद्धर्वगामी होने, ऊंचा उठने और अंधकार को मिटा डालने की भी प्रेरणा मिलती है। इसके अलावा दीप ज्योति से पाप खत्म होते है।

b==शत्रु का शमन होता है और आयु, आरोग्य, पुण्यमय, सुखमय जीवन में बढ़ोत्तरी होती है। दीपक जलाने के संबंध में कहा जाता हैकि सम संख्या में जलाने से ऊर्जा संवहन निष्क्रिय हो जाता है, जबकि विषम संख्या में जलाने से सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है। दीपक की लौ के संबंध में यह मान्यता है कि इससे आयु में वृद्धि होती है। पश्चिम की ओर लौ रखने से दुख और दक्षिण की ओर लौ रखने से हानि होती है।

c==दीपक क्या है?
दीपक एक प्रकार का पात्र है जिसमें रुई की बाती लगाकर घी या तेल डालकर ज्योति प्रज्वलित की जाती है। वैसे तो पारंपरिक तौर पर मिट्टी का दिया ज्योति प्रज्वलित होता है परन्तु अब धातु के दीपक भी अत्यधिक प्रचलन में हैं।कई बड़ी-बड़ी अंधेरी गुफ़ाओं में इतनी अद्दभुत एवं अत्तयंत ही सुन्दर चित्रकारी मिलती है जिन्हें बनाना बिना दीपक के असंभव था। हमारे भारतवर्ष में दीपक का इतिहास प्रामाणिक रूप से ‘5000 वर्षों’ से भी अधिक पुराना हैं। कोई भी शुभ काम शुरू करने से पहले हिन्दू धर्म में पहले भगवान के सामनेदीपक प्रज्वलित किया जाता है।

d==दीपक जलाने के धार्मिक कारण-
दीपक को ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। दीपक को पूजा पाठ में विशेष महत्व दिया जाता है। विषम संख्या में आमतौर पर दीपक जलाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। पूजन के समय हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार दीपक जलाना अनिवार्य माना गया है। घी के दीपक से आरती करने पर घर में सुख समृद्धि आती है। घी के दीपक से आरती करने से घर में लक्ष्मी जी का स्थाई रूप से निवास होता है।

e==दीपक जलाने के वैज्ञानिक कारण-
सकारात्मकता का प्रतीक दीपक को माना जाता है एवं दीपक प्रज्वलित करने से दरिद्रता दूर होती है। गाय के दूध से बनाये गये घी में रोगाणुओं को दूर करने की क्षमता अधिक मात्रा में होती है। यह गाय का घी जब भी दीपक में अग्नि के संपर्क से पूरे वातावरण को पवित्र बना देता है एवं प्रदूषण को दूर करता है।

f==  यह मंत्र बोलिए दीपक जलाते समय-
              “दीपज्योति: परब्रह्म: दीपज्योति: जनार्दन:।
               दीपोहरतिमे पापं संध्यादीपं नामोस्तुते।।
              शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुखं सम्पदां।
              शत्रुवृद्धि विनाशं च दीपज्योति: नमोस्तुति।।

g==”जानिए नियम दीपक जलाने के-
         1) पूर्व दिशा की तरफ़ दीपक की लौ रखने से आयु में वृद्धि होती है।
         2) पश्चिम दिशा की तरफ़ दीपक की लौ रखने से दुख में बढ़ोतरी होती है।
         3) उत्तर दिशा की तरफ़ दीपक की लौ रखने से धन लाभ होता है।
        4) कभी भी दक्षिण दिशा की तरफ़ दीपक की लौ को ना रखें इससे जन या धन की हानि होती है।
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16>" मंदिर का घंटा" .

 "स्टॅटिक डिस्चार्ज यंत्र" .

किसी भी मंदिर में प्रवेश करते समय आरम्भ में ही एक बड़ा घंटा बंधा होता है। 
मंदिर में प्रवेश करने वाला प्रत्येक भक्त पहले घंटानाद करता है और मंदिर में प्रवेश करता है।

क्या कारण है इसके पीछे? इसका एक वैज्ञानिक कारण है..
जब हम बृहद घंटे के नीचे खड़े होकर सर ऊँचा करके हाथ उठाकर घंटा बजाते हैं, तब प्रचंड घंटानाद होता है।
यह ध्वनि 330 मीटर प्रति सेकंड के वेग से अपने उद्गम स्थान से दूर जाती है,
ध्वनि की यही शक्ति कंपन के माध्यम से प्रवास करती है।
आप उस वक्त घंटे के नीचे खडे़ होते हैं। अतः ध्वनि का नाद आपके सहस्रारचक्र
(ब्रम्हरंध्र,सिर के ठीक ऊपर) में प्रवेश कर शरीरमार्ग से भूमि में प्रवेश करता है।
यह ध्वनि प्रवास करते समय आपके मन में (मस्तिष्क में) चलने वाले असंख्य विचार, चिंता, तनाव, उदासी, मनोविकार..
इन समस्त नकारात्मक विचारों को अपने साथ ले जाती हैं, और आप निर्विकार अवस्था में परमेश्वर के सामने जाते हैं।
तब आपके भाव शुद्धतापूर्वक परमेश्वर को समर्पित होते हैं।
व घंटे के नाद की तरंगों के अत्यंत तीव्र के आघात से आस-पास के वातावरण के व हमारे शरीर के सूक्ष्म कीटाणुओं का नाश 
होता है, जिससे वातावरण मे शुद्धता रहती है, हमें स्वास्थ्य लाभ होता है।
इसीलिए मंदिर मे प्रवेश करते समय घंटानाद अवश्य करें, और थोड़ा समय घंटे के नीचे  खडे़ रह कर घंटानाद का 
आनंद अवश्य लें। आप चिंतामुक्त व शुचिर्भूत बनेगें। आप का मस्तिष्क ईश्वर की दिव्य ऊर्जा ग्रहण करने हेतु तैयार होगा।
ईश्वर की दिव्य ऊर्जा व मंदिर गर्भ की दिव्य ऊर्जाशक्ति आपका मस्तिष्क ग्रहण करेगा।
आप प्रसन्न होंगे और शांति मिलेगी, आत्म जागरण,आत्म ज्ञान
और दिव्यजीवन के परम आनंद की अनुभूति के लिये घंटानाद अवश्य करें ।
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17>मुहूर्त

सुख-समृद्धि का शुभ समय कहते हैं किसी भी वस्तु या कार्य को प्रारंभ करने में मुहूर्त देखा जाता है, जिससे मन को बड़ा सुकून मिलता है। यहाँ हम कोई भी बंगला या भवन निर्मित करें या कोई व्यवसाय करने हेतु कोई सुंदर और भव्य इमारत बनाएँ तो सर्वप्रथम हमें 'मुहूर्त' को प्राथमिकता देनी होगी।
शुभ तिथि, वार, माह व नक्षत्रों में कोई इमारत बनाना प्रारंभ करने से न केवल किसी भी परिवार को आर्थिक, सामाजिक, मानसिक वशारीरिक फायदे मिलते हैं वरन उस परिवार के सदस्यों में सुख-शांति व स्वस्थता की प्राप्ति भी होती है।
यहाँ शुभ वार, शुभ महीना, शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र भवन निर्मित करते समय इस प्रकार से देखे जाने चाहिए ताकि निर्विघ्न, कोई भी कार्य संपादित हो सके।
🌸शुभ वार :
सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार (गुरुवार), शुक्रवार तथा शनिचर (शनिवार) सर्वाधिक शुभ दिन माने गए हैं।
🌸मंगलवार एवं रविवार को कभी भी भूमि पूजन, गृह निर्माण की शुरुआत, शिलान्यास या गृह प्रवेश नहीं करना चाहिए।
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18>पूजा में कपूर का खास प्रयोग होता है,

,पूजा में कपूर का खास प्रयोग होता है, हवन कुंड को जलाने के लिए सरसों के तेल का तो इस्तेमाल किया ही जाता है, लेकिन शास्त्रों के अनुसार कपूर का विशेष उपयोग माना गया है। किंतु क्या आप जानते हैं कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह बहुत फायदेमंद है।
जी हां... धर्म कार्यों के लिए विशेष रूप से उपयोग होने वाली वस्तु कपूर का प्रयोग कई बीमारियों को काटता है। कपूर त्वचा एवं मांसपेशियों के लिए काफी फायदेमंद है। यदि किसी को जोड़ों का दर्द है, तब भी कपूर का इस्तेमाल किया जाता है।
इसके प्रयोग से कई प्रकार के मरहम बनाए जाते हैं। यदि आप आयुर्वेदिक संदर्भ से जानें, तो कपूर का प्रयोग करके भिन्न-भिन्न मकसद के लिए मरहम तैयार किए जाते हैं। लेकिन आजकल तो ज़माना एलोपैथिक दवाओं का हो गया है... फिर भी आप घर बैठे ही स्वयं भी कपूर के एक प्रयोग से कई बीमारियों को अलविदा कह सकते हैं।
यदि आप निर्देशानुसार इसका प्रयोग करेंगे, तो यह वाकई चमत्कार दिखाएगा। हम यहां आपको कपूर के कुछ उपयोग बताने जा रहे हैं, जिन्हें इस्तेमाल करके आप कई फायदे पा सकते हैं।
पहला फायदा, यदि किसी को नियमित रूप से पेट दर्द की परेशानी रहती है, तो इसका हल कपूर के एक प्रयोग में छिपा है। पेट दर्द होने पर कपूर, अजवाइन और पिपरमेंट यानी कि पुदीने को शर्बत में मिलाकर पीने से दर्द मिनटों में दूर हो जाता है।
यदि किसी को दस्त की समस्या है, तब भी कपूर बेहद उपयोगी है। इसके लिए कपूर, अजवाइन और पिपरमेंट को पानी में डालकर धूप में रख दें। थोड़े-थोड़े समय में इस घोल को हिलाते रहें ताकि यह अपना आकार ले ले। इसके बाद इसकी कुछ बूंदों को चीनी के पानी में मिलाकर दस्त के रोगी को पिलाएं, जल्द ही आराम मिल जाएगा।
अगला फायदा आपकी स्किन यानी कि त्वचा से जुड़ा है। यदि त्वचा पर कोई संक्रमण है तो संक्रमित स्थान पर कपूर को लगाएं, धीरे-धीरे संक्रमण दूर हो जाएगा। इसके अलावा कपूर के त्वचा पर नियमित उपयोग से निखार भी आता है।
इसके अलावा यदि किसी को मांसपेशियों में दिक्कत या फिर जोड़ों का दर्द है, तो कपूर के तेल से मालिश करें। रोगी को चमत्कारी प्रभाव का अनुभव होगा।
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19>==क्यों बजाई जाती है मंदिर में प्रवेश करते समय घंटी ?

आप सभी को पता है कि मंदिर में जाने से पहले घंटी बजाई जाती है और हिंदू धर्म से जुड़े हुए हर एक मंदिर और धार्मिक स्थल के बाहर बड़े-बड़े घंटे या घंटियां लटकी तो अवश्य देखी होंगी जिन्हें हम मंदिर में जाने से पहले भक्तगण श्रद्धा के साथ बजाते हैं. पर कभी इस बात को आपने नहीं सोचा होगा कि मंदिर में जाने से पहले आखिर क्यों बजाई जाती है घंटी !! हम बताते है आज आपको कि इसका क्या कारण है,

दरअसल प्राचीन काल से ही देवालयों और मंदिरों के बाहर घंटियों को लगाने की शुरुआत हो गई थी. मान्यता है कि जिन धार्मिक स्थानों पर घंटी की आवाज लगातार आती रहती है वहां का वातावरण हमेशा सुखद और पवित्र बना रहता है और गलत या बुरी शक्तियां पूरी तरह दूर रहती हैं.
इसी वजह से सुबह और शाम को जब मंदिर में आरती होती है तो वहा एक लय और विशेष धुन के साथ घंटियां बजाई जाती हैं जिसके कारण वहां पर मौजूद लोगों को शांति और दैवीय शक्ति का अनुभव होता है.

इसमें कुछ लोगों द्वारा यह माना गया है कि घंटी बजाने से मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं की मूर्तियों में एक चेतना जागृत होती है जिससे भगवान की पूजा और आराधना अधिक फलमय और प्रभावशाली बन जाती है.
पुराणों में कहा गया है कि मंदिर में घंटी बजाने से मानव के कई जन्म के पापो का नाश हो जाते हैं. जब से सृष्टि का प्रारंभ हुआ तब से जो आवाज गूंजी थी वही आवाज आज मंदिर की घंटी बजाने पर भी आती है. उल्लेखनीय है कि यही आवाज ओंकार के उच्चारण से भी बनती या निकलती है.

हर मंदिर के बाहर लगी घंटी को काल का भी प्रतीक माना गया है. कई जगह यह भी लिखा हुआ है कि जब इस संसार पर प्रलय आएगा उस समय भी ऐसा ही नाद यानि घंटी की आवाज गूंजेगी.
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20>==आखिर परिक्रमा क्यों करते है देवी-देवताओ की?

आप सभी को पता ही होगा कि हम जब भी मंदिर जाते है तो वह पर देवी देवताओ की पूजा करने के बाद परिक्रमा लगते है। पर यह नहीं जानते होंगे कि यह क्यों लगाई जाती है और इससे हमें क्या मिलेगा. तो आपको बता दे कि हमारे शास्त्रों में है कि परिक्रमा से पुण्य जितना प्राप्त होता है उतना ही देवी-देवता की आराधना करने से प्राप्त हो जाता है।
परिक्रमा का अर्थ है अपनी मानसिक और शारीरिक भावना को अपने देवता अथवा जिसकी भी आप परिक्रमा कर रहे हैं उसके प्रति अपने आपको समर्पण कर देना।

आपको पता होगा और देखा भी होगा विवाह आदि कार्यों के समय अग्नि की सात परिक्रमा या चार परिक्रमा करते है, इसका भी विधान है देवी-देवता की, एवं मंदिर की तीन परिक्रमा करने का बहुमूल्य नियम है। तथा विद्यालय में गुरु की एक परिक्रमा का विधान है।
इसी तरह किसी भी संकल्पित धार्मिक पूजा-पाठ में आचार्य की तीन परिक्रमा का विधान है। और श्राद्ध आदि कर्म में जो भी मार्जन का जानकार, ब्राह्मण तर्पण, गायत्री जप करने वाला हो, उसको भोजन करने के बाद उसकी चार परिक्रमा का भी विधान है।

इसी प्रकार पीपल वृक्ष की 1, 3, 108, 101 परिक्रमा का विधान है। परिक्रमा लगाने से भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, पितृदेवों को प्रसन्न किया जाता है। वृंदावन की परिक्रमा करने से भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति प्राप्त होती है और आपको इष्ट कार्य की सिद्धि प्राप्त होती है।

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21>सिर पर शिखा रखने के पीछे बहुत बड़ीवैज्ञानिकता है 

जिसे आधुनिक काल में वैज्ञानिकों द्वारा सिद्ध भी किया जा चुका है। आज हम इस लेख में 
सिर पर शिखा की वैज्ञानिक आधार पर विवेचना करेंगे जिससे आप जान सके की हज़ारों 
वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज ज्ञान विज्ञान में हम से कितना आगे थे।
1. सर्वप्रमुख वैज्ञानिक कारण यह है कि शिखा वाला भाग,
जिसके नीचे सुषुम्ना नाड़ी होती है, कपाल तन्त्र के अन्य खुली जगह (मुण्डन के समय
यह स्थिति उत्पन्न होती है) की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होता है। जिसके खुली होने के कारण
वातावरण से उष्मा व अन्य ब्रह्माण्डिय विद्युत- चुम्बकीय तरंगो का मस्तिष्क से आदान प्रदान
बड़ी ही सरलता से हो जाता है। और इस प्रकार शिखा ना होने की स्थिति मेँ स्थानीय
वातावरण के साथ साथ मस्तिष्क का ताप भी बदलता रहता है। लेकिन वैज्ञानिकतः मस्तिष्क
को सुचारु, सर्वाधिक क्रियाशिल और यथोचित उपयोग के लिए इसके ताप को
नियंन्त्रित रहना अनिवार्य होता है। जो शिखा न होने की स्थिति मेँ एकदम असम्भव है।
क्योँकि शिखा (लगभग गोखुर के बराबर) इस ताप को आसानी से सन्तुलित कर जाती है और उष्मा
की कुचालकता की स्थिति उत्पन्न करके वायुमण्डल से उष्मा के स्वतः आदान प्रदान को
रोक देती है। आज से कई हजार वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज इन सब वैज्ञानिक कारणों से भली भाँति
परिचित थे ।
2. - जिस जगह शिखा (चोटी) रखी जाती है,
यह शरीर के अंगों, बुद्धि और मन को नियंत्रित करने का स्थान भी है। शिखा एक धार्मिक
प्रतीक तो है ही साथ ही मस्तिष्क के संतुलन का भी बहुत बड़ा कारक है। आधुनिक युवा इसे
रुढ़ीवाद मानते हैं लेकिन असल में यह पूर्णत: वैज्ञानिक है। दरअसल, शिखा के कई रूप हैं।
3. - आधुनकि दौर में अब लोग सिर पर
प्रतीकात्मक रूप से छोटी सी चोटी रख लेते हैं लेकिन इसका वास्तविक रूप यह नहीं है। वास्तव में
शिखा का आकार गाय के पैर के खुर के बराबर होना चाहिए। इसका सबसे बड़ा कारण यह है
कि हमारे सिर के बीचों बीच सहस्राह चक्र होता है। शरीर में पांच चक्र होते हैं,मूलाधार
चक्र जो रीढ़ के नीचले हिस्से में होता है और आखिरी है सहस्राह चक्र जो सिर पर होता है।
इसका आकार गाय के खुर के बराबर ही माना गया है। शिखा रखने से इस सहस्राह चक्र का
जागृत करने और शरीर, बुद्धि व मन पर नियंत्रण करने में सहायता मिलती है। शिखा का हल्का
दबाव होने से रक्त प्रवाह भी तेज रहता है और मस्तिष्क को इसका लाभ मिलता है।
4.- ऐसा भी है कि मृत्यु के समय आत्मा शरीर के
द्वारों से बाहर निकलती है (मानव शरीर में नौ द्वार बताये गए है दो आँखे, दो कान, दो
नासिका छिद्र, दो नीचे के द्वार, एक मुह )और दसवा द्वार यही शिखा या सहस्राह चक्र जो
सिर में होता है , कहते है यदि प्राण इस चक्र से निकलते है तो साधक की मुक्ति निश्चत है, और
सिर पर शिखा होने के कारण प्राण बड़ी आसानी से निकल जाते हैं,और मृत्यु हो जाने के
बाद भी शरीर में कुछ अवयव ऐसे होते हैं जो आसानी से नहीं निकलते, इसलिए जब व्यक्ति को
मरने पर जलाया जाता है तो सिर अपने आप फटता है और वह अवयव बाहर निकलता है यदि
सिर पर शिखा होती है तो उस अवयव को निकलने की जगह मिल जाती है.
5. शिखा रखने से मनुष्य प्राणायाम,
अष्टांग योग आदि यौगिक क्रियाओं को ठीक-ठीक कर सकता है। शिखा रखने से मनुष्य
की नेत्रज्योति सुरक्षित रहती है। शिखा रखने से मनुष्य स्वस्थ, बलिष्ठ, तेजस्वी और
दीर्घायु होता है।

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